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Q. भारत की खाद्य और पारिस्थितिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्राकृतिक पुनर्योजी कृषि (Natural Regenerative Farming) की भूमिका की जाँच कीजिए। इन कृषि प्रणालियों को मुख्यधारा में लाने की चुनौतियों और संभावित लाभों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

March 24, 2025

GS Paper IIIIndian Economy

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत की खाद्य एवं पारिस्थितिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्राकृतिक पुनर्योजी खेती की भूमिका का परीक्षण कीजिए।
  • इन कृषि प्रणालियों को मुख्यधारा में लाने की चुनौतियों पर चर्चा कीजिये।
  • इन कृषि प्रणालियों को मुख्यधारा में लाने के संभावित लाभों पर चर्चा कीजिये।

उत्तर

प्राकृतिक पुनर्योजी खेती (NRF) मृदा गुणवत्ता को बहाल करने, जैव विविधता को उन्नत करने और संधारणीय कृषि पद्धतियों के माध्यम से रासायनिक निर्भरता को कम करने पर केंद्रित है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, भारत की लगभग 30% मृदा क्षरित हो चुकी है, जिससे दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा को खतरा है। जलवायु परिवर्तन के तीव्र होने के साथ, पुनर्योजी विधियाँ कृषि उत्पादकता को बनाए रखते हुए पारिस्थितिक प्रत्यास्थता बढ़ाने के लिए एक व्यवहार्य समाधान प्रदान करती हैं।

भारत की खाद्य एवं पारिस्थितिकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्राकृतिक एवं पुनर्योजी कृषि की भूमिका

  • मृदा की उर्वरता बढ़ाना: ये कृषि प्रणालियाँ सूक्ष्मजीवी गतिविधि को बढ़ावा देकर, कार्बनिक पदार्थों को बढ़ाकर और रासायनिक इनपुट के कारण मृदा निम्नीकरण को कम करके
    मृदा गुणवत्ता में सुधार करती हैं।

    • उदाहरण के लिए: सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती (SPNF) पर एक अध्ययन में बताया गया है कि 15-दिन के अंतराल पर 10% जीवामृत के प्रयोग से पारंपरिक खेती की तुलना में मक्का के दाने की उपज में 8.65% की वृद्धि हुई।
  • जल की खपत कम करना: इसमें सिंचाई की कम आवश्यकता होती है  क्योंकि मृदा में मौजूद कार्बनिक पदार्थ, जल‌ प्रतिधारण क्षमता को बढ़ाते हैं जिससे भूजल पर निर्भरता कम होती है और सूखे के प्रभाव कम होते हैं।
    • उदाहरण के लिए: आंध्र प्रदेश में शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) से जल प्रतिधारण क्षमता में संभावित वृद्धि और अधिक जिम्मेदार सिंचाई की संभावना दिखी है।
  • जलवायु परिवर्तन शमन: ये प्रथाएँ मृदा में कार्बन को एकत्रित करती हैं, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करती हैं और सूखे व बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं के खिलाफ प्रत्यास्थता बढ़ाती हैं।
  • दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना: जैव विविधता को बढ़ाकर और बाहरी इनपुट पर निर्भरता को कम करके, ये विधियां भविष्य की कृषि उत्पादकता से समझौता किए बिना
    स्थिर खाद्य आपूर्ति प्रदान करती हैं।

    • उदाहरण के लिए: सिक्किम, जो भारत का पहला जैविक राज्य बना, में मृदा गुणवत्ता में सुधार और कीटों के कम संक्रमण के कारण खाद्य सुरक्षा में सुधार हुआ।
  • किसान कल्याण को बढ़ावा देना: ये प्रणालियाँ उर्वरकों और कीटनाशकों पर इनपुट लागत को कम करके किसानों की आय बढ़ाती हैं, जबकि बाजारों में जैविक उत्पादों के लिए प्रीमियम मूल्य प्राप्त होता है।

