प्रश्न की मुख्य माँग
- भारतीय संघवाद पर जनसांख्यिकीय विचलन के सकारात्मक प्रभाव।
- भारतीय संघवाद पर जनसांख्यिकीय विचलन के नकारात्मक प्रभाव।
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उत्तर
परिचय
भारतीय राज्यों के मध्य भिन्न प्रजनन दरों, जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक निष्पादन में परिलक्षित होने वाला जनसांख्यिकीय विचलन, देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, राजकोषीय हस्तांतरण और केंद्र-राज्य संबंधों को निरंतर पुनर्गठित कर रहा है। यह परिदृश्य जहाँ एक ओर ‘सहकारी संघवाद’ के लिए नवीन अवसर सृजित करता है, वहीं दूसरी ओर समता, प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर अंतर्निहित तनाव भी उत्पन्न करता है।
भारतीय संघवाद पर जनसांख्यिकीय विचलन के सकारात्मक प्रभाव
- अंतर्निहित आर्थिक जुड़ाव: उत्तर भारत का श्रम-अधिशेष (Labour-surplus) और दक्षिण भारत की बढ़ती वृद्ध आबादी व कार्यबल की कमी के मध्य का अंतर्संबंध, प्रवासन के माध्यम से देश में ‘श्रम-बाजार के क्षेत्रीय संतुलन’ को बनाए रखता है।
- प्रतिस्पर्द्धी संघवाद: जनसांख्यिकीय परिणामों में यह भिन्नता राज्यों को अपने शासन और मानव विकास सूचकांकों (HDI) में सुधार करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- मानव पूँजी में संवर्द्धन: जनसंख्या के स्थिरीकरण से राज्यों को कौशल विकास और गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाओं की ओर बेहतर संसाधन आवंटन करने की सुविधा प्राप्त होती है।
- उदाहरण: केरल की कम प्रजनन दर ने वहाँ स्वास्थ्य और साक्षरता के परिणामों पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता की।
- राष्ट्रीय एकीकरण: जनसांख्यिकीय विचलन से उत्पन्न होने वाला अंतर-राज्यीय प्रवासन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आर्थिक अंतर-निर्भरता को बढ़ावा देता है।
- नीतिगत नवाचार: जनसांख्यिकीय दबाव राज्यों को क्षेत्र-विशिष्ट कल्याणकारी और विकासात्मक रणनीतियाँ विकसित करने के लिए प्रेरित करते हैं।
- उदाहरण: तमिलनाडु और केरल ने सामाजिक कल्याण और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारों की शुरुआत की, जिन्हें बाद में देश के अन्य हिस्सों में भी अपनाया गया।
भारतीय संघवाद पर जनसांख्यिकीय विचलन के नकारात्मक प्रभाव
- लोकतांत्रिक घाटा/प्रतिनिधित्व का संकट: जनसंख्या में होने वाले इस परिवर्तन ने परिसीमन की माँग को तीव्र कर दिया है, जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों में अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होने की आशंकाएँ गहरी हो रही हैं।
- उदाहरण: जनसंख्या आधारित आगामी परिसीमन का सीधा प्रभाव राजनैतिक शक्ति के उत्तर की ओर हस्तांतरण के रूप में दिख सकता है, जहाँ दक्षिण भारत को लगभग 23 सीटों का नुकसान और उत्तर भारत को 31 सीटों का लाभ होने का अनुमान है।
- राजकोषीय असंतुलन: आर्थिक रूप से समृद्ध और जनसांख्यिकीय स्थिरीकरण प्राप्त कर चुके राज्यों में यह धारणा प्रबल हो रही है कि केंद्रीय करों के वितरण का वर्तमान ढाँचा उनके वित्तीय योगदान और विकासपरक नीतियों के साथ न्याय नहीं करता है।
- उदाहरण: दक्षिण और पश्चिम के राज्यों को उनके द्वारा दिए जाने वाले राजस्व योगदान की तुलना में वित्त आयोग से व्यापक रूप से कम हस्तांतरण प्राप्त होता है।
- क्षेत्रीय असंतोष: बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को ऐसा प्रतीत होता है कि सफल जनसंख्या नियंत्रण और तीव्र आर्थिक विकास के लिए उन्हें पुरस्कृत करने के बजाय ‘दंडित‘ किया जा रहा है।
- राजनीतिक ध्रुवीकरण: जनसांख्यिकीय विचलन, हमारे संघीय ढाँचे के भीतर क्षेत्रीय और भाषायी चिंताओं व संवेदनशीलताओं को और अधिक उग्र बना देता है।
- विश्वास का क्षरण: केंद्र द्वारा लिए जाने वाले कथित एकतरफा निर्णय ‘सहकारी संघवाद’ को कमजोर करते हैं और केंद्र-राज्य के मध्य अविश्वास को गहरा करते हैं।
- उदाहरण: कृषि कानून जैसे नीतिगत परिवर्तनों और आगामी परिसीमन के संवेदनशील मुद्दों पर राज्यों के साथ ‘सीमित संवाद’ या ‘परामर्श का अभाव’, संघवाद की मूल भावना के प्रति गहरी चिंताएँ उत्पन्न करता है।
निष्कर्ष
वस्तुतः, जनसांख्यिकीय विचलन भारतीय संघीय ढाँचे के समक्ष ‘दोहरी चुनौती और अवसर’ दोनों प्रस्तुत करता है; जहाँ यह एक ओर अंतर-राज्यीय आर्थिक अन्योन्याश्रयता को प्रगाढ़ कर रहा है, वहीं दूसरी ओर राजनैतिक और राजकोषीय असंतुलन से उपजे अंतर्निहित तनावों को भी बढ़ा रहा है। सहकारी संघवाद’ की भावना को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक संवाद, न्यायपूर्ण संसाधन वितरण, संतुलित परिसीमन सुधार तथा केंद्र एवं राज्यों के मध्य पारस्परिक विश्वास को मजबूत करना आवश्यक है, जिससे राष्ट्रीय एकता और अखंडता बनी रहे।