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Q. भारत में अवैध शराब के सेवन को बढ़ावा देने वाले सामाजिक-आर्थिक कारकों पर प्रकाश डालिए। यह विश्लेषण कीजिए कि पूर्ण शराबबंदी नीतियाँ अक्सर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में क्यों विफल रहती हैं। इस सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए उपयुक्त उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

June 2, 2026

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अवैध शराब की समस्या को बढ़ावा देने वाले सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की चर्चा कीजिए।
  • शराबबंदी नीतियों की विफलताओं और उनकी सीमाओं का विश्लेषण कीजिए।
  • समस्या के समाधान हेतु आगे की राह के बारे में लिखिए।

उत्तर

परिचय

बार-बार होने वाली जहरीली शराब से संबंधित घटनाएँ, जिसमें पंजाब की हालिया घटना भी शामिल है, यह दर्शाती हैं कि अवैध शराब का सेवन केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह गरीबी, कमजोर विनियमन और शासन संबंधी विफलताओं से उत्पन्न एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न करती है।

सामाजिक-आर्थिक कारक

  • गरीबी का दुष्चक्र: गरीब एवं दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिक अक्सर सस्ती अवैध शराब को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि वैध शराब उनके लिए महँगी होती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2024 की तमिलनाडु जहरीली शराब त्रासदी की जाँच में पाया गया कि अधिकांश पीड़ित दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिक थे।
  • सामाजिक असमानता: आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित समुदाय शराब के उपभोग के आदी तथा असुरक्षित उपभोग प्रवृत्तियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार, कई राज्यों में आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में शराब सेवन की दर अपेक्षाकृत अधिक पाई गई है।
  • जागरूकता का अभाव: सीमित शिक्षा के कारण लोगों में मेथेनॉल-मिश्रित शराब तथा अवैध शराब के स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति पर्याप्त जागरूकता नहीं होती है।
  • तनाव से राहत का साधन: कठिन कार्य परिस्थितियाँ, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा लोगों को दैनिक कठिनाइयों से राहत पाने के लिए शराब की ओर आकर्षित कर सकती हैं।
    • उदाहरण: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने आर्थिक कठिनाइयों, बेरोजगारी और मनोसामाजिक तनाव को हानिकारक शराब सेवन के प्रमुख जोखिम कारकों के रूप में चिह्नित किया है।
  • आसान उपलब्धता: अवैध शराब के नेटवर्क दूरदराज क्षेत्रों में भी सस्ती और सुलभ शराब उपलब्ध कराते हैं, जहाँ नियंत्रित बिक्री केंद्र नहीं होते।
    • उदाहरण: संगठित मेथेनॉल तस्करी और अवैध शराब नेटवर्क इसके व्यापक वितरण को बढ़ावा देते हैं।

शराबबंदी की विफलताएँ

  • कालाबाजारी: शराबबंदी लागू होने पर शराब की खपत समाप्त होने के बजाय उसका व्यापार अवैध तरीके से होना प्रारंभ हो जाता है।
  • भ्रष्टाचार का गठजोड़: तस्करों, स्थानीय राजनेताओं और प्रवर्तन एजेंसियों के बीच मिलीभगत शराबबंदी के प्रभावी क्रियान्वयन को कमजोर करती है।
  • निरंतर माँग: लत तथा सामाजिक-आर्थिक विवशताओं के कारण कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद शराब की माँग बनी रहती है।
    • उदाहरण: बिहार में में राज्यव्यापी शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब की लगातार बरामदगी होती रही है।
  • राजस्व संबंधी चिंताएँ: राज्य सरकारें आबकारी राजस्व पर काफी निर्भर रहती हैं, जिससे कठोर निषेध नीति के प्रति उनकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता सीमित हो सकती है।
  • अंतर-राज्यीय तस्करी: विभिन्न राज्यों की अलग-अलग शराब नीतियाँ तस्करी और अवैध आपूर्ति शृंखलाओं को बढ़ावा देती हैं।
    • उदाहरण: बिहार में अक्सर उत्तर प्रदेश, झारखंड तथा पश्चिम बंगाल जैसे पड़ोसी राज्यों से शराब की तस्करी के मामले सामने आते हैं, जहाँ शराब की बिक्री वैध है।

आगे की राह

  • मेथेनॉल की निगरानी: मेथेनॉल के उत्पादन, परिवहन और भंडारण की निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय ढाँचा विकसित किया जाना चाहिए।
  • प्रवर्तन को सुदृढ़ करना: प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी, नियमित निरीक्षण और कठोर जवाबदेही तंत्र अपनाए जाने चाहिए।
    • उदाहरण: औद्योगिक एल्कोहल टैंकरों की GPS-सक्षम ट्रैकिंग।
  • संगठित नेटवर्क पर कार्रवाई: केवल स्थानीय अवैध शराब विक्रेताओं को गिरफ्तार करने के बजाय संगठित आपूर्ति शृंखलाओं और तस्करी नेटवर्क पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
  • जागरूकता को बढ़ावा: अवैध शराब और नशीले पदार्थों के दुरुपयोग से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में सामुदायिक जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) की सूचना, शिक्षा एवं संचार (IEC) गतिविधियों का विस्तार शराब-जनित जोखिमों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
  • मूल कारणों का समाधान: गरीबी को कम करने, शिक्षा में सुधार करने तथा संवेदनशील क्षेत्रों में आजीविका के अवसर सृजित करने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए।
    • उदाहरण:आकांक्षी जिला कार्यक्रम वंचित क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के सुधार पर केंद्रित है।

निष्कर्ष

अवैध शराब से होने वाली मौतें गहरी सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों तथा शासन संबंधी कमियों को उजागर करती हैं। अवैध शराब के सेवन पर प्रभावी नियंत्रण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए सुदृढ़ नियमन, भ्रष्टाचार-रोधी उपायों, जन-जागरूकता तथा समावेशी विकास को समाहित करने वाला संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

Highlight the socio-economic factors driving illicit liquor consumption in India. Examine why total prohibition policies often fail to achieve their intended objectives. Suggest suitable measures to address this public health crisis. in hindi

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