प्रश्न की मुख्य माँग
- पश्चिमी घाट संरक्षण हेतु गाडगिल एवं कस्तूरीरंगन समितियों के मध्य प्रमुख अंतर।
- पर्यावरण संरक्षण, विकास एवं आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करने से जुड़ी संघर्षपूर्ण स्थितियों एवं चुनौतियाँ।
- सतत् संरक्षण हेतु दीर्घकालिक दृष्टिकोण जो पर्यावरणीय एवं सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं में समन्वय।
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उत्तर
परिचय
पश्चिमी घाट, जो लगभग 1,500 किमी. लंबा जैव विविधता हॉटस्पॉट है, लंबे समय से पारिस्थितिकी संरक्षण एवं विकासात्मक दबावों के मध्य तनाव का क्षेत्र रहा है। गाडगिल समिति (2011) ने लगभग 1,29,037 वर्ग किमी. क्षेत्र को पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESAs) के रूप में व्यापक संरक्षण का प्रस्ताव दिया, जिसमें पारिस्थितिकी शुद्धतावाद (Ecological Purism) पर बल दिया गया। इसके विपरीत, कस्तूरीरंगन समिति (2013) ने विकासात्मक व्यावहारिकता (Developmental Pragmatism) का दृष्टिकोण अपनाया। इसने अध्ययन क्षेत्र को 1,64,280 वर्ग किमी. तक विस्तारित किया तथा इसमें 60% क्षेत्र को सांस्कृतिक भूपरिदृश्य और शेष 40% (~60,000 वर्ग किमी) को प्राकृतिक भूपरिदृश्य के रूप में वर्गीकृत किया। इसे आगे वर्ष 2024–2026 के मसौदा अधिसूचनाओं में संशोधित कर 56,825.7 वर्ग किमी. को बाध्यकारी ESA के रूप में निर्धारित किया गया है।
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गाडगिल बनाम कस्तूरीरंगन: प्रमुख अंतर
- पारिस्थितिकी शुद्धतावाद बनाम विकासात्मक व्यावहारिकता: गाडगिल समिति ने खनन, बड़े निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों पर कठोर प्रतिबंधों के साथ व्यापक ESA कवरेज पर बल दिया, जबकि कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के 60% क्षेत्र को “सांस्कृतिक भूपरिदृश्य” मानते हुए मानव-प्रधान गतिविधियों को स्वीकार किया और ESA क्षेत्र को सीमित किया।
- हितधारकों की भागीदारी: गाडगिल समिति की सिफारिशों की आलोचना स्थानीय आजीविका के अपर्याप्त ध्यान के कारण हुई। इसके विपरीत, कस्तूरीरंगन समिति ने राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया को शामिल करते हुए चरणबद्ध अधिसूचनाएँ और संरक्षण हेतु वित्तीय प्रोत्साहनों का प्रस्ताव दिया।
- उदाहरण: केरल ने कार्डमम हिल्स में लगभग 1,000 वर्ग किमी. क्षेत्र को ESA से बाहर करने के लिए संशोधन किया।
- प्रतिबंधों की कठोरता: गाडगिल समिति ने घाट क्षेत्र में कृषि, बागान और बस्तियों सहित लगभग सभी मानव गतिविधियों पर व्यापक प्रतिबंधों की सिफारिश की, जबकि कस्तूरीरंगन समिति ने “सांस्कृतिक भूपरिदृश्य” में सीमित गतिविधियों की अनुमति देकर अधिक व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाया।
- क्रियान्वयन की व्यवहार्यता: गाडगिल समिति की सिफारिशों को बड़ी संख्या में प्रभावित गाँवों एवं आर्थिक गतिविधियों के कारण लागू करना कठिन माना गया। इसके विपरीत, कस्तूरीरंगन समिति ने चरणबद्ध अधिसूचनाओं के माध्यम से उच्च जैव-विविधता वाले “प्राकृतिक भूपरिदृश्य” क्षेत्रों को प्राथमिकता देकर क्रियान्वयन को अधिक व्यावहारिक बनाया।
