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Q. कॉमन कॉज-CSDS रिपोर्ट के निष्कर्षों के आलोक में, UNCAT की पुष्टि के महत्त्व पर चर्चा कीजिए। क्या आपको लगता है, कि समर्पित यातना-विरोधी कानून की अनुपस्थिति में हिरासत में यातना को रोकने के लिए घरेलू कानूनी प्रावधान पर्याप्त हैं? (15 अंक, 250 शब्द)

April 4, 2025

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • कॉमन कॉज-CSDS रिपोर्ट के निष्कर्षों के आलोक में UNCAT की पुष्टि के महत्व पर चर्चा कीजिये।
  • परीक्षण कीजिए कि कैसे समर्पित यातना-विरोधी कानून की अनुपस्थिति में हिरासत में होने वाली यातना को रोकने के लिए घरेलू कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं।
  • एक समर्पित यातना-विरोधी कानून की आवश्यकता के लिए आगे की राह लिखिये।

उत्तर

संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCAT) का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर होने वाले अमानवीय व्यवहार को रोकना है, फिर भी भारत उन कुछ देशों में से है जिन्होंने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है। कॉमन कॉज-CSDS की रिपोर्ट लगातार हिरासत में होने वाली हिंसा को उजागर करती है, जो कानूनी सुरक्षा उपायों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। NCRB के अनुसार, वर्ष 2022 में 75 लोगों की हिरासत में मृत्यु हो गई, जिससे जवाबदेही और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित चिंताएँ बढ़ गई हैं।

UNCAT की पुष्टि का महत्त्व

  • वैश्विक कानूनी प्रतिबद्धता: UNCAT की पुष्टि करने से भारत कानूनी रूप से अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के प्रति आबद्ध हो जाएगा, तथा हिरासत में होने वाली यातना और पुलिस क्रूरता के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
    • उदाहरण के लिए: ब्रिटेन ने वर्ष 1988 में UNCAT की पुष्टि की, जिसके परिणामस्वरूप आपराधिक न्याय अधिनियम, 1988 जैसे कठोर यातना-विरोधी कानून बने जिसने सभी परिस्थितियों में यातना को अपराध घोषित कर दिया।
  • पुलिस जवाबदेही बढ़ाना: UNCAT स्वतंत्र निरीक्षण तंत्र को अनिवार्य बनाता है, जिससे पुलिस की दण्डहीनता को रोका जा सके तथा यह सुनिश्चित किया जा सके कि हिरासत में होने वाली हिंसा के मामलों की निष्पक्ष जांच की जाए।
  • न्यायिक निगरानी को सुदृढ़ बनाना: UNCAT की पुष्टि करने से भारतीय मजिस्ट्रेटों पर दबाव पड़ेगा कि वे यह सुनिश्चित करें कि बंदियों को शीघ्र प्रस्तुत किया जाए तथा हिरासत में होने वाले दुर्व्यवहार को रोका जाए।
    • उदाहरण के लिए: डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) वाद में, सर्वोच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी प्रक्रियाओं के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए, फिर भी कमजोर प्रवर्तन के कारण उल्लंघन अभी भी जारी है।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ तालमेल बिठाना: एक संवैधानिक लोकतंत्र होने के नाते, भारत को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) जैसे मौलिक अधिकारों को बनाए रखना चाहिए और यातना से मुक्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।
  • भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को बढ़ावा: UNCAT की पुष्टि करने से भारत की मानवाधिकार विश्वसनीयता मजबूत होगी और आलोचनाओं का सामना करने में मदद मिलेगी तथा वैश्विक मंचों पर कूटनीतिक प्रभाव में सुधार होगा।

