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Q. आपराधिक न्याय प्रणाली की वास्तविक वैधता केवल दोषसिद्धि से नहीं, बल्कि उस मानवीय तरीके से प्राप्त होती है जिससे न्याय प्रदान किया जाता है। पुलिस कर्मियों के बीच बढ़ती 'करुणा की कमी' (Compassion Fatigue) के आलोक में, भारत में ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड पुलिसिंग (आघात-संवेदनशील पुलिसिंग) की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

June 4, 2026

GS Paper IVEthics

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत में आघात-संवेदनशील पुलिसिंग (Trauma-Informed Policing) की आवश्यकता का विश्लेषण कीजिए।
  • आघात-संवेदनशील पुलिसिंग के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों की चर्चा कीजिए।
  • आघात-संवेदनशील पुलिसिंग को संस्थागत रूप देने हेतु आवश्यक उपायों का सुझाव दीजिए।

उत्तर

परिचय

करुणा की कमी (Compassion Fatigue) से आशय दूसरों की पीड़ा के निरंतर संपर्क में रहने के कारण उत्पन्न होने वाली भावनात्मक थकान तथा संवेदनहीनता से है। कोयंबटूर बाल हत्या मामला पुलिस व्यवस्था में उभरती इस गंभीर चिंता को उजागर करता है तथा ऐसी आघात-संवेदनशील पुलिसिंग (Trauma-Informed Policing) की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जो प्रभावी कानून-प्रवर्तन के साथ-साथ सहानुभूति एवं पीड़ित-केंद्रित न्याय (Victim-Sensitive Justice) को भी सुनिश्चित करे।

आघात-संवेदनशील पुलिसिंग की आवश्यकता

  • पीड़ित-संवेदनशीलता: यह पुलिस अधिकारियों को संकट की परिस्थितियों में पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करने में सहायता करती है, जिससे द्वितीयक आघात (Secondary Trauma) कम होता है।
  • जनविश्वास: संवेदनशील व्यवहार पुलिस तथा व्यापक आपराधिक न्याय प्रणाली में नागरिकों के विश्वास को सुदृढ़ करता है।
    • उदाहरण: प्रधानमंत्री द्वारा प्रतिपादित स्मार्ट पुलिसिंग (SMART Policing) की अवधारणा जनविश्वास बढ़ाने के लिए “संवेदनशील और कठोर (Sensitive and Strict)” पुलिसिंग पर बल देती है।
  • बेहतर संवाद: यह शोकग्रस्त परिवारों, गवाहों तथा संवेदनशील वर्गों के साथ सम्मानजनक संवाद सुनिश्चित करती है।
    • उदाहरण: हरियाणा पुलिस की ‘संवेदी पुलिस’ पहल पीड़ित-संवेदनशील संवाद तथा मानवीय सार्वजनिक व्यवहार पर विशेष जोर देती है।
  • व्यावसायिक आचरण: यह संवेदनशील जाँचों तथा मीडिया ब्रीफिंग के दौरान उचित व्यवहार, शारीरिक भाषा और गंभीरता को प्रोत्साहित करती है।
  • नागरिक-केंद्रित पुलिसिंग: यह पुलिसिंग को औपनिवेशिक प्रवर्तन मानसिकता से हटाकर सेवा-उन्मुख दृष्टिकोण की ओर ले जाती है।
    • उदाहरण: केरल पुलिस की जनमैत्री सुरक्षा परियोजना सामुदायिक सहभागिता और नागरिक-अनुकूल पुलिसिंग को बढ़ावा देती है।

