प्रश्न की मुख्य माँग
- भारतीय किसानों के बढ़ते कर्ज के कारणों की व्याख्या कीजिए।
- भारतीय किसानों के बढ़ते कर्ज से उत्पन्न चुनौतियाँ।
- कृषि स्थिरता में सुधार हेतु रणनीतियों की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
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उत्तर
भूमिका
भारत में कृषि ऋणग्रस्तता हाल के वर्षों में और गंभीर हो गई है, विशेषकर कोविड-19 महामारी के बाद, जबकि उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई है। छोटे और सीमांत किसान बढ़ती लागत और ऋण की सीमित पहुँच के कारण निरंतर कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। इसके कारणों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना, सतत् समाधान खोजने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
मुख्य भाग
भारतीय किसानों की बढ़ती ऋणग्रस्तता के कारण
- घटती जोत का आकार: कृषि क्षेत्र के औसत आकार में कमी के कारण पैमाने की अर्थव्यवस्था कम हो जाती है, जिससे किसानों के लिए पर्याप्त आय अर्जित करना कठिन हो जाता है।
- उदाहरण: औसत जोत वर्ष 1991 में 1.34 हेक्टेयर से घटकर वर्ष 2021-22 में 0.74 हेक्टेयर रह गई, जिससे छोटे किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है।
- उत्पादन लागत में वृद्धि: उर्वरक, कीटनाशक जैसे इनपुट की लागत बढ़ रही है, जबकि उत्पादकता समानुपातिक रूप से नहीं बढ़ी है।
- संस्थागत ऋण तक सीमित पहुँच: छोटे आकार के खेत और संपार्श्विक की कमी के कारण किसानों को अनौपचारिक, उच्च ब्याज स्रोतों से ऋण लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
- उदाहरण: NAFIS (2021-22) के अनुसार 24.5% किसान अब भी साहूकारों से अधिक ब्याज पर ऋण लेते हैं।
- बाजार तक सीमित पहुँच: भंडारण, ग्रेडिंग और मानकीकरण ढाँचे की कमी के कारण किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
- कोविड-19 का प्रभाव: आपूर्ति-शृंखला में व्यवधान और परिचालन लागत में वृद्धि से मौजूदा संकट और बढ़ गया।
कृषि ऋणग्रस्तता से उत्पन्न चुनौतियाँ
- जीविकोपार्जन पर असर: बढ़ता कर्ज किसानों की आय को कम कर गरीबी और अस्थिरता को बढ़ाता है।
- उदाहरण: वर्ष 2022 में किसानों की आत्महत्याओं की संख्या 11,290 रही, जिसका एक कारण किसानों पर बढ़ता कर्ज है।
- उत्पादकता में कमी: कर्ज के कारण किसान तकनीक और मशीनीकरण में निवेश नहीं कर पाते।
- उदाहरण: बढ़ते कर्ज के बावजूद, प्रमुख दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों की उत्पादकता स्थिर बनी हुई है, जिससे वित्तीय स्थिति और खराब हो रही है।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव: किसानों की घटती क्रय-शक्ति से ग्रामीण व्यवसाय और सेवाएँ प्रभावित होती हैं।
- उदाहरण: छोटे और सीमांत किसान, जो कृषि जनसंख्या का 92% हैं, वित्तीय संकट से जूझते हैं, जिससे रोजगार और आय प्रभावित होती है।
- सामाजिक अस्थिरता: बढ़ते कर्ज के कारण उत्पन्न वित्तीय संकट के व्यापक सामाजिक प्रभाव होते हैं, जिनमें पारिवारिक तनाव और सामाजिक अशांति में वृद्धि शामिल है।
- दीर्घकालिक विकास में बाधा: स्थायी ऋणग्रस्तता किसानों को जीवन-निर्वाह चक्र में फँसाकर दीर्घकालिक कृषि विकास में बाधक बनती है।
कृषि की स्थिरता बढ़ाने के उपाय
- सहकारी कृषि को बढ़ावा: सहकारी कृषि से छोटे किसानों को ऋण तक बेहतर पहुँच प्राप्त करने और अपनी उपज के लिए बेहतर मूल्य प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
- उदाहरण: किसान उत्पादक संगठन (FPOs) ने विपणन और सामूहिक क्रय-विक्रय में सफलता प्राप्त हुई है।
- आय विविधीकरण: पशुधन, मुर्गीपालन और अन्य कृषि गतिविधियों में विविधीकरण को प्रोत्साहित करने से किसानों की मूल्य और मौसम संबंधी समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता को कम करने में मदद मिल सकती है।
- इनपुट का इष्टतम उपयोग: उर्वरक और कीटनाशकों का विवेकपूर्ण उपयोग लागत घटाकर संसाधन दक्षता बढ़ा सकता है।
- बाजार संपर्क मजबूत करना: किसानों और मूल्य शृंखला के बीच सीधा संपर्क स्थापित कर उचित मूल्य और बिचौलियों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
- वित्तीय समावेशन हेतु नीतिगत समर्थन: छोटे किसानों को संस्थागत ऋण तक आसान पहुँच और समय पर ऋण प्रवाह सुनिश्चित करना आवश्यक है।
निष्कर्ष
भारत में बढ़ती कृषि ऋणग्रस्तता का समाधान सहकारी कृषि, आय विविधीकरण, इनपुट दक्षता और मजबूत बाजार संपर्क में निहित है। साथ ही, संस्थागत ऋण तक पहुँच को सुदृढ़ करना, किसानों को सशक्त बनाएगा और कृषि को दीर्घकालिक रूप से सतत् एवं लचीला (resilient) बनाएगा।