प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सकारात्मक प्रभाव
- भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव
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उत्तर
प्रस्तावना
ओपेक (OPEC) से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे प्रमुख उत्पादकों का बाहर निकलना ‘कार्टेल-आधारित’ तेल प्रबंधन से ‘प्रतिस्पर्द्धी ऊर्जा भू-राजनीति’ की ओर एक बड़े बदलाव को दर्शाता है। भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देश के लिए, यह स्थिति दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अवसर और जोखिम दोनों उत्पन्न करती है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सकारात्मक प्रभाव
- कीमतों में गिरावट : संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों द्वारा स्वतंत्र उत्पादन बढ़ाने से वैश्विक आपूर्ति बढ़ सकती है और कच्चे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है, जिससे भारत का आयात व्यय कम होगा।
- उदाहरण: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है, जिसके परिणामस्वरूप कीमतों में कमी आने से राजकोषीय दबाव सीधे तौर पर कम हो जाता है (पेट्रोलियम मंत्रालय)।
- आपूर्तिकर्ता विविधता: ओपेक (OPEC) के बाहर के उत्पादकों की सक्रियता कार्टेल निर्भरता को सीमित करती है तथा भारत को कच्चे तेल के आयात में विविध विकल्प प्रदान करती है।
- बेहतर सौदेबाजी: ओपेक के एकाधिकार में कमी से बेहतर कीमतों पर दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंध सुरक्षित करने में भारत की बातचीत करने की शक्ति में सुधार होता है।
- उदाहरण: हालिया वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के बाद भारत ने रूस, यू.ए.ई., इराक और अमेरिका से अपने आयात में विविधता लाई है।
- रणनीतिक साझेदारी: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की स्वतंत्र तेल कूटनीति, ओपेक (OPEC) की सीमाओं से परे जाकर भारत-यू.ए.ई. ऊर्जा सहयोग को और अधिक सुदृढ़ कर सकती है।
- उदाहरण: भारत और यू.ए.ई. ने CEPA (2022) पर हस्ताक्षर किए और ऊर्जा एवं रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) में आपसी सहयोग का विस्तार किया।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का लाभ: अल्पकालिक कीमतों में गिरावट भारत को कम लागत पर अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को भरने की अनुमति देती है, जिससे आपातकालीन तैयारियों में सुधार होता है।
- उदाहरण: भारत ने ऊर्जा सुरक्षा के लिए विशाखापत्तनम, मंगलूरू और पादुर में अपनी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) सुविधाओं का विस्तार किया है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव
- मूल्य अस्थिरता (Price Volatility): ओपेक (OPEC) के कमजोर होने से अनियंत्रित प्रतिस्पर्द्धा और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव हो सकता है।
- उदाहरण: यू.ए.ई. के बाहर निकलने से चल रहे अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है।
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य का जोखिम: पश्चिम एशिया में संघर्ष और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास होने वाले व्यवधान भारत के कच्चे तेल की आपूर्ति मार्गों के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं।
- उदाहरण: वैश्विक तेल परिवहन का लगभग पाँचवाँ हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जो सीधे तौर पर भारत के आयात को प्रभावित करता है।
- आपूर्ति में व्यवधान: क्षेत्रीय युद्ध, रिफाइनिंग (शोधन) और उत्पादन सुविधाओं को नुकसान पहुँचा सकते हैं, जिससे अचानक कमी और आयात संबंधी अनिश्चितता उत्पन्न हो सकती है।
- रणनीतिक अनिश्चितता: यदि सऊदी अरब जैसे और देश ओपेक (OPEC) छोड़ते हैं, तो बाजार की अस्थिरता और गहरा सकती है, जिससे पूर्वानुमानित आपूर्ति तंत्र कमजोर हो सकते हैं।
- उदाहरण: यू.ए.ई. के बाहर निकलने के बाद ओपेक के अन्य सदस्यों द्वारा भी ऐसा ही किए जाने की संभावना।
- आयात निर्भरता: कम कीमतों के बावजूद, भारत बाहरी आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भर (~85%) बना हुआ है, जो इसे वैश्विक अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनाता है।
निष्कर्ष
भारत को इस परिवर्तन को एक अवसर और चेतावनी दोनों के रूप में देखना चाहिए। आयात में विविधता लाने और खाड़ी देशों के साथ मजबूत साझेदारी के साथ-साथ, स्थायी ऊर्जा सुरक्षा के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का सुदृढ़ीकरण और ग्रीन हाइड्रोजन का विकास अनिवार्य है।