Q. संसद के भीतर सांसदों की वाक् स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित है, फिर भी संस्थागत अनुशासन के अधीन है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • सांसदों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित है।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संस्थागत अनुशासन के अधीन है।

उत्तर

संसदीय लोकतंत्र स्वतंत्र और निर्भीक बहस पर आधारित है। संविधान सांसदों को सदन में वाक् की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, फिर भी यह विशेषाधिकार संवैधानिक सीमाओं और प्रक्रियात्मक नियमों के दायरे में ही काम करता है। स्वतंत्रता और अनुशासन के मध्य का तनाव भारत की संसदीय संस्कृति की स्थिति को निर्धारित करता है।

सांसदों की वाक् की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित है

  • स्पष्ट संवैधानिक गारंटी: अनुच्छेद-105(1) सांसदों को संसद में वाक् की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जो अनुच्छेद-19(1)(a) से स्वतंत्र है।
    • उदाहरण: यह विशेषाधिकार विपक्ष के नेताओं को बाहरी जवाबदेही के डर के बिना बोलने में सक्षम बनाता है।
  • कानूनी कार्यवाही से छूट: अनुच्छेद-105(2) सांसदों को संसद में कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी मत के लिए अदालती कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करता है।
    • उदाहरण: बहस के दौरान दिए गए बयानों के लिए सांसदों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जिससे निर्भीक विचार-विमर्श सुनिश्चित होता है।
  • विधायी कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक: वाक् की स्वतंत्रता सरकारी नीतियों की जाँच और कार्यपालिका की जवाबदेही को सक्षम बनाती है।
    • उदाहरण: संवैधानिक विशेषज्ञ इवोर जेनिंग्स ने इस बात पर जोर दिया कि संसदीय सरकार के लिए विपक्ष की आलोचना आवश्यक है।
  • संसदीय विशेषाधिकारों का हिस्सा: वाक् की स्वतंत्रता को सुचारू विधायी कार्यप्रणाली के लिए अपरिहार्य एक मूल विशेषाधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है।
    • उदाहरण: एर्स्किन मे के सिद्धांत विधायी स्वायत्तता के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की केंद्रीयता को रेखांकित करते हैं।
  • सरकारी अभिलेखों में संरक्षण: सांसद को संसदीय कार्यवाही में अपने भाषण को रिकॉर्ड कराने का अधिकार है।
    • उदाहरण: बजट सत्र के दौरान भाषणों के कुछ अंशों को हटाए जाने की शिकायत अधिकारों के उल्लंघन की चिंताओं को दर्शाती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संस्थागत अनुशासन के अधीन है

  • संवैधानिक सीमाओं के अधीन: अनुच्छेद-121 सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को प्रतिबंधित करता है, सिवाय निष्कासन प्रस्तावों के दौरान।
    • उदाहरण: यह न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, जबकि विशिष्ट संदर्भों में संसदीय बहस को सीमित करता है।
  • कार्यप्रणाली नियमों द्वारा विनियमित: दोनों सदनों के नियम व्यवस्था और मर्यादा बनाए रखने के लिए बहसों को विनियमित करते हैं।
    • उदाहरण: विचाराधीन मामले और मानहानिकारक आरोप प्रक्रिया नियमों के अंतर्गत प्रतिबंधित हैं।
  • हटाने की शक्ति – नियम 380: अध्यक्ष/अध्यक्ष असंसदीय, मानहानिकारक या अभद्र शब्दों को हटा सकते हैं।
  • गरिमा और व्यवस्था का रखरखाव: संस्थागत अनुशासन अव्यवस्था, व्यक्तिगत हमलों और संसदीय पवित्रता के क्षरण को रोकता है।
    • उदाहरण: साथी सदस्यों की सत्यनिष्ठा पर प्रश्न उठाने पर प्रतिबंध मर्यादा की रक्षा करता है।
  • अध्यक्ष का विवेकाधिकार: अध्यक्ष/चेयरमैन बहस और अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए कार्यवाही को नियंत्रित करते हैं।

निष्कर्ष

संसद में वाक् की स्वतंत्रता संवैधानिक सुरक्षा कवच है, न कि प्रक्रियात्मक रियायत। हालाँकि अनुशासन व्यवस्था बनाए रखता है, लेकिन इसे लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का दमन नहीं करना चाहिए। विचार-विमर्श की गरिमा को बहाल करने के लिए रिकॉर्ड हटाने संबंधी स्पष्ट दिशा-निर्देश, पीठासीन अधिकारियों के निर्णयों में अधिक पारदर्शिता और सरकार तथा विपक्ष के बीच सम्मान का पुनरावलोकन आवश्यक है।

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