क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ
- राज्य-स्तरीय असहमति: कर्नाटक और केरल के मध्य ESA सीमांकन को लेकर निरंतर विवाद बना हुआ है, जिससे अंतिम अधिसूचना में देरी हो रही है। 12 वर्षों के से चल रहे राज्य स्तरीय गतिरोध को समाप्त करने हेतु पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) जुलाई 2026 की मसौदा समाप्ति से पूर्व चरणबद्ध, राज्य-वार अंतिमकरण ढाँचे के तहत अनुपालन करने वाले राज्यों (गुजरात, गोवा, महाराष्ट्र) को पहले अधिसूचित कर रहा है, जबकि संजय कुमार विशेषज्ञ समिति (2022–2026) शेष राज्यों (केरल, कर्नाटक) के मुद्दों का समाधान कर रही है।
- उदाहरण: महाराष्ट्र ने उद्योग एवं खनन के लिए लगभग 378 गाँवों को ESA से बाहर रखने की माँग की।
- शहरीकरण एवं आर्थिक दबाव: उच्च जनसंख्या घनत्व, बागान कृषि तथा नकदी फसलों के कारण पारिस्थितिकी संरक्षण एवं आजीविका आवश्यकताओं के मध्य संतुलन स्थापित करना चुनौतीपूर्ण है।
- नागरिक समाज एवं जमीनी स्तर की चिंताएँ: गोवा, केरल, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र में हुए विरोध प्रदर्शनों से स्पष्ट है कि संरक्षण नीतियों और स्थानीय आर्थिक हितों के मध्य तनाव विद्यमान है।
आगे की राह
- चरणबद्ध एवं लचीला ESA सीमांकन: पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को राज्य-वार अधिसूचित किया जाए, जिससे अनुकूलन प्रबंधन संभव हो सके।
- वित्तीय एवं आजीविका प्रोत्साहन: संरक्षण प्रयासों के लिए स्थानीय समुदायों को क्षतिपूर्ति देने हेतु पर्यावरणीय सेवाओं के लिए भुगतान लागू किया जाए।
- उदाहरण: कस्तूरीरंगन समिति ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु अनुदान सहायता की सिफारिश की थी।
- सहभागी शासन: राज्य सरकारों, स्थानीय समुदायों एवं वैज्ञानिक विशेषज्ञों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए। साथ ही पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के केंद्रीकरण एवं वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के विकेंद्रीकृत अधिकारों के मध्य उत्पन्न वैधानिक संघर्ष को ग्राम सभा की सहमति के माध्यम से स्थानीय हरित माइक्रो-जोनिंग को अनिवार्य बनाकर हल किया जाए।
- निगरानी एवं प्रवर्तन को सुदृढ़ करना: उपग्रह चित्रण, GIS तकनीक तथा समय-समय पर ऑडिट के माध्यम से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए, जिससे विकास कार्यों को बाधित किए बिना पर्यावरण संरक्षण संभव हो सके।
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निष्कर्ष
गाडगिल समिति के पारिस्थितिकी शुद्धतावाद (Ecological Purism) से कस्तूरीरंगन समिति के विकासात्मक व्यावहारिकता (Developmental Pragmatism) की ओर हुआ परिवर्तन यह दर्शाता है कि जैव विविधता संरक्षण और मानव आजीविका के बीच संतुलन आवश्यक है। पश्चिमी घाटों का सतत् प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए अनुकूली नीतियाँ, हितधारक सहभागिता, वित्तीय प्रोत्साहन तथा सुदृढ़ निगरानी तंत्र की आवश्यकता है, जिससे दीर्घकालिक पारिस्थितिकी एवं सामाजिक-आर्थिक लचीलापन सुनिश्चित किया जा सके।