प्रश्न की मुख्य माँग
- लैंगिक न्याय के संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
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उत्तर
लैंगिक न्याय का अर्थ है सभी लिंगों के साथ निष्पक्ष और समान व्यवहार, जिसमें गरिमा, भेदभाव-रहित अवसर और सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों में समान सहभागिता सुनिश्चित की जाए। भारतीय संविधान ने लैंगिक न्याय को सशक्त संवैधानिक आधार प्रदान किया है, जो समानता, गरिमा और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर आधारित है।
लैंगिक न्याय पर संवैधानिक दृष्टिकोण
- कानून के समक्ष समानता
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-14 — सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की गारंटी देता है।
- मामला: नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (वर्ष 2018) समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया, जिससे गरिमा और समानता के अधिकार को सशक्त किया गया।
- लिंग आधारित भेदभाव का निषेध
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-15(1) — धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है।
- मामला: जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (वर्ष 2018) — धारा 497 (व्यभिचार कानून) को रद्द कर महिलाओं की स्वायत्तता, गरिमा और निजता की रक्षा की गई।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-15(3) — महिलाओं के लिए सकारात्मक भेदभाव की अनुमति देता है।
- मामला: राज्य मध्यप्रदेश बनाम हीरालाल (वर्ष 1996) — महिलाओं के पक्ष में संरक्षणात्मक भेदभाव को वैध ठहराया गया।
- सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-16 रोजगार में समान अवसर की गारंटी देता है।
- मामला: सचिव, रक्षा मंत्रालय बनाम बबिता पुनिया (वर्ष 2020) महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया गया।
- यौन उत्पीड़न से सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थल
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-21 — गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जीने के अधिकार को सुनिश्चित करता है।
- मामला: विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (वर्ष 1997) — सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने हेतु दिशा-निर्देश जारी किए।
- राज्य नीति निदेशक तत्त्व
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-39(a), 39(d), और 42 समान कार्य के लिए समान वेतन, आजीविका का अधिकार, मातृत्व राहत और मानवीय कार्य दशाएँ सुनिश्चित करते हैं।
- मामला: रणधीर सिंह बनाम भारत संघ (1982) “समान कार्य के लिए समान वेतन” के सिद्धांत को न्यायिक मान्यता दी गई।
- वैयक्तिक कानून और पारिवारिक क्षेत्र
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-14, 15 और 21 — निजी कानूनों में भी समानता और निष्पक्षता का पालन आवश्यक बनाते हैं।
- मामला: शायरा बानो बनाम भारत संघ (वर्ष 2017) तत्काल तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया गया।
- सामाजिक बहिष्कार से सुरक्षा
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-15(2) — किसी भी नागरिक को धर्म, जाति या लिंग के आधार पर सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित नहीं किया जा सकता।
- मामला: भारतीय युवा वकील संघ बनाम केरल राज्य (वर्ष 2018) महिलाओं के सभी आयु वर्गों को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई।
- गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
- मामला: कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (वर्ष 2018) निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराते हुए “गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार” प्रदान किया गया।
- लैंगिक विविधता की मान्यता
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-14 और 21 समानता और गरिमा के अधिकार के अंतर्गत ट्रांसजेंडर अधिकारों को शामिल करते हैं।
- मामला: NALSA बनाम भारत संघ (वर्ष 2014) ट्रांसजेंडर को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी गई और उन्हें मौलिक अधिकार प्रदान किए गए।
निष्कर्ष
हालाँकि भारत ने लैंगिक न्याय की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन समानता पाने के लिए निरंतर कानूनी सुधार, सामाजिक जागरूकता और संविधान-संगत लैंगिक संवेदनशील न्यायिक दृष्टिकोण आवश्यक हैं। ऐसे सतत् प्रयासों से ही भारतीय संविधान की गरिमा, समानता और न्याय की परिकल्पना वास्तविक जीवन में साकार हो सकेगी।
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