Q. भारत में 'चाइल्डहुड ओबेसिटी' एक "साइलेंट पैन्डेमिक" के रूप में उभर रहा है, जो बदलती जीवनशैली और पोषण पैटर्न को दर्शाता है। भारत में 'चाइल्डहुड ओबेसिटी' में वृद्धि में योगदान देने वाले सामाजिक और व्यवहारिक कारकों का परीक्षण कीजिए और समाज पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

March 11, 2026

GS Paper IIndian Society

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत में बाल्यावस्था मोटापे के बढ़ने में सामाजिक कारकों की चर्चा कीजिए।
  • बाल्यावस्था मोटापे के बढ़ने में व्यवहारगत कारकों का उल्लेख कीजिए।
  • समाज पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों का विवरण दीजिए।

उत्तर

बाल्यावस्था मोटापा भारत में तेजी से एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर रहा है। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस, 2026 के अनुसार, बाल्यावस्था मोटापे के मामले में भारत अब चीन के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर है, जो कुपोषण से जीवनशैली-जनित स्वास्थ्य जोखिमों की ओर हो रहे चिंताजनक परिवर्तन को दर्शाता है।

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भारत में बाल्यावस्था मोटापे के बढ़ने में सामाजिक कारक

  • शहरीकरण और निष्क्रिय जीवनशैली वाला परिवेश: शहरी क्षेत्रों में बच्चों के लिए बाहरी खेल और सक्रिय आवागमन के अवसर कम हो गए हैं, जिससे शारीरिक गतिविधियाँ घटती है।
    • उदाहरण: शहरों में मोटापे का स्तर गाँवों की तुलना में लगभग 10% अधिक है।
  • खाद्य परिवेश और आहार पैटर्न में परिवर्तन: प्रसंस्कृत (processed) और अधिक कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ने से बच्चों के आहार में अस्वास्थ्यकर परिवर्तन आया है।
    • उदाहरण: वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस, 2026 के अनुसार, 5–19 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में उच्च बीएमआई के मामले 2025 में 4.1 करोड़ तक पहुँच गए।
  • संस्थागत पोषण समर्थन की कमी: स्कूलों के माध्यम से पौष्टिक भोजन की सीमित उपलब्धता संतुलित आहार प्राप्त करने में बाधा बनती है।
    • उदाहरण: केवल 35.5% बच्चों को स्कूल में भोजन प्राप्त होता है।
  • मातृ स्वास्थ्य और पीढ़ीगत प्रभाव: माता-पिता में मोटापे की स्थिति आनुवंशिक और जीवनशैली संबंधी कारकों के माध्यम से बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
  • प्रारंभिक बाल्यावस्था पोषण प्रथाओं की कमजोरी: शिशु पोषण संबंधी अनुचित प्रथाएँ दीर्घकालिक चयापचय जोखिमों को बढ़ा देती हैं।
    • उदाहरण: 1–5 माह आयु के लगभग 32.6% शिशुओं को पर्याप्त स्तनपान प्राप्त नहीं होता है, जिससे भविष्य में मोटापे की संभावना बढ़ जाती है।

बाल्यावस्था मोटापे के बढ़ने में व्यवहारगत कारक

  • शारीरिक निष्क्रियता: खेलकूद और व्यायाम में कम भागीदारी बच्चों के चयापचय स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
    • उदाहरण: 11–17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 74% किशोर पर्याप्त शारीरिक गतिविधियों में भाग नहीं लेते हैं।
  • कमजोर हृदय-श्वसन क्षमता: कम सहनशक्ति स्तर यह दर्शाते हैं कि बच्चों में एरोबिक गतिविधियों की कमी है।
    • उदाहरण: 333 स्कूलों में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि केवल तीन में से एक बच्चा बिना हाँफे दौड़ सकता है।
  • संरचित शारीरिक शिक्षा में गिरावट: स्कूलों में संगठित खेल और शारीरिक शिक्षा पर सीमित ध्यान बच्चों की समग्र फिटनेस को प्रभावित करता है।
  • स्क्रीन-आधारित निष्क्रिय जीवनशैली: बढ़ता हुआ स्क्रीन समय बच्चों को निष्क्रिय बनाता है और अस्वास्थ्यकर स्नैकिंग की आदतों को बढ़ावा देता है।
  • कमजोर शारीरिक शक्ति और फिटनेस स्तर: मांसपेशीय शक्ति में कमी यह संकेत देती है कि सक्रिय खेल और व्यायाम का स्तर कम है।
    • उदाहरण: स्कूल फिटनेस सर्वेक्षण में 49% बच्चों ने ऊपरी शरीर की शक्ति मानकों को और 44% बच्चों ने निचले शरीर की शक्ति मानकों को पूरा नहीं किया है।

समाज पर दीर्घकालिक प्रभाव

  • गैर-संचारी रोगों में वृद्धि: बाल्यावस्था मोटापा वयस्क अवस्था में मधुमेह, हृदय रोग और अन्य जीवनशैली-जनित बीमारियों के जोखिम को बढ़ाता है।
    • उदाहरण: बाल्यावस्था मोटापा आगे चलकर यकृत (liver) क्षति और कैंसर के जोखिम से भी जुड़ा हुआ है।
  • स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि: कम आयु में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की शुरुआत परिवारों और सरकार दोनों के लिए दीर्घकालिक स्वास्थ्य व्यय को बढ़ा देती है।
  • कार्यबल उत्पादकता में कमी: वयस्क अवस्था में खराब स्वास्थ्य परिणाम श्रम उत्पादकता और आर्थिक उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं।
    • उदाहरण: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार मोटापा अनुपस्थिति और दीर्घकालिक रोगों के कारण कार्यबल में कम भागीदारी से जुड़ा हुआ है।
  • पीढ़ी-दर-पीढ़ी मोटापे का संचरण: आनुवंशिक और व्यवहारगत कारणों से मोटापा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बना रह सकता है।
    • उदाहरण: विश्व मोटापा संघ (World Obesity Federation) के अनुसार मातृ मोटापा बच्चों में मोटापे की संभावना को बढ़ा देता है।
  • मानव पूँजी का क्षरण: बचपन में खराब स्वास्थ्य स्थिति संज्ञानात्मक विकास और समग्र मानव पूँजी निर्माण को कमजोर कर सकती है।
    • उदाहरण: वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 के अनुसार, लगभग 40% बच्चे स्वस्थ बीएमआई सीमा से बाहर हैं।

निष्कर्ष

बाल्यावस्था मोटापे की समस्या से निपटने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें स्कूल-आधारित शारीरिक शिक्षा, पीएम पोषण (PM POSHAN) योजना जैसे बेहतर पोषण कार्यक्रम, स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जन-जागरूकता तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संबंधी सशक्त हस्तक्षेप शामिल हों। बच्चों के लिए स्वस्थ वातावरण का निर्माण करना भारत की दीर्घकालिक मानव पूँजी को सुदृढ़ करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

Childhood obesity is emerging as a “silent epidemic” in India, reflecting changing lifestyles and nutrition patterns. Examine the social and behavioural factors contributing to the rise of childhood obesity in India and discuss its long-term implications for society. in hindi

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