Q. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के निर्देशों के आलोक में, इसके पारिस्थितिक महत्त्व का विश्लेषण कीजिए और मूल्यांकन कीजिए कि न्यायिक हस्तक्षेप किस प्रकार पर्यावरण संरक्षण और विकासात्मक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अरावली पर्वतमाला का पारिस्थितिकी महत्त्व
  • संबंधित चिंताएँ
  • न्यायिक हस्तक्षेप: पर्यावरण और विकास में संतुलन।

उत्तर

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में अपने “हरित पीठ” के दायित्व को सुदृढ़ करते हुए राजस्थान और हरियाणा को अरावली क्षेत्र में अवैध खनन तथा अनधिकृत निर्माण को रोकने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला को एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी अवरोध मानते हुए यह स्पष्ट किया कि “स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार” खनिज दोहन से होने वाले अल्पकालिक आर्थिक लाभों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।

अरावली पर्वतमाला का पारिस्थितिकी महत्त्व

  • मरुस्थलीकरण के विरुद्ध अवरोध: अरावली पर्वतमाला एक प्राकृतिक “हरित अवरोध” के रूप में कार्य करती है, जो थार मरुस्थल के पूर्व की ओर उपजाऊ इंडो-गंगा के मैदानों में विस्तार को रोकती है।
    • उदाहरण: अरावली में बने अंतरालों के कारण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में धूल भरी आँधियों की तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  • भूजल पुनर्भरण: इन प्राचीन पर्वतों की दरारयुक्त चट्टानें एक विशाल जलागम क्षेत्र के रूप में कार्य करती हैं, जिससे दिल्ली और गुरुग्राम जैसे जल-संकटग्रस्त शहरों के जलभृत पुनः भरते हैं।
    • उदाहरण: जल-विज्ञानियों के अनुसार, दक्षिण दिल्ली और फरीदाबाद के भूजल पुनर्भरण में अरावली का योगदान लगभग 80 प्रतिशत है।
  • जैव-विविधता केंद्र: यह क्षेत्र तेंदुए, लकड़बग्घे तथा दुर्लभ वनस्पतियों के लिए महत्त्वपूर्ण आवास और वन्यजीव गलियारा प्रदान करता है, जो सरिस्का बाघ अभयारण्य को उत्तरी वनों से जोड़ता है।
    • उदाहरण: “अरावली सफारी पार्क” परियोजना क्षेत्रीय तेंदुआ आबादी के संरक्षण में इस पर्वतमाला के महत्त्व को रेखांकित करती है।
  • जलवायु विनियमन: ये पहाड़ियाँ स्थानीय वर्षा पैटर्न को प्रभावित करती हैं और कार्बन सिंक के रूप में कार्य कर आस-पास के महानगरों में “शहरी ऊष्मा द्वीप” प्रभाव को कम करती हैं।
    • उदाहरण: अरावली के वन आवरण के क्षरण को समीपवर्ती शहरी क्षेत्रों में ग्रीष्मकालीन तापमान में 2–3 डिग्री सेल्सियस वृद्धि से सीधे जोड़ा गया है।

संबंधित चिंताएँ

  • अवैध खनन: प्रतिबंधों के बावजूद अवैध पत्थर और रेत खनन पहाड़ियों को समतल कर रहा है, जिससे पर्वतमाला की संरचनात्मक अखंडता और जल धारण क्षमता नष्ट हो रही है।
    • उदाहरण: राजस्थान में अरावली क्षेत्र की 31 से अधिक पहाड़ियाँ अनियंत्रित खनन के कारण “लुप्त” हो चुकी हैं।
  • अतिक्रमण का दबाव: तीव्र शहरीकरण और वन क्षेत्रों में अचल संपत्ति पर अवैध कब्जे से आवासों का विखंडन तथा मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है।
  • परिभाषात्मक अस्पष्टता: “वन” और “पहाड़ी” की स्पष्ट कानूनी परिभाषा के अभाव में वन संरक्षण अधिनियम में मौजूद तकनीकी अस्पष्टता का लाभ उठाया जा रहा है।
  • कचरा निस्तारण: परित्यक्त खदानों और वन सीमांत क्षेत्रों का उपयोग अनधिकृत रूप से निर्माण मलबा और नगरपालिका ठोस कचरे के लिए अनधिकृत डंपिंग स्थलों के रूप में तेजी से किया जा रहा है।
    • उदाहरण: अरावली क्षेत्र में स्थित बंधवारी लैंडफिल क्षेत्रीय भूजल में विषाक्त तत्त्वों के रिसाव का गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।

न्यायिक हस्तक्षेप: पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन

  • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत: न्यायालय ने खनन कंपनियों पर भारी पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई है, जिससे क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी क्षेत्रों के पुनर्स्थापन को वित्तपोषित किया जा सके।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा में अवैध खनन से वसूले गए जुर्माने से “पुनर्स्थापन कोष” के गठन का निर्देश दिया।
  • सावधानी सिद्धांत: “पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों” में विकास परियोजनाओं को तब तक रोकना, जब तक स्वतंत्र रूप से सत्यापित व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन न हो जाए।
    • उदाहरण: स्थानीय तेंदुए गलियारे पर इसके प्रभाव का पूरी तरह से आकलन किए जाने तक न्यायालय द्वारा “अरावली सफारी” निर्माण पर रोक लगा दी गई है।
  • लोक न्यास सिद्धांत: यह सुनिश्चित करना कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों का न्यासी बनकर कार्य करे और वन सामुदायिक संसाधनों को निजी व्यावसायिक संपत्तियों में परिवर्तित न होने दे।
  • सतत् खनन के विकल्प: अरावली पत्थर पर निर्भरता कम करने हेतु निर्मित रेत और पुनर्चक्रण जैसे विकल्पों को प्रोत्साहित करना।
    • उदाहरण: न्यायपालिका ने निर्माण क्षेत्र में “चक्रीय अर्थव्यवस्था” मॉडल अपनाने का आग्रह किया है।

निष्कर्ष

अरावली पर्वतमाला मात्र भू-वैज्ञानिक धरोहर ही नहीं, बल्कि उत्तरी भारत की पर्यावरणीय स्थिरता की जीवनरेखा है। न्यायिक सक्रियता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ“अरावली ग्रीन वाल प्रोजेक्ट” और समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण प्रयासों का भी सहयोग आवश्यक है। केवल “पारिस्थितिकी संघवाद” को संस्थागत रूप देकर ही भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि अवसंरचना की लालसा उसकी सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को स्थायी रूप से नष्ट न कर दे।

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