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Q. पाँचवीं और छठी अनुसूची के तहत प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए कौन से सुधार आवश्यक हैं? ये सुधार जनजातीय सशक्तिकरण को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं? (10 अंक, 150 शब्द)

October 3, 2024

GS Paper II
प्रश्न की मुख्य मांग

  • पाँचवीं और छठी अनुसूची के प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुधारों का परीक्षण कीजिए।
  • इस बात पर प्रकाश डालिये कि ये किस प्रकार जनजातीय सशक्तीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं।

 

उत्तर:

पाँचवीं और छठी अनुसूचियाँ, जनजातीय समुदायों को भूमि, संसाधनों और शासन पर विशेष सुरक्षा प्रदान करके उनके अधिकारों और स्वायत्तता की रक्षा के लिए प्रस्तुत की गई थीं। पाँचवीं अनुसूची देश भर के कई जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है, छठी अनुसूची विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करती है

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पाँचवीं और छठी अनुसूचियों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक सुधार

  • अभ्यास में स्वायत्तता: पाँचवीं और छठी अनुसूची के तहत दी गई स्वायत्तता प्रायः कागजी ही प्रतीत होती  है, तथा प्रशासनिक संरचनाओं में अतिव्यापन के कारण निर्णयन प्रक्रिया में काफी देरी होती है।
  • अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्र: कई जनजातीय बहुल क्षेत्रों को अभी भी अनुसूचित क्षेत्रों के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है , जिससे उन्हें संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त करने से रोका जा रहा है।
    उदाहरण के लिए: ओडिशा और झारखंड में कई जनजातीय क्षेत्र, पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत संरक्षित नहीं हैं जिससे उन्हें भूमि और संसाधनों पर अधिकार से वंचित रखा गया है।
  • राज्यपालों की भूमिका को मजबूत करना: पाँचवीं अनुसूची के तहत राज्यपालों के पास महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ हैं, लेकिन इन शक्तियों का प्रभावी ढंग से प्रयोग करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देशों का अभाव है।
  • ADCs की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियाँ बढ़ाना: छठी अनुसूची के तहत मौजूदा ADC को स्थानीय आदिवासी मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए अधिक वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता की आवश्यकता है।
    उदाहरण के लिए: 125वाँ संविधान संशोधन विधेयक, ADC को अधिक वित्तीय और कार्यकारी शक्तियों के माध्यम से सशक्त बनाने का प्रयास करता है, जो आदिवासी क्षेत्रों में विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • नियमित निगरानी और मूल्यांकन: पाँचवीं और छठी अनुसूची के तहत कार्यान्वित नीतियों की निरंतर निगरानी और मूल्यांकन की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लाभ जनजातीय आबादी तक पहुँचे।
  • अधिकार क्षेत्र के विवादों को स्पष्ट करना: राज्य सरकारों और ADC के बीच अधिकार क्षेत्र का अतिव्यापन प्रायः भ्रम पैदा करता है, जिससे निर्णय लेने और कानून लागू करने में देरी होती है।
    उदाहरण के लिए: असम में, जनजातीय क्षेत्रों में राज्य सरकार और ADC के बीच अधिकार क्षेत्र के अतिव्यापन के कारण भूमि विवादों को हल करने में देरी हुई है।
  • कुछ जनजातियों को शामिल न किए जाने की समस्या का समाधान: पूर्वोत्तर और मध्य भारत की कई जनजातियों को छठी अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है , जिससे उनकी स्वायत्तता सीमित हो गई है।
    उदाहरण के लिए: मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों और अरुणाचल प्रदेश को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग अभी भी लंबित है, जबकि इन क्षेत्रों में स्वशासन की आवश्यकता बढ़ रही है।

