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Q. चुनाव आयुक्तों के लिए नई चयन प्रक्रिया के संवैधानिक और शासन संबंधी निहितार्थों की आलोचनात्मक जाँच कीजिए। क्या चयन समिति की संरचना चुनावी लोकतंत्र की पर्याप्त सुरक्षा करती है? ऐसे सुधारों का सुझाव दीजिये जो संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखते हुए कार्यकारी विशेषाधिकार को संस्थागत स्वायत्तता के साथ संतुलित कर सकते है। (15 अंक, 250 शब्द)

February 28, 2025

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग 

  • चुनाव आयुक्तों के लिए नई चयन प्रक्रिया के सकारात्मक संवैधानिक और प्रशासनिक निहितार्थों का परीक्षण कीजिए।
  • चुनाव आयुक्तों की नई चयन प्रक्रिया के नकारात्मक संवैधानिक और प्रशासनिक निहितार्थों का परीक्षण कीजिए।
  • चर्चा कीजिए कि क्या चयन समिति की संरचना चुनावी लोकतंत्र को पर्याप्त रूप से सुरक्षित रखती है?
  • ऐसे सुधारों का सुझाव दीजिए जो संवैधानिक नैतिकता को कायम रखते हुए कार्यकारी विशेषाधिकार और संस्थागत स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाए रखें।

उत्तर

भारतीय चुनाव आयोग (ECI), अनुच्छेद 324 के तहत एक संवैधानिक निकाय है  जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है। हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 ने चयन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया है, जिससे चुनावी स्वायत्तता में कार्यकारी प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।

सकारात्मक संवैधानिक और प्रशासनिक निहितार्थ

  • चयन प्रक्रिया को विधायी समर्थन: नया कानून चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है, जिससे नियुक्तियों में स्पष्टता और प्रक्रियात्मक स्थिरता सुनिश्चित होती है। 
    • उदाहरण के लिए: पहले, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति औपचारिक विधायी निगरानी के बिना केवल प्रधानमंत्री की सिफारिश पर की जाती थी।
  • चुनावी प्रबंधन में निरंतरता: एक परिभाषित चयन प्रक्रिया समय पर नियुक्तियों को सुनिश्चित करती है, संस्थागत रिक्तियों को रोकती है और चुनाव आयोग के सुचारू कामकाज को बनाए रखती है। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2023 अधिनियम ने चुनावों के दौरान व्यवधानों को रोकने के लिए एक संरचित नियुक्ति तंत्र को संस्थागत बनाया।
  • संसदीय निगरानी में वृद्धि: यह प्रक्रिया अनुच्छेद 324(5) के अनुरूप है क्योंकि इसे संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था जो चुनाव संबंधी नियुक्तियों को लोकतांत्रिक जनादेश देता है। 
    • उदाहरण के लिए: उच्चतम न्यायलय  के वर्ष 2023 के निर्णय में नियुक्तियों को कार्यकारी विवेक पर छोड़ने के बजाय उन्हें विनियमित करने के लिए कानून बनाने का आह्वान किया गया था।
  • चयन समिति के माध्यम से कार्यकारी जवाबदेही: विपक्ष के नेता (LoP) के शामिल होने से सरकार समर्थित चयनों पर कुछ हद तक जाँच  सुनिश्चित होती है। 
    • उदाहरण के लिए: हाल ही में CEC की नियुक्ति में विपक्ष के नेता की असहमति ने चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता ला दी।
  • वैश्विक प्रथाओं के साथ संरेखण: कई लोकतंत्र चुनाव अधिकारियों की नियुक्ति में कार्यकारी विवेक की अनुमति देते हैं, जिससे नीति निरंतरता और प्रशासनिक दक्षता सुनिश्चित होती है। 
    • उदाहरण के लिए: जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव अधिकारियों की नियुक्ति करते हैं, कई यूरोपीय लोकतंत्रों में स्वतंत्र आयोग हैं, जो अधिक सूक्ष्म तुलना प्रदान करते हैं।

नकारात्मक संवैधानिक और प्रशासनिक निहितार्थ

  • बहुमत का नियंत्रण सरकार के पास: प्रधानमंत्री और एक मनोनीत कैबिनेट मंत्री स्थायी कार्यकारी बहुमत बनाते हैं, जिससे चयन निष्पक्षता कम हो जाती है। 
    • उदाहरण के लिए: हाल ही में CEC के चयन में  दो सरकारी सदस्यों ने विपक्ष के नेता की असहमति को मात दे दी।
  • अनुच्छेद 14 का संभावित उल्लंघन: चयन तंत्र पक्षपात को संस्थागत बनाता है, यह सुनिश्चित करके कि सरकार समर्थित उम्मीदवार हमेशा पद पर बने रहें। 
    • उदाहरण के लिए: आलोचकों का तर्क है कि पैनल की संरचना में तर्कसंगत आधार का अभाव है, जिससे इसे अनुच्छेद 14 के तहत चुनौती दी जा सकती है।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए जोखिम: कार्यकारी-नियंत्रित चुनाव आयोग में स्वतंत्रता की कमी हो सकती है, जिससे चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा कम हो सकता है। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 1993 के उच्चतम न्यायलय  के निर्णय में इस बात पर बल दिया गया था कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग को निष्पक्ष और स्वतंत्र रहना चाहिए।
  • मूल संरचना सिद्धांत का क्षरण: चुनावी अखंडता संविधान की मूल संरचना का एक हिस्सा है, और इसमें कोई भी कमी न्यायिक हस्तक्षेप को आमंत्रित कर सकती है। 
    • उदाहरण के लिए: केशवानंद भारती वाद (1973) में, न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि मूल संरचना को संसद द्वारा नहीं बदला जा सकता है।

