प्रश्न की मुख्य माँग
- हीट एक्शन प्लान (HAPs) की उपलब्धियों की चर्चा कीजिए।
- बताइए कि हीट एक्शन प्लान अपनी सीमाओं तक क्यों पहुँच गए हैं।
- वर्णन कीजिए कि भारत को राष्ट्रीय शीतलन सिद्धांत की आवश्यकता क्यों है?
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उत्तर
बढ़ते तापीय जोखिमों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हीट एक्शन प्लान (HAPs) का विस्तार किया है, जबकि 16वें वित्त आयोग ने समर्पित वित्तीय सहायता सुनिश्चित करने हेतु लू (Heatwave) को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की सिफारिश की है। यह स्थिति व्यापक और संरचनात्मक सुधारों की तात्कालिक आवश्यकता को दर्शाती है।
हीट एक्शन प्लान (HAPs) की उपलब्धियाँ
- पूर्व चेतावनी प्रणाली: हीट एक्शन प्लानों ने अग्रिम चेतावनी और मौसम-आधारित परामर्श व्यवस्थाओं को सुदृढ़ किया, जिससे संवेदनशील समूहों को अत्यधिक गर्मी की घटनाओं से पहले तैयारी करने में सहायता मिली।
- उदाहरण: भारत मौसम विज्ञान विभाग अहमदाबाद जैसे शहरों के हीट एक्शन प्लानों से समन्वित लू संबंधी चेतावनियाँ जारी करता है।
- जन-जागरूकता: जल सेवन, अत्यधिक गर्म समय से बचाव तथा प्राथमिक उपचार संबंधी जागरूकता अभियानों ने तात्कालिक स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में मदद की।
- उदाहरण: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण प्रत्येक गर्मी के मौसम में पर्याप्त जल सेवन, दोपहर के समय बाहर जाने से बचाव तथा सामुदायिक जागरूकता अभियानों को प्रोत्साहित करता है।
- आपातकालीन राहत: जल केंद्रों, छायायुक्त बस स्टॉप तथा शीतलन आश्रयों जैसी अल्पकालिक राहत व्यवस्थाओं ने अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने वाली आबादी को तत्काल सहायता प्रदान की।
- संस्थागत प्रतिक्रिया: लू को आपदा प्रबंधन विमर्श का हिस्सा बनाए जाने से स्वास्थ्य, शहरी और श्रम विभागों के बीच समन्वय में सुधार हुआ।
- उदाहरण: कई राज्य अब राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत वार्षिक जिला स्तरीय ताप-तैयारी योजनाएँ तैयार करते हैं।
- वित्तीय प्रोत्साहन: लू को आपदा संबंधी मुद्दे के रूप में मान्यता मिलने से अधिक मजबूत वित्तीय सहायता तंत्र विकसित करने की दिशा में गति मिली।
- उदाहरण: 16वें वित्त आयोग ने केंद्रीय वित्तीय सहायता सुनिश्चित करने हेतु लू को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की सिफारिश की है।
हीट एक्शन प्लान अपनी सीमाओं तक क्यों पहुँच गए हैं?
- अल्पकालिक दृष्टिकोण: अधिकांश योजनाएँ दीर्घकालिक रूप से असुरक्षित आंतरिक और बाहरी तापमान के जोखिम को कम करने के बजाय केवल अस्थायी राहत उपायों पर आधारित हैं।
- कमजोर गुणवत्ता: कई हीट एक्शन प्लान स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलन किए बिना अन्य क्षेत्रों से प्रतिलिपि रूप में अपनाए गए हैं, जिससे विविध जलवायु क्षेत्रों में उनकी प्रभावशीलता घट जाती है।
- इनडोर गर्मी की उपेक्षा: कारखानों, गोदामों और वितरण केंद्रों में कार्यरत श्रमिक अब भी अत्यधिक गर्मी के संपर्क में रहते हैं, क्योंकि अधिकांश योजनाएँ मुख्यतः बाहरी तापमान पर केंद्रित हैं।
- कमजोर क्रियान्वयन: योजनाओं के अस्तित्व के बावजूद उनका प्रभावी कार्यान्वयन और निरीक्षण विशेषकर श्रम-प्रधान कार्यस्थलों में कमजोर बना हुआ है।
- उदाहरण: बार-बार जारी परामर्शों के बावजूद असंगठित श्रमिकों और वितरण कर्मियों के लिए कार्यस्थल पर शीतलन सुरक्षा उपाय प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाए हैं।
- जलवायु असंगति: यूरोप से अपनाए गए समाधान भारतीय परिस्थितियों में पूरी तरह प्रभावी नहीं हैं, क्योंकि भारत की गर्मी अधिक आर्द्र, लंबी अवधि वाली और अधिक तीव्र होती है, जिसके लिए स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित उपायों की आवश्यकता है।
भारत को राष्ट्रीय शीतलन सिद्धांत की आवश्यकता क्यों है
- सार्वजनिक स्वास्थ्य का अधिकार: सुरक्षित आंतरिक तापमान को केवल मौसमी परामर्श का विषय न मानकर सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकार के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
- कार्यस्थल मानक: कारखानों, गोदामों, रसोईघरों, कॉल सेंटर्स और वितरण केंद्रों के लिए न्यूनतम अनिवार्य शीतलन मानक निर्धारित किए जाने आवश्यक हैं।
- निष्क्रिय शीतलन उपाय: परावर्तक छतों और निष्क्रिय शीतलन सामग्री जैसे व्यापक रूप से लागू किए जा सकने वाले उपाय महँगे वातानुकूलन पर निर्भरता को कम कर सकते हैं।
- उदाहरण: तेलंगाना और अहमदाबाद के शीतल छत कार्यक्रमों ने परावर्तक सतहों के माध्यम से आंतरिक तापमान में कमी प्रदर्शित की है।
- ऊर्जा-कुशल प्रौद्योगिकी: घनी शहरी आबादी वाले क्षेत्रों के लिए जिला-स्तरीय शीतलन प्रणालियाँ और भारतीय विद्युत तंत्र के अनुकूल किफायती ऊर्जा-कुशल तथा वातानुकूलक आवश्यक हैं।
- ऊर्जा संबंधी यथार्थवाद: शीतलन नीति को आर्थिक वहन क्षमता को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए, क्योंकि अधिकांश भारतीय पश्चिमी देशों जैसी व्यापक यांत्रिक शीतलन व्यवस्था का खर्च वहन नहीं कर सकते।
- उदाहरण: भारत का विद्युत तंत्र स्थापित क्षमता का केवल लगभग 60% ही उपलब्ध करा पाता है, जिससे सार्वभौमिक वातानुकूलन पर निर्भरता व्यावहारिक नहीं है।
निष्कर्ष
जैसे-जैसे हीटवेव अधिक लंबी और घातक होती जा रही हैं, भारत को मौसमी आपातकालीन प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर एक स्थायी शीतलन संरचना विकसित करनी होगी। राष्ट्रीय शीतलन सिद्धांत ताप प्रबंधन को अस्थायी राहत व्यवस्था से निकालकर सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा पर आधारित ढाँचे में परिवर्तित कर सकता है।