प्रश्न की मुख्य माँग
- जमीनी स्तर के लोकतंत्र की स्वायत्तता में कमी: निर्णय-निर्माण का कमजोर होना।
- पेसा (PESA) से संबंधित समस्याएँ।
- स्थानीय वित्तपोषण से संबंधित मुद्दे।
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उत्तर
परिचय
ग्रामीण विकास मंत्रालय के वर्ष 2026 ग्राम सभा सर्वेक्षण के अनुसार, 18–28% ग्रामीण नागरिक कमजोर परिणामों के कारण ग्राम सभा की बैठकों में भाग नहीं लेते, जो दर्शाता है कि जमीनी स्तर का लोकतंत्र अब स्व-शासन संस्था के बजाय योजनाओं के क्रियान्वयन के मंच के रूप में कार्य करता जा रहा है।
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जमीनी स्तर के लोकतंत्र की स्वायत्तता में कमी: निर्णय-निर्माण का कमजोर होना
- योजना-केंद्रित शासन: ग्राम सभाएँ स्थानीय विकास प्राथमिकताओं का निर्धारण करने के बजाय केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन पर अधिक केंद्रित होती जा रही हैं।
- सीमित स्थानीय योजना निर्माण: स्थानीय मुद्दों पर कम चर्चा होने से सहभागी योजना निर्माण में पंचायतों की भूमिका कमजोर हो रही है।
- उदाहरण: मंत्रालय के सर्वेक्षण के अनुसार, ग्राम सभा के समय का केवल 13% स्थानीय मुद्दों की पहचान पर व्यतीत होता है।
- नागरिकों का कमजोर प्रभाव: जन-आवश्यकताओं पर अपर्याप्त अनुवर्ती कार्रवाई से लोगों की भागीदारी घटती है तथा लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर होती है।
- उदाहरण: ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) सर्वेक्षण, 2026 के अनुसार, 18–28% उत्तरदाताओं ने कम भागीदारी का प्रमुख कारण “परिणामों का अभाव” बताया।
- प्रशासनिक वर्चस्व: डिजिटल अनुपालन एवं रिपोर्टिंग में अधिकारियों का अधिक समय व्यतीत होने से सार्थक जन-विमर्श के लिए सीमित अवसर बचते हैं।
- उदाहरण: निर्णय ऐप (NIRNAY App) तथा ग्राम सभा की कार्यवाही को रियल-टाइम अपलोड करने पर बढ़ता जोर।
- स्थानीय सहमति में कमी: स्थानीय समुदायों को प्रभावित करने वाले निर्णय ग्राम सभाओं के बजाय उच्च स्तर के प्राधिकारियों द्वारा अधिक लिए जा रहे हैं।
- उदाहरण: अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानीय परामर्श के अभाव के बावजूद भूमि अधिग्रहण एवं खनन स्वीकृतियों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है।
पेसा (PESA) से संबंधित समस्याएँ
- सहमति का कमजोर होना: ग्राम सभा की पूर्व एवं सूचित सहमति देने या अस्वीकार करने की वैधानिक शक्ति की अक्सर अनदेखी की जाती है।
- उदाहरण: पेसा (PESA) अधिनियम, 1996 के अनुसार, अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण से पूर्व ग्राम सभा की सहमति आवश्यक है।
- औपचारिक स्वीकृति: कम उपस्थिति का उपयोग कभी-कभी वास्तविक सामुदायिक भागीदारी के बिना स्वीकृति को उचित ठहराने के लिए किया जाता है।
- खनन संबंधी विवाद: स्थानीय विरोध के बावजूद संसाधनों का दोहन जारी रहता है, जिससे स्व-शासन कमजोर होता है।
- उदाहरण: हसदेव अरण्य में कोयला खनन के लिए ग्राम सभा की सहमति को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों ने इस विवाद को उजागर किया।
- वन अधिकारों की उपेक्षा: विकास परियोजनाओं के दौरान वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत समुदायों के अधिकारों का पर्याप्त सम्मान नहीं किया जाता।
- संवैधानिक भावना का क्षरण: पेसा (PESA) का उद्देश्य स्व-शासन को सुदृढ़ करना था, किंतु प्रशासनिक नियंत्रण के कारण ग्राम सभाएँ केवल परामर्शदात्री निकाय बनकर रह गई हैं।
- उदाहरण: पेसा (PESA) ने अनुसूचित क्षेत्रों के लिए संविधान के भाग IX का विशेष शक्तियों के साथ विस्तार किया, फिर भी इसका प्रभावी क्रियान्वयन कमजोर बना हुआ है।
स्थानीय वित्तपोषण से संबंधित मुद्दें
- बंधित अनुदान: शर्तों से जुड़े अनुदान पंचायतों को स्थानीय स्तर पर पहचानी गई प्राथमिकताओं पर व्यय करने से सीमित करते हैं।
- उदाहरण: 14वें एवं 15वें वित्त आयोग के अनुदानों में पेयजल एवं स्वच्छता को प्राथमिकता दी गई।
- स्वयं के राजस्व की कमजोरी: सीमित कराधान शक्तियों के कारण पंचायतों की उच्च सरकारों पर निर्भरता बढ़ जाती है।
- उदाहरण: मंत्रालय के सर्वेक्षण के अनुसार, ग्राम सभा की केवल 4% चर्चाएँ राजस्व सृजन पर केंद्रित होती हैं।
- केंद्र की प्राथमिकताओं का प्रभुत्व: व्यय स्थानीय विकास योजनाओं के बजाय केंद्र प्रायोजित योजनाओं के अनुरूप होता जा रहा है।
- वित्तीय निर्भरता: आर्थिक निर्भरता पंचायतों की सौदेबाजी क्षमता तथा नीतिगत स्वायत्तता को कमजोर करती है।
- घटती जनभागीदारी: जब वित्तीय निर्णय पहले से ही उच्च स्तर की सरकारों द्वारा निर्धारित होते हैं, तो नागरिकों की भागीदारी में रुचि कम हो जाती है।
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निष्कर्ष
जमीनी स्तर के लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए पेसा (PESA) का प्रभावी क्रियान्वयन, अधिक वित्तीय स्वायत्तता तथा अबंधित स्थानीय वित्त सुनिश्चित करते हुए ग्राम सभाओं को वास्तविक निर्णय-निर्माण संस्थाओं के रूप में पुनर्स्थापित करना आवश्यक है। इससे 73वें संविधान संशोधन के लोकतांत्रिक स्व-शासन एवं सहभागी विकास के उद्देश्य को साकार किया जा सकेगा।