Q. दक्षिण पूर्व एशिया में भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और ‘बुद्ध अवशेष कूटनीति’ को बढ़ावा देने में भारत की बौद्ध विरासत की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। बौद्ध सर्किट की आर्थिक क्षमता को कौन सी प्रणालीगत बाधाएँ रोकती हैं? (15 अंक, 250 शब्द)

May 5, 2026

GS Paper IModern History

प्रश्न की मुख्य माँग

  • दक्षिण-पूर्व एशिया में सॉफ्ट पॉवर और अवशेष कूटनीति को सुदृढ़ करने में भारत की बौद्ध विरासत की भूमिका का वर्णन कीजिए।
  • बौद्ध सर्किट की आर्थिक क्षमता में बाधा डालने वाली प्रणालीगत समस्याओं को रेखांकित कीजिए।
  • बौद्ध सर्किट को सभ्यतागत और आर्थिक केंद्र में बदलने के उपाय सुझाइए।

उत्तर

बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर से लेकर अन्य पवित्र स्थलों तक, भारत बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक भूगोल का केंद्र है। यह विरासत भारत की सॉफ्ट पॉवर को मजबूत करती है, अवशेष कूटनीति के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंधों को गहरा करती है और पर्यटन व आर्थिक विकास की विशाल लेकिन अभी तक अल्प उपयोग की गई संभावनाएँ प्रस्तुत करती है।

बौद्ध विरासत तथा सॉफ्ट पॉवर/अवशेष कूटनीति

  • पवित्र भूगोल: भारत में बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति, प्रथम उपदेश और महापरिनिर्वाण से जुड़े स्थल स्थित हैं, जो इसे बौद्ध जगत में अद्वितीय सभ्यतागत वैधता प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण: बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर, श्रीलंका, थाईलैंड और जापान के श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख तीर्थ स्थल हैं।
  • अवशेष कूटनीति: बौद्ध अवशेषों की प्रदर्शनी औपचारिक कूटनीति से भी अधिक भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव उत्पन्न करती है, जिससे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ विश्वास मजबूत होता है।
    • उदाहरण: जब पवित्र बौद्ध अवशेष थाईलैंड ले जाए गए, तो 40 लाख से अधिक लोगों ने दर्शन किए, जिससे भारत-थाईलैंड संबंधों में सद्भाव बढ़ा।
  • सांस्कृतिक जुड़ाव: साझा बौद्ध परंपराएँ भारत को एशिया के थेरवाद और महायान समाजों से जोड़ती हैं, जिससे सभ्यतागत साझेदारी मजबूत होती है।
    • उदाहरण: संगमित्रा द्वारा अनुराधापुर (श्रीलंका) भेजे गए बोधि वृक्ष के पौधे से अशोककालीन सांस्कृतिक कूटनीति का स्थायी प्रभाव दिखता है।
  • ज्ञान कूटनीति: पाली अध्ययन, नालंदा की विरासत और बौद्ध शोध को बढ़ावा देकर भारत पर्यटन से आगे बढ़कर बौद्धिक नेतृत्व स्थापित करता है।
    • उदाहरण: नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार और बौद्ध अध्ययन में प्रस्तावित फैलोशिप, अकादमिक पहुँच को सुदृढ़ करते हैं।
  • रणनीतिक पहुँच: बौद्ध कूटनीति, एक्ट ईस्ट नीति को पूरक बनाते हुए आसियान देशों के साथ व्यापार और रणनीति से आगे बढ़कर जन-से-जन विश्वास विकसित करती है।
    • उदाहरण: थाईलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और श्रीलंका से आने वाले बड़ी संख्या में पर्यटक भारत-आसियान सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करते हैं।

