प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत की व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ।
- संरचनात्मक चुनौतियाँ और गुणवत्ता की कमी जो भारत की व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रणाली को अप्रभावी और अनाकर्षक बनाती है।
- व्यावसायिक प्रशिक्षण को भारत के युवाओं के लिए एक आकांक्षापूर्ण मार्ग बनाने के लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं से सबक लेते हुए आवश्यक मौलिक सुधार।
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उत्तर
भारत ने 14,000+ औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI) और 25 लाख अधिकृत सीटों के साथ एक व्यापक व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण (VET) तंत्र स्थापित किया है। इस प्रभावशाली पैमाने के बावजूद, केवल लगभग 4% कार्यबल को औपचारिक कौशल प्रशिक्षण प्राप्त है, जो संस्थागत क्षमता और वास्तविक रोजगार क्षमता के बीच एक बड़े अंतर को दर्शाता है। कम रोजगार क्षमता (ITI स्नातकों के लिए 63%, 2022), पुराना पाठ्यक्रम, आधुनिक तकनीकों का अभाव और कमजोर उद्योग सहयोग इस प्रणालीगत कमियों को दर्शाते हैं, जो भारत के जनसांख्यिकीय लाभ का पूरा उपयोग करने में बाधा डालती हैं।
भारत की व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ
- ITIs और पॉलिटेक्निकों का विशाल नेटवर्क: 14,000 से अधिक ITIs दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों में प्रशिक्षण सुनिश्चित करते हैं, जिससे ग्रामीण और वंचित छात्रों को व्यावहारिक कौशल प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
- सरकारी नीतिगत प्रोत्साहन: स्किल इंडिया मिशन’ और PMKVY जैसी योजनाएँ कौशल विकास के व्यवस्थित प्रयासों को मजबूत करती हैं। ये योजनाएँ प्रशिक्षण को प्रमाणित और व्यवस्थित बनाती हैं, जिससे युवा इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित होते हैं।
- उदाहरण के लिए: जुलाई 2025 तक, PMKVY के अंतर्गत विनिर्माण, स्वास्थ्य, आईटी और निर्माण जैसे क्षेत्रों में 1.63 करोड़ से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित किया है जिससे उनकी नौकरी पाने की संभावनाएँ बढ़ी हैं।
- क्षेत्र कौशल परिषदें (SSC): उद्योग-विशेष SSCs राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक तैयार करते हैं, जो नई और उभरती हुई श्रम माँग के अनुरूप हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रशिक्षु वे कौशल प्राप्त करें जो वास्तव में रोजगार के लिए प्रासंगिक हो और जिसकी अधिक माँग हों।
- NEP 2020 प्रावधान: कक्षा 6 से ही व्यावसायिक प्रशिक्षण का समावेश प्रारंभिक शिक्षा में व्यावहारिक अनुभव लाता है और छात्रों को रोजगार के लिए तैयार करता है। यह उन्हें करियर विकल्पों के बारे में समझने और भविष्य के लिए तैयारी करने में मदद करता है।
- निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी: निजी क्षेत्र संस्थान उद्योग विशेषज्ञता, संसाधन और आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएँ प्रदान करता है। इसका परिणाम यह होता है कि सार्वजनिक संस्थानों में प्रशिक्षण की गुणवत्ता और प्रासंगिकता बढ़ती है।
- उदाहरण: महाराष्ट्र ने लगभग 5,000 कंपनियों को ITIs अपनाने और उद्योग की आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए आमंत्रित किया। इसका परिणाम यह है कि पाठ्यक्रम अब सीधे उद्योग की माँग से जुड़े हुए हैं और रोजगार योग्य कौशल प्रदान करते हैं।
संरचनात्मक चुनौतियाँ और गुणवत्ता की कमी
A. संरचनात्मक चुनौतियाँ
- शिक्षा में विलम्बित एकीकरण: विद्यालय की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही व्यावसायिक प्रशिक्षण (VET) में प्रवेश होने से प्रारंभिक कौशल निर्माण में देरी होती है। प्रारंभिक अवस्था में कौशल सीखना, रोजगार के लिए तैयार होने के लिए महत्वपूर्ण होता है।