चुनावी लोकतंत्र की सुरक्षा पर चयन समिति की चिंताएँ

  • संस्थागत संतुलन का अभाव: स्वतंत्र सदस्य न होने के कारण चयन समिति निष्पक्ष, योग्यता आधारित नियुक्तियाँ सुनिश्चित नहीं कर सकती। 
    • उदाहरण के लिए: हाल ही में, हुई नियुक्ति में विपक्ष के नेता की असहमति का निर्णय पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ा।
  • संस्थागत स्वायत्तता से समझौता: राजनीतिक रूप से नियुक्त चुनाव आयोग चुनावी प्रक्रियाओं में विश्वसनीयता और जनता का विश्वास खोने का जोखिम उठाता है। 
    • उदाहरण के लिए: चुनावी निर्णयों में पक्षपात के आरोप मतदाताओं के विश्वास को कम कर सकते हैं।
  • न्यायिक निगरानी का अभाव: पैनल से CJI को हटाने से चुनाव आयोग की नियुक्तियों में कार्यकारी हस्तक्षेप पर बाहरी जाँच  सीमित हो जाती है। 
    • उदाहरण के लिए: उच्चतम न्यायलय के वर्ष 2023 के निर्देश में तटस्थता बनाए रखने के लिए न्यायिक प्रतिनिधित्व की माँग  की गई थी।
  • पूर्वानुमानित सरकारी प्रभुत्व: प्रधानमंत्री द्वारा कैबिनेट मंत्री का नामांकन सत्तारूढ़ सरकार के लिए स्थायी बहुमत सुनिश्चित करता है। 
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 1991 की EC सुधार रिपोर्ट ने विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए द्विदलीय चयन पैनल की सिफारिश की।
  • नियुक्ति प्रक्रिया में चयनात्मक पारदर्शिता: खोज समिति की उम्मीदवार सूची अघोषित है, जिससे चयन में सार्वजनिक जवाबदेही सीमित हो जाती है। 
    • उदाहरण के लिए: पारदर्शिता के पक्षधरों का तर्क है कि शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की सार्वजनिक जाँच  से पक्षपात को रोका जा सकता है।

संस्थागत स्वायत्तता के साथ कार्यकारी विशेषाधिकार को संतुलित करने के लिए सुधार

  • सर्वसम्मति आधारित चयन मॉडल: चयन के लिए तीन-चौथाई बहुमत का नियम लागू करना चाहिए, जिससे सरकार की एकतरफा नीति को रोका जा सके। 
    • उदाहरण के लिए: CIC (मुख्य सूचना आयुक्त) चयन प्रक्रिया के लिए पैनल के सदस्यों के बीच बहुमत की सहमति की आवश्यकता होती है।
  • शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का सार्वजनिक प्रकटीकरण: उम्मीदवारों की सूची प्रकाशित करके और विशेषज्ञ प्रतिक्रिया आमंत्रित करके अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: UK चुनाव आयोग की नियुक्तियों में सार्वजनिक नामांकन और समीक्षा प्रक्रिया शामिल होती है।
  • निश्चित कार्यकाल और निष्कासन सुरक्षा: CEC और EC को उच्चतम न्यायलय  के न्यायाधीशों की तरह हटाने की सुरक्षा के साथ एक सुरक्षित कार्यकाल प्रदान करना चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: गोस्वामी समिति की रिपोर्ट (1990) ने सिफारिश की थी कि कार्यकारी विवेक पर EC को हटाया नहीं जाना चाहिए।
  • शॉर्टलिस्टिंग के लिए स्वतंत्र खोज समिति: चयन पैनल के समक्ष उम्मीदवारों का प्रस्ताव करने के लिए एक गैर-पक्षपाती विशेषज्ञ समिति की स्थापना करना चाहिए। 
    • उदाहरण के लिए: लोकपाल चयन प्रक्रिया में सरकार से स्वतंत्र एक खोज समिति शामिल होती है ।

लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है, जब संस्थाएँ दोषारोपण से परे रहती हैं। संवैधानिक सुरक्षा उपायों द्वारा समर्थित एक पारदर्शी, द्विदलीय चयन प्रक्रिया, कार्यकारी विशेषाधिकार का सम्मान करते हुए संस्थागत स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सकती है। संसदीय निगरानी को मजबूत करने, कॉलेजियम मॉडल को अपनाने और न्यायिक समीक्षा सुनिश्चित करने से संवैधानिक नैतिकता बनी रहेगी और अनुचित प्रभाव के खिलाफ चुनावी लोकतंत्र मजबूत होगा।

Critically examine the constitutional and governance implications of the new selection process for Election Commissioners. Does the composition of the selection committee adequately safeguard electoral democracy? Suggest reforms that balance executive prerogative with institutional autonomy while upholding constitutional morality. in hindi

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