आघात-संवेदनशील पुलिसिंग के समक्ष चुनौतियाँ

  • करुणा  की कमी: हिंसा, मृत्यु और मानवीय पीड़ा के निरंतर संपर्क के कारण पुलिस कर्मियों में भावनात्मक संवेदनहीनता विकसित हो जाती है।
    • उदाहरण: पुलिस कर्मियों में “करुणा  की कमी” तथा “द्वितीयक आघातजन्य तनाव” की बढ़ती प्रवृत्ति।
  • अत्यधिक कार्यभार: लंबी ड्यूटी अवधि तथा पर्याप्त विश्राम के अभाव से भावनात्मक लचीलापन कम हो जाता है।
    • उदाहरण: बड़े शहरों में पुलिसकर्मी चुनावों, त्योहारों एवं कानून-व्यवस्था संबंधी तैनाती के दौरान अक्सर 12–16 घंटे की ड्यूटी करते हैं।
  • प्रशिक्षण की कमी: पुलिस प्रशिक्षण मुख्यतः कानून-प्रवर्तन पर केंद्रित रहता है, जबकि भावनात्मक बुद्धिमत्ता एवं आघात-प्रतिक्रिया कौशल पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।
    • उदाहरण: यौन हिंसा की पीड़िताओं ने प्रारंभिक पुलिस पूछताछ के दौरान कई बार असंवेदनशील व्यवहार एवं प्रश्नों की शिकायत की है।
  • औपनिवेशिक कार्य-संस्कृति: औपनिवेशिक विरासत वाली संरचनाएँ सहानुभूति एवं जनसेवा की अपेक्षा नियंत्रण एवं अधिकार-प्रदर्शन को अधिक प्रोत्साहित करती हैं।
  • संसाधनों की कमी: अपर्याप्त अवसंरचना तथा सम्मानजनक सुविधाओं एवं सुरक्षित आश्रय गृहों, जैसी सहयोगी व्यवस्थाओं की कमी पीड़ित-अनुकूल पुलिसिंग में बाधा उत्पन्न करती है।

आघात-संवेदनशील पुलिसिंग को संस्थागत बनाने के उपाय

  • प्रशिक्षण सुधार: ट्रॉमा मनोविज्ञान, भावनात्मक बुद्धिमत्ता तथा पीड़ितों से संवाद संबंधी मॉड्यूल को पुलिस प्रशिक्षण का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
    • उदाहरण: व्यवहार विज्ञान एवं भावनात्मक साक्षरता को पुलिस प्रशिक्षण में अनिवार्य रूप से शामिल करना।
  • मानसिक सहयोग: व्यावसायिक तनाव से निपटने के लिए परामर्श एवं मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
  • मानवीय ड्यूटी शेड्यूल एवं पर्याप्त अवकाश सुनिश्चित कर बर्नआउट को कम किया जाए।
    • उदाहरण: एक अध्ययन में अनिवार्य साप्ताहिक अवकाश तथा नियमित छुट्टियों की व्यवस्था का सुझाव दिया गया है।
  • पीड़ित सहायता तंत्र: संवेदनशील शिकायतकर्ताओं की सहायता हेतु पीड़ित सहायता डेस्क, परामर्श इकाइयाँ तथा नागरिक सुविधा केंद्र जैसे संस्थागत तंत्र स्थापित किए जाएँ।
  • वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ: सहानुभूति-आधारित पुलिसिंग के सफल अंतरराष्ट्रीय मॉडलों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया जाए।
    • उदाहरण: यूनाइटेड किंगडम (UK) एवं कनाडा की आघात-संवेदनशील पुलिसिंग तथा जापान की सामुदायिक-उन्मुख पुलिसिंग।

निष्कर्ष

आघात-संवेदनशील पुलिसिंग (Trauma-Informed Policing) प्रभावी कानून-प्रवर्तन का कोई उदार विकल्प नहीं, बल्कि उसकी नैतिक आधारशिला है। प्राधिकार (Authority) के साथ सहानुभूति  तथा संस्थागत समर्थन के साथ जवाबदेही का समन्वय करके भारत द्वारा ऐसी पुलिस व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है, जो नागरिकों में विश्वास  और करुणा दोनों को प्रेरित करे।

The true legitimacy of the criminal justice system is derived not merely from convictions, but from the humane manner in which justice is administered. In light of the rising ‘compassion fatigue’ among police personnel, discuss the need for trauma-informed policing in India. in hindi

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