- शैक्षणिक प्रगति के मार्ग की कमी: क्रेडिट ट्रांसफर की अनुपस्थिति छात्रों को उच्च शिक्षा के अवसरों की ओर बढ़ने से रोकती है। इसका अर्थ है कि यदि कोई छात्र ITI या व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करता है, तो उसके इस कौशल को विश्वविद्यालय में आगे पढ़ाई में मान्यता नहीं मिलती। इससे प्रतिभाशाली छात्र व्यावसायिक प्रशिक्षण के बजाय सामान्य शैक्षणिक मार्ग को चुनने को प्रेरित होते हैं।
- उदाहरण के लिए: सिंगापुर में पॉलीटेक्निक स्नातक अपने कौशल क्रेडिट के आधार पर सीधे विश्वविद्यालयों में प्रवेश कर सकते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वहां व्यावसायिक शिक्षा को भी उच्च शिक्षा के लिए मान्यता प्राप्त होती है।
- उद्योग जगत में कमजोर भागीदारी: उद्योग में न्यूनतम नियोक्ता सहभागिता, रोजगार बाजार में प्रशिक्षण की प्रासंगिकता को सीमित करती है। इसका अर्थ है कि छात्र जो कौशल सीख रहे हैं, वे उद्योग की वास्तविक आवश्यकताओं से मेल नहीं खा पाते और उनकी रोजगार क्षमता कम हो जाती है।
- उदाहरण: भारत में MSMEs GDP का लगभग 30% बनाते हैं, फिर भी ITIs के साथ उनका जुड़ाव कम है, क्योंकि उनके पास प्रशिक्षुता और प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।
- वित्तपोषण की कमी: पर्याप्त वित्तीय आवंटन न होने के कारण अवसंरचना के उन्नयन और आधुनिक उपकरणों का उपयोग सीमित रहता है। इसका अर्थ है कि प्रशिक्षण संस्थान, छात्रों को आधुनिक तकनीक और उपकरणों के साथ व्यावहारिक अनुभव नहीं दे पाते।
- उदाहरण के लिए: ITIs मुख्य रूप से सरकारी वित्त पर निर्भर हैं और अवसंरचना व प्रशिक्षण उपकरणों में निजी क्षेत्र का निवेश बहुत कम है। इससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता और आधुनिकता प्रभावित होती है।
B. गुणवत्ता की कमी
- पुराना पाठ्यक्रम और असंगति: पाठ्यक्रम में उभरती तकनीकों पर ध्यान नहीं दिया गया है, जिससे छात्रों की रोजगार प्राप्ति की संभावना कम हो जाती है। इसका अर्थ यह है कि जो कौशल छात्र सीखते हैं, वे वर्तमान उद्योग की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं हैं।
- प्रशिक्षकों की कमी और खराब प्रशिक्षण: शिक्षक पदों की रिक्तता शिक्षण की गुणवत्ता और व्यावहारिक प्रशिक्षण के अनुभव को कमजोर करती है। इसका परिणाम यह होता है कि छात्रों को पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं मिल पाता और उनके व्यावहारिक कौशल पर असर पड़ता है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय कौशल प्रशिक्षण संस्थानों (NSTI) की सीमित क्षमता के कारण ITI शिक्षक पदों का एक-तिहाई हिस्सा रिक्त रह जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि प्रशिक्षण संस्थानों में छात्रों को पर्याप्त और गुणवत्तायुक्त मार्गदर्शन नहीं मिल पाता।
- कमजोर निगरानी और फीडबैक: वास्तविक समय में मूल्यांकन की कमी के परिणामस्वरूप प्रशिक्षण संस्थानों में यह पता नहीं चल पाता कि किस स्तर पर सुधार की आवश्यकता है, और छात्रों की सीखने की प्रक्रिया लगातार बेहतर नहीं हो पाती।
- नकारात्मक सामाजिक धारणा: समाज में यह आम धारणा है कि अकादमिक पाठ्यक्रम में कम रुचि लेने वाले छात्र ही व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। अतः व्यावसायिक प्रशिक्षण को अक्सर अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिभाशाली छात्र इसमें शामिल होने से हतोत्साहित होते हैं।
- उदाहरण: PARAKH सर्वेक्षण 2024 (केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय) के अनुसार, केवल 29% योग्य माध्यमिक छात्र ही कौशल आधारित पाठ्यक्रम चुनते हैं, जो समाज की इस नकारात्मक धारणा को दर्शाता है।
VET को मजबूत करने के लिए मौलिक सुधार (वैश्विक सबक)
- VET का प्रारंभिक एकीकरण: NEP 2020 के तहत प्रारंभिक शिक्षा से ही व्यावहारिक कौशल प्रशिक्षण शुरू करना चाहिए, ताकि बच्चों में छोटी उम्र से ही रोजगारोन्मुख मानसिकता विकसित हो। इसका उद्देश्य यह होगा कि युवा शिक्षण के साथ-साथ रोजगार के लिए तैयार होने की सोच भी विकसित करें।
