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Q. सरकारों को कानून और व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों की चिंताओं को दूर करने के लिए मौलिक अधिकारों से संबंधित  चिंताओं को दूर करने  की जरूरत है। अनुराधा भसीन और फहीमा शिरीन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में चर्चा करें। (250 शब्द, 15अंक)

July 7, 2023

GS Paper IIIndian Polity

उत्तर:

दृष्टिकोण:

  • परिचय: लोकतांत्रिक समाज में कानून और व्यवस्था सुनिश्चित करने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के बीच सरकार और नागरिकों के निरंतर रस्साकशी के मुद्दे को संबोधित कर उत्तर की शुरुआत करें।
  • मुख्य विषयवस्तु :
    • अनुराधा भसीन मामले पर चर्चा करें।
    • फाहीमा शिरीन मामले पर चर्चा करें।
    • दोनों निर्णयों के आलोक में सामाजिक कल्याण के लिए कानून और व्यवस्था के महत्व पर विचार करें।
  • निष्कर्ष: अनुराधा भसीन और फहीमा शिरीन मामलों से सबक लेते हुए, सरकारों को कानून और व्यवस्था और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डालें।

प्रस्तावना:

दुनिया भर की सरकारों को कानून और व्यवस्था बनाए रखने के बीच मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में कई दुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। एक लोकतांत्रिक सरकार को इन दोनों पहलुओं के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना चाहिए ताकि न्यायसंगत समाज के कामकाज को सुनिश्चित किया जा सके । यह विशेष रूप से उन स्थितियों में प्रासंगिक हो जाता है, जहां सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा जैसे मुद्दे प्रकाश में आते हैं। अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले और फहीमा शिरीन आर.के. बनाम केरल राज्य और अन्य मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के दो प्रमुख फैसले इस तनाव को उजागर करते हैं

मुख्य विषयवस्तु:

अनुराधा भसीन मामला:

  • जम्मू और कश्मीर में अनिश्चितकालीन इंटरनेट शटडाउन के मुद्दे को संबोधित करते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुराधा भसीन मामले (2020) में अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 19(1)(g) के आलोक में कहा कि किसी भी क्षेत्र में इंटरनेट के अनिश्चितकालीन निलंबन ‘की अनुमति नहीं है। इसके अतिरिक्त भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और किसी भी पेशे का अभ्यास करने, या इंटरनेट पर कोई भी व्यवसाय, व्यापार या व्यवसाय करने का अधिकार है
  • अदालत ने हालांकि स्पष्ट रूप से इंटरनेट के उपयोग को मौलिक अधिकार घोषित नहीं किया किन्तु इस बात पर जोर दिया कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इंटरनेट पर किसी भी व्यापार या व्यवसाय को करने के लिए संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
  • अदालत ने अपने निर्णय में अभिनिर्धारित किया कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य अपनी शक्तियों के माध्यम से इंटरनेट के उपयोग पर प्रतिबंध लगा सकता है किन्तु ऐसे किसी भी प्रतिबंध को आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

फाहीमा शिरीन मामला:

  • दूसरी ओर फाहीमा शिरीन मामले (2019) में केरल उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ निजता के अधिकार का भी हिस्सा बन जाता है ।
  • उच्च न्यायालय ने हॉस्टल के उस नियम की आलोचना की जिसमें विशिष्ट घंटों के दौरान मोबाइल फोन के उपयोग को प्रतिबंधित किया गया था, उच्च न्यायालय ने इसे अनुचित घुसपैठ के रूप में देखा ।
  • इस निर्णय में एक स्पष्ट उदाहरण मौजूद था, जहां अदालत ने प्रशासनिक सुविधा के बजाय व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों का पक्ष लिया।

इन दोनों मामलों में न्यायालय ने नागरिक अधिकारों के पक्ष फैसला सुनाया था साथ ही  न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि समाज के समग्र कल्याण के लिए कानून और व्यवस्था बनाए रखना महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने माना कि सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए आवश्यक परिस्थितियों में मौलिक अधिकारों पर कुछ उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

निष्कर्ष :

सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसले कानून और व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं। वे संकेत देते हैं कि हालांकि व्यक्तिगत अधिकार सर्वोपरि हैं किन्तु वे पूर्ण नहीं हैं और सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे बड़े सामाजिक लक्ष्यों के लिए उन्हें उचित रूप से प्रतिबंधित किया जा सकता है। हालाँकि इसके लिए एक स्पष्ट विधायी ढांचे की आवश्यकता है जो ऐसे प्रतिबंधों की प्रकृति और सीमा को रेखांकित करे। ये मामले भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में राज्य के कर्तव्यों और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच नाजुक संतुलन बनाए रखने की महत्वपूर्ण आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

Governments need to strike a balance between maintaining law and order and addressing the citizens concerns related to fundamental rights. Discuss in the light of Supreme Court judgement in Anuradha Bhasin and Faheema Shirin case in hindi

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