ये सुधार जनजातीय सशक्तीकरण को कैसे बढ़ाते हैं

  • भूमि और संसाधन अधिकारों की सुरक्षा: पाँचवीं और छठी अनुसूची के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से भूमि अधिकारों को मजबूत करना यह सुनिश्चित करता है कि जनजातीय समुदाय अपनी भूमि पर नियंत्रण बनाए रखें। उदाहरण के लिए: पाँचवीं अनुसूची के तहत वन अधिकार अधिनियम का उद्देश्य आदिवासी समुदायों को भूमि स्वामित्व बहाल करना है , जिससे उन्हें अपने संसाधनों की रक्षा करने का अधिकार मिलता है।
  • शासन में जनजातीय भागीदारी को बढ़ावा देना: ADC को अधिक प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियों से सशक्त बनाना जनजातीय स्वशासन को बढ़ावा देता है, जिससे उन्हें स्थानीय मुद्दों में प्रत्यक्ष रूप से निर्णय लेने का मौका मिलता है।
    उदाहरण के लिए: मेघालय में , ADC ने स्थानीय शासन के मुद्दों को सफलतापूर्वक प्रबंधित किया है, जिससे आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने में सक्रिय जनजातीय भागीदारी को बढ़ावा मिला है।
  • जनजातीय पहचान और संस्कृति की सुरक्षा: पाँचवीं और छठी अनुसूची के तहत मजबूत सुरक्षा उपायों को लागू करने से जनजातीय संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं को बाह्य प्रभावों से बचाने में मदद मिलती है।
    उदाहरण के लिए: मिजोरम में ADC ने जनजातीय रीति-रिवाजों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए हैं, जिससे आधुनिकीकरण के दौर में सांस्कृतिक संरक्षण सुनिश्चित होता है ।
  • शोषण और असमानता को संबोधित करना: भूमि हस्तांतरण और धन उधारदाताओं से सुरक्षा के लिए सख्त दिशा-निर्देशों को लागू करने से आदिवासी क्षेत्रों में शोषण कम हो सकता है।
    उदाहरण के लिए: पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में धन उधार देने को विनियमित करने की राज्यपाल की शक्ति ने राज्यों में शोषणकारी प्रथाओं को रोकने में मदद की है, जिससे आर्थिक स्थिरता में सुधार हुआ है।
  • बेहतर संसाधन प्रबंधन के माध्यम से आर्थिक सशक्तीकरण: प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के साथ, आदिवासी समुदाय अपने लाभ के लिए जंगलों, खनिजों और अन्य संसाधनों का प्रबंधन कर सकते हैं, जिससे अधिक आर्थिक सशक्तीकरण हो सकता है।
  • प्रथागत कानूनों का संरक्षण: प्रथागत कानूनों के अनुप्रयोग को सुनिश्चित करने से जनजातीय कानूनी ढाँचे को मजबूती मिलती है, तथा राज्य के हस्तक्षेप से सुरक्षा मिलती है।
  • विकास के लिए क्षमता निर्माण: शासन संरचनाओं में सुधार से जनजातीय संस्थाओं की क्षमता निर्माण में मदद मिलती है, ताकि वे विकास परियोजनाओं की योजना बना सकें और उन्हें क्रियान्वित कर सकें , जिससे सतत विकास सुनिश्चित हो सके।
    उदाहरण के लिए: ADCs स्थानीय विकास परियोजनाओं के प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि जनजातीय लोगों को कल्याणकारी योजनाओं का प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हो।

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पाँचवीं और छठी अनुसूची के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए, भारत को शासन तंत्र को मजबूत करने, अधिक स्वायत्तता प्रदान करने और नियमित निगरानी सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। इन सुधारों के माध्यम से जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाने से न केवल उनकी भूमि, संस्कृति और संसाधनों की रक्षा होगी, बल्कि सतत विकास और वास्तविक आदिवासी सशक्तीकरण को भी बढ़ावा मिलेगा ।

What reforms are necessary to ensure the effective implementation of the provisions under the Fifth and Sixth Schedules? How can these reforms enhance tribal empowerment? in hindi

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