प्राकृतिक और पुनर्योजी खेती को मुख्यधारा में लाने की चुनौतियाँ

  • उपज अनिश्चितता: संक्रमण काल के दौरान प्रारंभिक उपज में कमी किसानों को प्राकृतिक कृषि की ओर जाने से हतोत्साहित करती है, जिससे अल्पकालिक खाद्य उत्पादन प्रभावित होता है।
  • बाजार पहुँच संबंधी समस्याएँ: किसानों को जैविक उत्पादों के लिए सीमित बाजार संपर्कों की समस्या का सामना करना पड़ता है  क्योंकि आपूर्ति श्रृंखलाएं और प्रमाणन प्रक्रियाएं अभी भी अविकसित हैं।
    • उदाहरण के लिए: सिक्किम के पूर्णतः जैविक होने के बावजूद, कई किसानों को प्रीमियम जैविक बाजारों तक पहुँच पाने में कठिनाई होती है, जिससे उनका वित्तीय लाभ सीमित हो जाता है।
  • जागरूकता और प्रशिक्षण का अभाव: कई किसानों में कृषि-पारिस्थितिकी सिद्धांतों के तकनीकी ज्ञान का अभाव है और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों पर मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए विस्तार सेवाएँ अपर्याप्त हैं।
  • प्रमाणीकरण और नियामक बाधाएँ: जैविक प्रमाणीकरण महंगा और समय लेने वाला है  जिससे लघु किसानों के लिए मान्यता प्राप्त करना और प्रीमियम मूल्यों से लाभ प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है।
  • नीति और सब्सिडी अंतराल: सरकारी नीतियाँ उर्वरक और कीटनाशक सब्सिडी के माध्यम से गहन कृषि (Intensive Farming) का पक्ष लेती हैं  जिससे किसानों के लिए प्राकृतिक कृषि को अपनाना आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो जाता है।
    • उदाहरण के लिए: छत्तीसगढ़ में गोधन न्याय योजना के कार्यान्वयन का उद्देश्य वित्तीय प्रोत्साहन के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा देकर नीतिगत अंतराल को दूर करना था।

प्राकृतिक और पुनर्योजी खेती को मुख्यधारा में लाने के संभावित लाभ

  • उच्च दीर्घकालिक उपज: समय के साथ, पुनर्योजी कृषि मृदा की गुणवत्ता को बहाल करती है जिससे स्थिर और बेहतर फसल उपज प्राप्त होती है, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
  • स्वस्थ एवं सुरक्षित भोजन: रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग बंद करने से विष-मुक्त भोजन प्राप्त होता है, जिससे कीटनाशकों के संपर्क और एंटीबायोटिक प्रतिरोध से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम कम होते हैं।
  • पर्यावरण संरक्षण: ये विधियाँ मृदा अपरदन को कम करती हैं, जल प्रदूषण को रोकती हैं और जैव विविधता को बढ़ाती हैं, जिससे दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता में योगदान मिलता है।
  • किसानों के लिए लागत बचत: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग बंद करने से इनपुट लागत कम हो जाती है, लाभ मार्जिन बढ़ जाता है और लघु किसानों के लिए कृषि अधिक व्यवहार्य हो जाती है।
  • जलवायु प्रत्यास्थता और संधारणीयता: ये पद्धतियां खेतों को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक प्रत्यास्थ बनाती हैं जिससे चरम मौसम के कारण होने वाला फसलों का नुकसान कम हो जाता है।

प्राकृतिक पुनर्योजी कृषि भारत की खाद्य और पारिस्थितिकी सुरक्षा की कुंजी है परंतु इसकी सफलता नीति समर्थन, बाजार प्रोत्साहन और किसान जागरूकता पर निर्भर करती है। पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक नवाचारों के साथ मिलाकर एक बहु-हितधारक दृष्टिकोण, कृषि को एक प्रत्यास्थ, संधारणीय और जलवायु-अनुकूल क्षेत्र में परिवर्तित कर सकता है।

Examine the role of natural regenerative farming in ensuring India’s food and ecological security. Discuss the challenges and potential benefits of mainstreaming these farming systems. in hindi

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