प्रश्न की मुख्य माँग
- ‘लैंड पूलिंग’ को भूमि अधिग्रहण के एक वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर तथा सहभागी विकल्प के रूप में स्पष्ट कीजिए।
- भूमि पूलिंग मॉडल की प्रमुख सीमाओं का विश्लेषण कीजिए।
- ‘लैंड पूलिंग’ को अधिक प्रभावी, समावेशी एवं सतत् बनाने हेतु आगे की राह मार्ग सुझाइए।
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उत्तर
परिचय
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के लिए विशाल भू-भाग की आवश्यकता होती है, किंतु भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर तथा पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अक्सर महँगी तथा विवादास्पद सिद्ध होती है। ऐसे में ‘लैंड पूलिंग’(Land Pooling) एक सहभागी मॉडल के रूप में उभरता है, जो विकास हेतु भूमि उपलब्ध कराते हुए मूल भू-स्वामियों को भी विकास के लाभों में भागीदार बनाता है।
वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर एवं सहभागी विकल्प के रूप में लैंड पूलिंग
- साझी स्वामित्व व्यवस्था: अनिवार्य भूमि अधिग्रहण के माध्यम से स्वामित्व खोने के बजाय भू-स्वामी विकास प्रक्रिया के भागीदार बन जाते हैं।
- उदाहरण: गुजरात की टाउन प्लानिंग (TP) योजनाओं में भू-स्वामी अपनी भूमि का एक हिस्सा समर्पित करते हैं और विकास के बाद अधिक बाजार मूल्य वाले विकसित भूखंड प्राप्त करते हैं।
- कम वित्तीय बोझ: सरकार को बड़े पैमाने पर अग्रिम मुआवजा तथा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) लागत वहन नहीं करनी पड़ती।
- उदाहरण: वर्ष 2013 के अधिनियम के बाद मुआवजा एवं R&R संबंधी दायित्वों ने बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण को वित्तीय रूप से अधिक बोझिल बना दिया है।
- मूल्य संवर्धन से वित्तपोषण: विकास के बाद भूमि मूल्य में होने वाली वृद्धि के माध्यम से अवसंरचना लागत का वित्तपोषण किया जाता है।
- तीव्र विकास: सहमति-आधारित लैंड पूलिंग से मुकदमेबाजी एवं भूमि अधिग्रहण से जुड़ी देरी कम होती है।
- समान लाभ वितरण: भू-स्वामी शहरीकरण से विस्थापित होने के बजाय उसके लाभों में प्रत्यक्ष भागीदारी प्राप्त करते हैं।
- उदाहरण: दिल्ली लैंड पूलिंग नीति, 2018 के अंतर्गत भू-स्वामियों को विकसित भूमि का एक हिस्सा बनाए रखने की अनुमति दी जाती है, जिससे वे बढ़ते शहरी भूमि मूल्यों का लाभ उठा सकते हैं।
लैंड पूलिंग की सीमाएँ
- सहमति प्राप्त करने की चुनौती: बड़ी संख्या में भू-स्वामियों के मध्य सहमति बनाना कठिन हो सकता है।
- उदाहरण: दिल्ली लैंड पूलिंग नीति के क्रियान्वयन में पर्याप्त संख्या में सन्निहित भूमि पार्सलों को एकत्रित करने में कठिनाइयों के कारण विलंब हुआ।
- असमान लाभ: पुनर्गठित भूखंडों के स्थान में भिन्नता लाभों के असमान वितरण की धारणा उत्पन्न कर सकती है।
- संस्थागत क्षमता की आवश्यकता: सफल क्रियान्वयन के लिए मजबूत शहरी नियोजन तथा भूमि अभिलेख प्रणालियों की आवश्यकता होती है।
- उदाहरण: गुजरात की सफलता का आधार गुजरात टाउन प्लानिंग एवं शहरी विकास अधिनियम, 1976 के अंतर्गत दशकों का प्रशासनिक अनुभव रहा है।
- दीर्घ अवधि: अवसंरचना निर्माण तथा भूखंड पुनर्गठन की प्रक्रिया में कई वर्ष लग सकते हैं।
- सट्टेबाजी का दबाव: भविष्य में विकास की संभावना भूमि सट्टेबाजी तथा भूमि मूल्यों में कृत्रिम वृद्धि को बढ़ावा दे सकती है।
- उदाहरण: दिल्ली के आस-पास के शहरी विस्तार गलियारों में नीतिगत घोषणाओं के बाद भूमि कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।
आगे की राह
- कानूनी स्पष्टता: राज्यों में लैंड पूलिंग के लिए एक समान दिशा-निर्देश स्थापित किए जाने चाहिए।
- उदाहरण: नीति आयोग ने शहरी विकास को सुगम बनाने के लिए पारदर्शी भूमि शासन तथा डिजिटीकृत भूमि अभिलेखों की वकालत की है।
- डिजिटल भूमि अभिलेख: सटीक भूमि अभिलेख विवादों को कम करते हैं तथा हितधारकों का विश्वास बढ़ाते हैं।
- उदाहरण: डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) के साथ एकीकरण।
- निष्पक्ष पुनर्वितरण: भूखंड पुनर्गठन एवं लाभ-साझेदारी के लिए पारदर्शी मानदंड सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
- क्षमता निर्माण: शहरी स्थानीय निकायों तथा नियोजन प्राधिकरणों को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: राजस्थान में पहली लैंड पूलिंग योजना के क्रियान्वयन के दौरान नगर नियोजकों को प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है।
- नागरिक सहभागिता: निरंतर परामर्श एवं संवाद से विश्वास बढ़ाया जा सकता है तथा विरोध को कम किया जा सकता है।
- उदाहरण: दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की लैंड पूलिंग नीति के अंतर्गत आयोजित सार्वजनिक परामर्श।
निष्कर्ष
लैंड पूलिंग भूमि स्वामियों को विकास प्रक्रिया में हितधारक बनाकर शहरी विस्तार को सहकारी विकास के साथ जोड़ती है। यद्यपि इसके क्रियान्वयन एवं संस्थागत ढाँचे से जुड़ी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, फिर भी मजबूत शासन व्यवस्था, पारदर्शी लाभ-साझेदारी तथा प्रभावी शहरी नियोजन के माध्यम से इसे अनिवार्य भूमि अधिग्रहण का एक सतत् एवं समावेशी विकल्प बनाया जा सकता है।