आर्थिक क्षमता में बाधा डालने वाली प्रणालीगत चुनौतियाँ

  • कमजोर कनेक्टिविटी: सीमित हवाई अड्डा क्षमता, कमजोर रेल एकीकरण और अंतिम मील कनेक्टिविटी की कमी तीर्थयात्रियों की संख्या तथा उनके यहाँ की अवधि को घटाती है।
    • उदाहरण: गया हवाई अड्डे का टर्मिनल केवल 250 आगमन और 250 प्रस्थान यात्रियों को सँभाल सकता है तथा रनवे विस्तार अभी भूमि अधिग्रहण के कारण लंबित है।
  • कमजोर आतिथ्य ढाँचा: पर्याप्त होटल, स्वच्छता और तीर्थयात्री सुविधाओं की कमी उच्च-मूल्य आध्यात्मिक पर्यटन को राजस्व में बदलने से रोकती है।
    • उदाहरण: बौद्ध सर्किट के आस-पास लग्जरी और मिड-रेंज होटलों की कमी।
  • खंडित प्रशासन: बौद्ध स्थलों को एकीकृत राष्ट्रीय सर्किट के रूप में विकसित करने के बजाय अलग-अलग गंतव्यों की तरह प्रबंधित किया जाता है।
    • उदाहरण: बौद्ध विरासत एवं तीर्थयात्रा विकास प्राधिकरण के अभाव के कारण बिहार और उत्तर प्रदेश में समन्वित योजना बनाने में देरी।
  • वीजा संबंधी बाधाएँ: सामान्य ई-वीजा व्यवस्था वृद्ध तीर्थयात्रियों, मठ-समूहों और संगठित धार्मिक प्रतिनिधिमंडलों के लिए पर्याप्त नहीं है, जिससे यात्रा प्रक्रिया जटिल होती है।
    • उदाहरण: श्रीलंका, थाईलैंड, जापान और दक्षिण कोरिया के लिए विशेष बौद्ध तीर्थ वीजा की आवश्यकता की अनिवार्यता।
  • स्थानीय लाभों की कमी: जब स्थानीय समुदायों को प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिलता, तो संरक्षण और पर्यटन विस्तार के प्रति उनका समर्थन कमजोर हो जाता है, जिससे स्थिरता प्रभावित होती है।

आगे की राह

  • समर्पित प्राधिकरण: भूमि, परिवहन, संरक्षण और ब्रांडिंग के लिए एक एकीकृत संस्थान स्थापित किया जाए।
    • उदाहरण: केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित योजना हेतु बौद्ध विरासत एवं तीर्थयात्रा विकास प्राधिकरण का गठन।
  • बेहतर पहुँच: गया को पूर्ण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पारिस्थितिकी में विकसित किया जाए और पूरे सर्किट में तीव्र रेल संपर्क मजबूत किया जाए।
    • उदाहरण: वाराणसी–सारनाथ–कुशीनगर–नालंदा के बीच तेज कनेक्टिविटी तीर्थयात्रियों की आवाजाही को सुगम बना सकती है।
  • तीर्थ वीजा: विशेष बौद्ध तीर्थ वीजा शुरू किया जाए और भारत–नेपाल के बीच समन्वित सुविधा विकसित की जाए ताकि पवित्र यात्रा निर्बाध हो।
    • उदाहरण: लुंबिनी और बोधगया के बीच एकीकृत यात्रा “एक पवित्र यात्रा” का अनुभव दे सकती है।
  • ज्ञान केंद्र: पाली फैलोशिप, शोध सुविधाओं और गाइड प्रशिक्षण का विस्तार किया जाए, जिससे अकादमिक और पर्यटन अनुभव दोनों मजबूत हों।
    • उदाहरण: केंद्रीय बजट 2026–27 में 10,000 पर्यटन गाइड्स के लिए विश्वस्तरीय प्रशिक्षण की घोषणा की गई।
  • सामुदायिक लाभ: स्थानीय स्तर पर रोजगार, होमस्टे और सेवाओं को बढ़ावा दिया जाए, ताकि बौद्ध पर्यटन आजीविका-आधारित और सामाजिक रूप से टिकाऊ बने।
    • उदाहरण: श्रावस्ती और बोधगया में स्वदेश दर्शन परियोजनाएँ सीधे स्थानीय समुदायों को लाभ पहुँचाएँ।

निष्कर्ष

भारत का बौद्ध सर्किट केवल एक पर्यटन संसाधन नहीं, बल्कि एशिया के साथ जुड़ने वाला एक सभ्यतागत सेतु है। यदि इस विरासत को अवसंरचना, कूटनीति और स्थानीय समृद्धि में प्रभावी रूप से रूपांतरित किया जाए, तो बौद्ध कूटनीति भारत के क्षेत्रीय नेतृत्व का एक सशक्त स्तंभ बन सकती है।

Examine the role of India’s Buddhist heritage in enhancing its soft power and Relic Diplomacy in Southeast Asia. What systemic bottlenecks hinder the economic potential of the Buddhist Circuit? in hindi

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