प्रश्न की मुख्य माँग
- अमेरिका का पश्चिमी गोलार्द्ध की ओर झुकाव और यूरोप पर कम ध्यान।
- वर्ष 2026 में भारतीय कूटनीति के अवसर।
- मध्यम शक्तियों के लिए सकारात्मक निहितार्थ।
- मध्यम शक्तियों के लिए नकारात्मक निहितार्थ।
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उत्तर
शीतयुद्ध के बाद का “एकध्रुवीय दौर” अब एक गतिशील बहुध्रुवीयता में परिवर्तित हो रहा है। अमेरिका अपने घरेलू लचीलेपन और अपने आस-पास के क्षेत्रों में रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा को प्राथमिकता देने के लिए अपनी वैश्विक प्रतिबद्धताओं को पुनर्परिभाषित कर रहा है, ऐसे में किसी एक महाशक्ति की अनुपस्थिति क्षेत्रीय शक्तियों को विखंडित भू-राजनीतिक परिदृश्य में अधिक प्रभाव डालने का अवसर प्रदान करती है।
अमेरिका का पश्चिमी गोलार्द्ध की ओर झुकाव और यूरोप पर कम ध्यान
- रणनीतिक कटौती: अमेरिका, अमेरिका में चीनी प्रभाव का मुकाबला करने के लिए व्यापक यूरोपीय सुरक्षा गारंटी के बजाय “निकटवर्ती क्षेत्रों” और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है।
- उदाहरण: अमेरिका-मैक्सिको-कनाडा समझौता (USMCA) और आर्थिक समृद्धि के लिए अमेरिकी साझेदारी (APEP) इस परिवर्तन को दर्शाते हैं।
- भार-वहन साझा करना: वाशिंगटन यूरोपीय सहयोगियों से अपनी सुरक्षा संरचना का नेतृत्व करने की अपेक्षा कर रहा है, जिससे अमेरिकी “सुरक्षा कवच” का दायरा घट रहा है।
- उदाहरण: नाटो सदस्यों से GDP के 2% रक्षा व्यय लक्ष्य को पूरा करने के लिए अमेरिका द्वारा बार-बार की जाने वाली माँगें इसी बदलाव को दर्शाती हैं।
- हिन्द प्रशांत क्षेत्र की प्राथमिकता: अटलांटिक क्षेत्र को आवंटित संसाधनों को अब हिन्द प्रशांत क्षेत्र की ओर मोड़ा जा रहा है, ताकि समकक्ष प्रतियोगियों को नियंत्रित किया जा सके।
- उदाहरण: AUKUS गठबंधन और क्वाड यूरो-केंद्रित परंपरावाद से एक बदलाव का संकेत देते हैं।
- आर्थिक संरक्षणवाद: “मुद्रास्फीति निवारण अधिनियम” की ओर झुकाव “किलेबंदी वाले अमेरिकी” (Fortress America) दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो वैश्विक व्यापार नियंत्रण की तुलना में घरेलू उद्योग को प्राथमिकता देता है।
- उदाहरण: CHIPS अधिनियम के तहत दी जाने वाली सब्सिडी ने यूरोपीय प्रौद्योगिकी दिग्गजों के साथ टकराव उत्पन्न किया है।
वर्ष 2026 में भारतीय कूटनीति के लिए अवसर
- सामरिक स्वायत्तता: एक लचीली व्यवस्था भारत को राष्ट्रीय हितों के आधार पर प्रतिद्वंद्वी गुटों के साथ जुड़कर “बहु-संरेखण” बनाए रखने की अनुमति देती है।
- उदाहरण: अमेरिका के साथ रक्षा संबंधों को मजबूत करते हुए भारत द्वारा रूसी S-400 प्रणालियों की निरंतर खरीद।
- वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व: जैसे-जैसे अमेरिका का ध्यान अपने आंतरिक मामलों पर केंद्रित हो रहा है, भारत G20 जैसे मंचों पर विकासशील देशों की चिंताओं को प्रमुखता से उठा सकता है।
- उदाहरण: भारत की अध्यक्षता में अफ्रीकी संघ को G20 में शामिल करना।
- तकनीकी संप्रभुता: भारत “चीन प्लस वन” रणनीति का लाभ उठाकर वैश्विक सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा केंद्र बन सकता है।
- उदाहरण: भारत-अमेरिका iCET (महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पहल)।
