प्रश्न की मुख्य माँग
- आर्थिक विश्वास का निर्माण: उभरते आयाम
- चुनौतियाँ और आर्थिक विश्वास को गहरा करने की आवश्यकता
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उत्तर
भूगोल, संस्कृति और इतिहास में निहित भारत-नेपाल संबंध भावुकता से आर्थिक व्यावहारिकता की ओर विकसित हो रहे हैं। जहाँ पिछले संबंधों में राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखने को मिले थे, वहीं वर्तमान दौर में संपर्क, व्यापार और ऊर्जा सहयोग के माध्यम से पारस्परिक विकास पर जोर दिया जा रहा है। समान परस्पर निर्भरता पर आधारित आर्थिक विश्वास अब दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय सद्भाव सुनिश्चित करने की कुँजी है।
आर्थिक विश्वास का निर्माण: उभरते आयाम
- द्विपक्षीय व्यापार और बाजार पहुँच का विस्तार: भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और पारगमन मार्ग बना हुआ है, जो नेपाल के 60% से अधिक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है।
- उदाहरण: नए व्यापार सुविधा तंत्रों के सहयोग से, द्विपक्षीय व्यापार 13 अरब अमेरिकी डॉलर (वित्त वर्ष 2023-24) तक पहुँच गया।
- सीमा पार ऊर्जा सहयोग: भारत-नेपाल विद्युत व्यापार समझौता (2022) 10 वर्षों में भारत को 10,000 मेगावाट बिजली निर्यात करने की अनुमति देता है, जिससे नेपाल एक उभरता हुआ जलविद्युत केंद्र बन जाएगा।
- उदाहरण: भारत वर्तमान में धालकेबर-मुजफ्फरपुर ट्रांसमिशन लाइन के माध्यम से नेपाल से 1,000 मेगावाट से अधिक बिजली का आयात करता है।
- बुनियादी ढाँचा और संपर्क परियोजनाएँ: बढ़ी हुई सड़क, रेल और ट्रांसमिशन संपर्क नई परस्पर निर्भरता पैदा कर रहे हैं।
- उदाहरण: जयनगर-बरदीबास रेलवे (2022) चालू। मोतिहारी-अमलेखगंज पेट्रोलियम पाइपलाइन (2019) का वर्ष 2024 में चितवन तक विस्तार किया गया।
- निवेश और वित्तीय एकीकरण: भारत का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नेपाल के विनिर्माण, दूरसंचार और बैंकिंग क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
- उदाहरण: एसबीआई नेपाल लिमिटेड, आईटीसी, डाबर और जीएमआर की अपर करनाली परियोजना दीर्घकालिक आर्थिक जुड़ाव का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- पर्यटन और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था: आर्थिक संबंध साझा विरासत और गतिशीलता से सुदृढ़ होते हैं।
- उदाहरण: बुद्ध सर्किट परियोजना और कुशीनगर-लुंबिनी के बीच सीधी उड़ानें पर्यटन-आधारित विकास को बढ़ावा देती हैं।
- डिजिटल और फिनटेक सहयोग: सीमापार यूपीआई एकीकरण (2024) सुगम भुगतान की सुविधा प्रदान करता है, जो वित्तीय प्रणालियों में बढ़ते विश्वास को दर्शाता है।
- लचीलेपन और स्थिरता के लिए पारस्परिक निर्भरता: नेपाल भारत के बाजार और बंदरगाहों पर निर्भर है, जबकि भारत अपनी उत्तरी सीमा पर नवीकरणीय ऊर्जा, जल संसाधन और भू-राजनीतिक स्थिरता प्राप्त करता है।
चुनौतियाँ और आर्थिक विश्वास को गहरा करने की आवश्यकता
- व्यापार असंतुलन और टैरिफ संवेदनशीलताएँ: भारत के साथ नेपाल का बड़ा व्यापार घाटा (लगभग 9 अरब अमेरिकी डॉलर) आर्थिक चिंता को बढ़ाता है और विविध निर्यात की माँग करता है।
- नीतिगत अनिश्चितता और परियोजनाओं में देरी: नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता अक्सर सीमा पार परियोजनाओं को रोक देती है।
- उदाहरण: नीतिगत प्रतिबद्धताओं में उतार-चढ़ाव के कारण ऊपरी करनाली जलविद्युत परियोजना में देरी हुई।
- पारगमन और रसद संबंधी बाधाएँ: कई व्यापार मार्गों के बावजूद, बीरगंज और सुनौली जैसे सीमावर्ती बिंदुओं पर प्रक्रियात्मक अक्षमताएँ तथा अक्षम बुनियादी ढाँचा बना हुआ है।
- ऊर्जा मूल्य निर्धारण और राजस्व-साझाकरण के मुद्दे: नेपाल जलविद्युत निर्यात पर उचित मूल्य निर्धारण और अधिक स्वायत्तता चाहता है, जिसके लिए पारदर्शी विद्युत-व्यापार तंत्र की आवश्यकता है।
- भू-राजनीतिक दबाव और तृतीय-पक्ष प्रभाव: ट्रांस-हिमालयन कनेक्टिविटी नेटवर्क के माध्यम से चीन की बढ़ती उपस्थिति कभी-कभी भारत-नेपाल समन्वय को जटिल बना देती है।
- परियोजनाओं के प्रति पर्यावरणीय और स्थानीय प्रतिरोध: जलविद्युत और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को अक्सर विस्थापन और पारिस्थितिकी चिंताओं के कारण विरोध का सामना करना पड़ता है।
- पिछले राजनीतिक कारणों से विश्वास की कमी: वर्ष 2015 की सीमा नाकेबंदी जैसी घटनाओं ने नेपाल में जनता में आक्रोश उत्पन्न किया; विश्वास के पुनर्निर्माण के लिए निरंतर आर्थिक निष्पक्षता और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
आर्थिक परस्पर निर्भरता भारत-नेपाल कूटनीति का नया आधार बन गई है। व्यापार, संपर्क और ऊर्जा सहयोग, राजनीतिक अस्थिरता से व्यावहारिक स्थिरता की ओर संबंधों को नया आकार दे रहे हैं।