- उदाहरण: जर्मनी में उच्च माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक मॉड्यूल को स्कूल शिक्षा के साथ जोड़कर प्रशिक्षुओं को पेड प्रशिक्षुता (paid apprenticeships) के माध्यम से उद्योग अनुभव दिया जाता है। इससे छात्र शिक्षा के दौरान ही वास्तविक उद्योग अनुभव प्राप्त करते हैं और उनकी रोजगार क्षमता बढ़ती है।
- स्पष्ट शैक्षणिक प्रगति मार्ग स्थापित करना: राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क लागू किया जाना चाहिए ताकि छात्र अपने व्यावसायिक प्रशिक्षण के क्रेडिट को उच्च शिक्षा में स्थानांतरित कर सकें। इससे व्यावसायिक शिक्षा केवल अंतिम विकल्प नहीं रहेगी, बल्कि करियर सुधारने वाला और आकांक्षात्मक मार्ग बन जाएगी।
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- उदाहरण: यूरोपीय कौशल फ्रेमवर्क शैक्षणिक और व्यावसायिक मार्गों के बीच गतिशीलता सुनिश्चित करता है, जिससे छात्र जीवनभर सीखने के अवसर प्राप्त कर सकें और व्यावसायिक मार्ग के बाद भी उच्च शिक्षा में प्रवेश कर सकें।
- प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार: पाठ्यक्रमों को स्थानीय उद्योग की माँग के अनुसार तैयार किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय कौशल प्रशिक्षण संस्थानों का विस्तार किया जाए, शिक्षक रिक्तियों को भरा जाना चाहिए और ITIs का वास्तविक समय मूल्यांकन लागू किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य यह होता है कि प्रशिक्षण पूरी तरह रोजगार-उन्मुख और प्रासंगिक हो।
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- उदाहरण: दक्षिण कोरिया में K-MOVE स्कूल कार्यक्रम छात्रों को उद्योग-विशेष कौशल सिखाने वाले पाठ्यक्रम के माध्यम से सीधे रोजगार से जोड़ता है। इससे छात्रों की नौकरी पाने की संभावना बढ़ती है और प्रशिक्षण का वास्तविक लाभ मिलता है।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को बढ़ावा देना: सार्वजनिक-निजी साझेदारी (PPP) मॉडल का उपयोग करना चाहिए और CSR द्वारा वित्तपोषित कौशल विकास को अनिवार्य बनाना चाहिए। इससे प्रशिक्षण अधिक प्रासंगिक, रोजगारोन्मुख और उद्योग-केंद्रित बनता है।
- उदाहरण के लिए: असम में “50 हब, 500 स्पोक्स” मॉडल Tata-Nelco के सहयोग से स्कूलों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोबोटिक्स प्रशिक्षण प्रदान करता है। इससे छात्रों को आधुनिक तकनीकी कौशल सीखने का अवसर मिलता है और उनकी उद्योग में माँग बढ़ती है।
- वित्त पोषण और अनुदान स्वायत्तता बढ़ानी चाहिए: व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण में निवेश को वैश्विक स्तर तक बढ़ाना चाहिए और ITIs को नवाचार की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। इससे संस्थान अपनी अवसंरचना, प्रशिक्षण पद्धति और पाठ्यक्रम में सुधार कर सकेंगे और प्रशिक्षण की गुणवत्ता बढ़ेगी।
- उदाहरण के लिए: भारत अपनी कुल शिक्षा व्यय का केवल 3% व्यावसायिक शिक्षा पर खर्च करता है, जबकि जर्मनी और सिंगापुर जैसे देशों में यह 10-13% है। इसका मतलब है कि भारत में निवेश पर्याप्त नहीं है और इसे बढ़ाना आवश्यक है।
निष्कर्ष
यदि भारत में व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण को आकर्षक और आकांक्षापूर्ण विकल्प नहीं बनाया गया, तो हमारी विशाल जनसंख्या-संपदा एक जनसांख्यिकीय लाभ के बजाय बोझ में बदल सकती है। युवा वर्ग की ऊर्जा और क्षमता तभी उपयोगी होगी जब उन्हें गुणवत्ता-युक्त कौशल और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए। अतः वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप सुधार लागू करना अनिवार्य है। इससे भारत का कौशल पारितंत्र न केवल सुदृढ़ होगा, बल्कि यह नवाचार, रोजगार सृजन और समावेशी विकास को गति देने वाला प्रमुख इंजन बन सकता है।