घरेलू कानूनी प्रावधान पर्याप्त न होने के कारण

  • स्पष्ट परिभाषा का अभाव: भारतीय कानून में यातना की विशिष्ट परिभाषा का अभाव है, जिससे कानूनी कार्यवाही में विभिन्न व्याख्याएं और खामियां उत्पन्न होती हैं।
  • कम दोषसिद्धि दर: IPC की धारा 330 और 331 जैसे कानूनों के बावजूद  हिरासत में यातना के लिए दोषसिद्धि बहुत कम है, जो कमजोर प्रवर्तन को दर्शाता है।
  • कमजोर निरीक्षण तंत्र: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) जैसी एजेंसियों के पास प्रवर्तन शक्तियों का अभाव है, और वे अक्सर एक शक्तिहीन निगरानी संस्था के रूप में कार्य करती हैं।
  • राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव: पुलिस को राजनीतिक नेताओं की ओर से थर्ड डिग्री तरीकों से बयान लेने के लिए दबाव का सामना करना पड़ता है, जिससे न्यायिक सुरक्षा कमजोर होती है।
    • उदाहरण के लिए: वाचाथी वाद (तमिलनाडु, 1992) में 18 आदिवासी महिलाओं के साथ पुलिस द्वारा बलात्कार किया गया और उन्हें प्रताड़ित किया गया, राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण इस वाद में 31 साल बाद न्याय मिला।
  • हिरासत के मामलों में न्यायिक निष्क्रियता: मजिस्ट्रेट शायद ही कभी हिरासत में लिए गए लोगों से यातना के बारे में पूछताछ करते हैं  तथा CrPC की धारा 167 को बरकरार रखने में विफल रहते हैं, जो न्यायिक निगरानी को अनिवार्य बनाती है।
    • उदाहरण के लिए: कॉमन कॉज-CSDS (वर्ष 2024) द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि मजिस्ट्रेट अक्सर “मूक दर्शक” की तरह कार्य करते हैं, तथा हिरासत में दुर्व्यवहार के संकेतों को दर्ज नहीं करते हैं।

आगे की राह

  • एक व्यापक यातना-विरोधी कानून बनाना: स्पष्ट परिभाषाओं, कठोर दंडों और मुखबिरों के लिए सुरक्षा के साथ यातना को आपराधिक बनाने वाला कानून आवश्यक है।
  • अनिवार्य फोरेंसिक चिकित्सा परीक्षण: सभी बंदियों का सामान्य चिकित्सकों द्वारा नहीं, बल्कि योग्य विशेषज्ञों द्वारा फोरेंसिक चिकित्सा परीक्षण किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: श्रीलंका में, UNCAT की पुष्टि करने के बाद, न्यायिक चिकित्सा अधिकारी (JMO) प्रणाली ने हिरासत में होने वाली यातना के मामलों का उचित चिकित्सा दस्तावेजीकरण सुनिश्चित किया।
  • न्यायिक निगरानी को मजबूत करना: पुलिस रिमांड को मंजूरी देने से पहले मजिस्ट्रेटों को बंदियों की स्थिति की पुष्टि करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होना चाहिए।
  • स्वतंत्र जाँच प्राधिकरण: पुलिस के खिलाफ शिकायतों को निपटाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र यातना जांच आयोग की स्थापना की जानी चाहिए। 
    • उदाहरण के लिए: दक्षिण अफ्रीका में, स्वतंत्र पुलिस जांच निदेशालय (IPID) यातना के मामलों की जाँच करता है, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस को सजा मिलती है।
  • नैतिक पूछताछ में पुलिस प्रशिक्षण: बलपूर्वक पूछताछ के स्थान पर अधिकारियों को
    साक्ष्य-आधारित पूछताछ तकनीक में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। 

    • उदाहरण के लिए: UK पुलिस और आपराधिक साक्ष्य अधिनियम (वर्ष 1984) ने PACE साक्षात्कार की शुरुआत की  जिससे वैज्ञानिक पूछताछ तकनीकों के माध्यम से यातना के मामलों में कमी आई।

न्याय न केवल किया जाना चाहिए बल्कि यह भी दिखना चाहिए कि न्याय हो रहा है। जबकि मौजूदा कानून सुरक्षा प्रदान करते हैं, इस दिशा में प्रणालीगत सुधार, स्वतंत्र निरीक्षण और जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं। सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाश सिंह दिशा-निर्देश जैसे जवाबदेही और पारदर्शी जाँच से हिरासत में होने वाली यातना के प्रति शून्य सहनशीलता की संस्कृति का निर्माण हो सकता है। इससे न्यायपूर्ण और मानवीय समाज को बढ़ावा मिलेगा।

In light of the findings of the Common Cause-CSDS report, discuss the significance of ratifying UNCAT. Do you think domestic legal provisions are sufficient to prevent custodial torture in the absence of a dedicated anti-torture law?  in hindi

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