- समुद्री सुरक्षा: भारत हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में सुरक्षा की कमी को “नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर” के रूप में पूरा कर सकता है।
- उदाहरण: मिशन सागर और अरब सागर में समुद्री डकैती विरोधी अभियान।
मध्यम शक्तियों के लिए सकारात्मक निहितार्थ
- सौदेबाजी क्षमता में वृद्धि: बहुध्रुवीयता ‘गुट संबंधी ब्लैकमेलिंग’ को रोकती है, जिससे भारत को बेहतर व्यापार और प्रौद्योगिकी सौदों पर बातचीत करने का लाभ मिलता है।
- उदाहरण: EFTA देशों के साथ भारत का व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौता (TEPA)।
- संस्थागत सुधार: एकध्रुवीयता के पतन से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और IMF में ‘सुधारित बहुपक्षवाद’ की माँग में तेजी आई है।
- उदाहरण: पश्चिमी वित्तीय वर्चस्व को चुनौती देने के लिए ब्रिक्स में छह नए सदस्यों को शामिल करना।
- क्षेत्रीय वर्चस्व: भारत अत्यधिक हस्तक्षेप के बिना दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में अपना प्रभाव मजबूत कर सकता है।
- उदाहरण: परिवहन कनेक्टिविटी के लिए बिम्सटेक मास्टर प्लान।
- रक्षा स्वदेशीकरण: एकल वर्चस्व पर निर्भरता कम होने से सह-विकास के माध्यम से घरेलू सैन्य-औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
- उदाहरण: भारत और अमेरिका के बीच GE-F414 जेट इंजन के सह-उत्पादन का समझौता।
मध्यम शक्तियों के लिए नकारात्मक निहितार्थ
- सुरक्षा अस्थिरता: वैश्विक स्तर पर निगरानी रखने वाले किसी नियामक की अनुपस्थिति क्षेत्रीय संघर्षों को बढ़ाती है और महत्त्वपूर्ण वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित करती है।
- उदाहरण: हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में उत्पन्न की गई अशांति से भारतीय व्यापार पर प्रभाव पड़ा है।
- आर्थिक विखंडन: बढ़ते संरक्षणवाद और ‘मित्र देशों के साथ व्यापार’ के कारण व्यापार युद्ध छिड़ गए हैं, जिससे निर्यात-उन्मुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुँचा है।
- उदाहरण: अमेरिका और यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) से भारतीय इस्पात निर्यात प्रभावित हुआ है।
- आक्रामक पड़ोसी: अमेरिका की कथित पीछे हटने की प्रवृत्ति चीन जैसी संशोधनवादी शक्तियों को यथास्थिति सीमा नियमों को बदलने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।
- उदाहरण: पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर निरंतर तनाव बना हुआ है।
- संसाधन प्रतिस्पर्द्धा: बहुध्रुवीयता महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिए प्रतिस्पर्द्धा को जन्म देती है, जिससे मध्यम शक्तियों के लिए उच्च तकनीक आपूर्ति शृंखलाओं से बाहर होने की संभावना बढ़ जाती है।
- उदाहरण: भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के लिए महत्त्वपूर्ण गैलियम और जर्मेनियम पर चीन द्वारा लगाए गए निर्यात प्रतिबंध।
निष्कर्ष
भारत को घरेलू क्षमताओं को मजबूत करते हुए और मुद्दों पर आधारित गठबंधन निर्मित करते हुए इस ‘द्विध्रुवीय विशेषताओं वाले बहुध्रुवीय विश्व’ में आगे बढ़ना होगा। ‘ग्लोबल वेस्ट’ और ‘ग्लोबल साउथ’ के बीच संबंधों में संतुलन बनाकर भारत एक ‘संतुलनकारी शक्ति’ से ‘अग्रणी शक्ति’ में परिवर्तित हो सकता है, जिससे एक स्थिर, नियम-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था सुनिश्चित हो सकेगी।
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