Q. सहायक संधि प्रणाली केवल एक कूटनीतिक उपकरण नहीं थी, बल्कि एक रणनीतिक तंत्र थी जिसने भारत में ब्रिटिश राजनीतिक प्रभुत्व को सुगम बनाया। ब्रिटिश विस्तार के संदर्भ में सहायक संधि प्रणाली के उद्देश्यों, प्रमुख विशेषताओं और परिणामों का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

March 19, 2026

GS Paper IModern History

प्रश्न की मुख्य माँग

  • सहायक संधि प्रणाली के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
  • सहायक संधि प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिए। 
  • सहायक संधि प्रणाली के परिणामों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

सहायक संधि को लॉर्ड वेलेस्ली ने 1798 में लागू किया था। यह एक कूटनीतिक व्यवस्था थी, जिसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को प्रत्यक्ष विलय के बिना भारतीय रियासतों पर नियंत्रण करने की अनुमति दी। हालाँकि इसे एक सुरक्षात्मक उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन यह अप्रत्यक्ष शासन का एक रणनीतिक साधन बन गया, जिसने प्रभावी रूप से संप्रभुता को कमजोर किया और ब्रिटिश राजनीतिक प्रभुत्व को गति प्रदान की।

सहायक संधि प्रणाली के उद्देश्य

  • ब्रिटिश राजनीतिक प्रभुत्व की अप्रत्यक्ष स्थापना: इस प्रणाली का उद्देश्य भारतीय रियासतों को बिना औपचारिक विलय के ब्रिटिश नियंत्रण में लाना था, जिससे कंपनी बिना प्रत्यक्ष युद्ध के अपना प्रभाव बढ़ा सके।
  • बाहरी खतरों के विरुद्ध सुरक्षा घेरा बनाना: इसका लक्ष्य विशेष रूप से फ्राँसीसी प्रभाव को रोकना था, ताकि भारतीय राजनीति में केवल ब्रिटिश सैन्य उपस्थिति बनी रहे।
  • भारतीय सैन्य शक्ति को कमजोर करना: स्थानीय सेनाओं को समाप्त कर भारतीय शासकों को सैन्य रूप से निर्भर बना दिया गया, जिससे वे ब्रिटिश सत्ता का विरोध न कर सकें।
  • राजस्व सृजन और सैन्य व्यय में कमी: ब्रिटिश सैनिकों के रखरखाव का खर्च भारतीय रियासतों से वसूला जाता था, जिससे यह नीति आर्थिक रूप से लाभकारी बन गई।
  • भारतीय राज्यों के बीच गठबंधन रोकना: स्वतंत्र कूटनीति और युद्ध पर प्रतिबंध लगाकर राज्यों को अलग-थलग किया गया, जिससे किसी भी संयुक्त विरोध की संभावना समाप्त हो गई।
  • आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को वैध बनाना: ब्रिटिश रेजिडेंट की नियुक्ति के माध्यम से कंपनी को रियासतों के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप करने का अवसर मिला, जिसे ‘सुरक्षा’ के नाम पर उचित ठहराया गया।

सहायक संधि प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ

  • ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती: भारतीय शासकों को अपने राज्य में ब्रिटिश सैनिकों को रखना पड़ता था और उनका खर्च भी वही वहन करते थे। ये सैनिक पूरी तरह ब्रिटिश नियंत्रण में रहते थे।
  • बाहरी संबंधों पर प्रतिबंध: सहायक राज्यों को बिना ब्रिटिश अनुमति के कूटनीति या युद्ध करने की अनुमति नहीं थी, जिससे उनकी विदेश नीति की स्वायत्तता सीमित हो गई।
  • ब्रिटिश रेजिडेंट की नियुक्ति: प्रत्येक राज्य में एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त किया जाता था, जो आंतरिक और बाहरी मामलों की निगरानी करता था और अक्सर राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करता था।
  • स्थानीय सेनाओं का विघटन: राज्यों को अपनी स्वदेशी सेना को कम या समाप्त करने के लिए बाध्य किया गया, जिससे वे ब्रिटिश सुरक्षा पर निर्भर हो गए।
  • क्षेत्रीय दंड: यदि कोई राज्य सहायक सेना का खर्च वहन करने में असमर्थ होता, तो उसे अपने क्षेत्र का हिस्सा सौंपना पड़ता था।
    • उदाहरण: अवध को वर्ष 1801 में बकाया भुगतान के कारण अपने महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को सौंपना पड़ा।
  • यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों का निष्कासन: भारतीय राज्यों को सभी गैर-ब्रिटिश यूरोपीय, विशेषकर फ्राँसीसी अधिकारियों, को हटाना पड़ता था, जिससे अन्य औपनिवेशिक प्रभाव समाप्त हो गया।

सहायक संधि प्रणाली के परिणाम

  • संप्रभुता का क्षरण: भारतीय शासकों के पास केवल नाममात्र का नियंत्रण रह गया, जबकि वास्तविक अधिकार सैन्य, कूटनीति और प्रशासन में ब्रिटिशों के हाथ में चला गया।
    • उदाहरण: हैदराबाद (1798) और मैसूर (1799 के बाद) अप्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण में आ गए।
  • बिना युद्ध के विस्तार: इस प्रणाली ने ब्रिटिशों को बिना प्रत्यक्ष युद्ध के राजनीतिक और कूटनीतिक तरीके से विस्तार करने की सुविधा दी, जिससे लागत और विरोध दोनों कम हुए।
  • निर्भरता का जाल: भारतीय राज्य राजनीतिक और सैन्य रूप से ब्रिटिशों पर निर्भर हो गए, जिससे सामूहिक प्रतिरोध की संभावना कम हो गई।
  • भविष्य के विलयों का मार्ग प्रशस्त: इस व्यवस्था ने राज्यों की आंतरिक संरचनाओं को कमजोर किया, जिससे बाद में व्यपगत के सिद्धांत (Doctrine of Lapse) जैसी नीतियों को लागू करना आसान हो गया।
  • पारंपरिक संस्थाओं का ह्रास: स्थानीय सेनाओं के विघटन और प्रशासनिक स्वतंत्रता में कमी से पारंपरिक सत्ता संरचनाएँ कमजोर हो गईं।
  • ब्रिटिश राजनीतिक प्रभुत्व का सुदृढ़ीकरण: वर्ष 1805 तक अधिकांश प्रमुख भारतीय राज्यों ने इस संधि को स्वीकार कर लिया या उन्हें इसके लिए बाध्य किया गया, जिससे पूरे उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित हो गया।

निष्कर्ष 

सहायक संधि प्रणाली केवल एक कूटनीतिक उपाय नहीं थी, बल्कि एक सुविचारित साम्राज्यवादी रणनीति थी। इसने बिना औपचारिक विजय के ही संप्रभुता का क्षरण कर ब्रिटिशों को राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने और स्थानीय प्रतिरोध को कमजोर करने में सक्षम बनाया। इस प्रकार, इस प्रणाली ने भारत में ब्रिटिश उपस्थिति को व्यापारियों से शासकों में परिवर्तन की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

The Subsidiary Alliance system was not merely a diplomatic tool, but a strategic mechanism that facilitated British political domination in India. Examine the objectives, key features and consequences of the Subsidiary Alliance system in the context of British expansion. in hindi

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