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Q. डिजिटल युग में बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा प्रदान करना तथा सूचना तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना जटिल चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। भारत के नीतिगत ढाँचे और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के विशेष संदर्भ में, इस मुद्दे को संबोधित करने के लिए विश्व स्तर पर अपनाए गए विभिन्न दृष्टिकोणों की आलोचनात्मक जाँच कीजिये। (15 अंक, 250 शब्द)

September 20, 2024

GS Paper II
प्रश्न की मुख्य माँग

  •  सूचना तक उनकी पहुंँच के अधिकार को सुनिश्चित करते हुए डिजिटल युग में बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा प्रदान करने से संबंधित चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।
  • भारत के नीतिगत ढांँचे और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के विशेष संदर्भ में इस मुद्दे को हल करने के लिए विश्व स्तर पर अपनाए गए विभिन्न तरीकों का परीक्षण कीजिए।
  • अपनाए गए तरीकों की कमियों पर प्रकाश डालिये।
  • आगे की राह ।

 

उत्तर:

डिजिटल युग में, बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा प्रदान करना तथा सूचना तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है। युवा उपयोगकर्ताओं के बीच इंटरनेट के उपयोग में वृद्धि के साथ , बच्चों को सीखने के अवसर और साइबरबुलिंग , शोषण और आपत्तिजनक सामग्री जैसे जोखिम दोनों का सामना करना पड़ता है। सूचना तक पहुँच के उनके अधिकार के साथ ऑनलाइन सुरक्षा को संतुलित करने के लिए कानूनी ढाँचे, माता-पिता के मार्गदर्शन और प्रौद्योगिकी समाधानों को सम्मलित करते हुए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।

बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा प्रदान करने में चुनौतियाँ

  • अपर्याप्त डिजिटल साक्षरता: कई माता-पिता और बच्चों में पर्याप्त डिजिटल साक्षरता का अभाव है, जिससे सुरक्षित रूप से ऑनलाइन मार्गदर्शन प्रदान करना और संभावित जोखिमों को समझना मुश्किल हो जाता है।
    उदाहरण के लिए: भारत में, केवल 40% व्यक्ति बुनियादी डिजिटल कार्य करने में सक्षम हैं , जिससे बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के प्रयास जटिल हो जाते हैं।
  • डिवाइस का साझा उपयोग: बच्चे अक्सर परिवार के सदस्यों के साथ डिवाइस का साझा उपयोग करते हैं, जिससे उनकी ऑनलाइन गतिविधियों की
    निगरानी और उन्हें विनियमन करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। उदाहरण के लिए : कई ग्रामीण घरों में, साझा फोन के उपयोग से बच्चों द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपयोग की गई गतिविधयों को ट्रैक करना असंभव हो जाता है, जिससे उन्हें साइबरबुलिंग जैसे जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
  • असंगत विनियमन: ऑनलाइन सुरक्षा विनियमों का प्रवर्तन असंगत है विशेष रूप से उन देशों में जहाँ इंटरनेट का विनियमन कम है या तकनीकी कंपनियों द्वारा सही तरीके से इसका अनुपालन नहीं हो पाता है।
    उदाहरण के लिए: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 माता-पिता की सहमति को अनिवार्य बनाता है, लेकिन भारत में प्रभावी प्रवर्तन तंत्र का अभाव है।
  • अनुचित सामग्री का एक्सपोजर: कई प्लेटफॉर्म पर मजबूत फ़िल्टरिंग तंत्र की कमी के कारण बच्चे अक्सर ऑनलाइन अनुचित सामग्री के संपर्क में आते हैं। उदाहरण के लिए : YouTube जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से बच्चों द्वारा एडल्ट कंटेंट तक पहुँचने की रिपोर्ट ने मजबूत सुरक्षा जरूरतों  की आवश्यकता पर बल दिया है।
  • साइबरबुलिंग और ऑनलाइन शोषण: साइबरबुलिंग और ऑनलाइन शोषण में वृद्धि बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण जोखिम उत्पन्न करती है।
    उदाहरण के लिए: यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 3 में से 1 बच्चे ने साइबरबुलिंग का सामना किया है, जिसके उनके स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम देखे गये हैं।

भारत के नीतिगत ढांँचे और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के विशेष संदर्भ में वैश्विक दृष्टिकोण

वैश्विक दृष्टिकोण

  • आयु-उपयुक्त डिजाइन कोड (UK) : वर्ष 2020 में प्रस्तुत किया गया यह कानून प्लेटफॉर्म डिजाइन सुविधाओं को आयु-उपयुक्त बनाता है , जिससे ऑनलाइन बाल सुरक्षा में सुधार होता है।
    उदाहरण के लिए : मेटा और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म ने इस कोड के साथ संरेखित करने के लिए 128 से अधिक सुविधाओं को संशोधित किया है , जिससे बच्चों के लिए ऑनलाइन सुरक्षा बढ़ गई है।
  • दक्षिण कोरिया का सिंड्रेला कानून : यह कानून बच्चों को आधी रात से सुबह 6 बजे के बीच गेमिंग करने से रोकता है, जिसका उद्देश्य उन्हें गेमिंग की लत से बचाना है
    उदाहरण के लिए: कानून के बावजूद, बच्चों ने नकली एकाउंट का उपयोग करके प्रतिबंधों को दरकिनार कर दिया, जिससे प्रवर्तन चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया।
  • फ्रांस का बाल प्रभावितों पर विनियमन: फ्रांस यह सुनिश्चित करता है कि चाइल्ड इनफ्लुएंसर द्वारा अर्जित आय को उनके 16 वर्ष की आयु तक सुरक्षित रखा जाए , जिससे बच्चों को शोषण से बचाया जा सके।
    उदाहरण के लिए: ये विनियमन भारत के लिए अपने युवा सोशल मीडिया प्रभावितों की सुरक्षा हेतु एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकते हैं ।

भारत का दृष्टिकोण

  • भारतीय आईटी अधिनियम और व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक : भारत का आईटी अधिनियम बच्चों के लिए कुछ सुरक्षा प्रदान करता है, और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 में डेटा साझा करने के लिए  माता-पिता की सहमति की आवश्यकता होती है । उदाहरण के लिए : NCPCR ऑनलाइन बाल सुरक्षा प्रदान करता है, हालांँकि डिजिटल साक्षरता में कमी के कारण प्रवर्तन में बाधा आती है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021: ये नियम बच्चों की सुरक्षा में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे मध्यस्थों की भूमिका पर बल देते हैं । हालांँकि, तकनीकी कंपनियों को अक्सर व्यापक आयु सत्यापन और बाल सुरक्षा उपायों को लागू करने में कठिनायों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए: व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म को कम उम्र के उपयोगकर्ताओं को प्रभावी ढंग से प्रतिबंधित नहीं करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल बुनियादी ढांँचे की कमी : डिजिटल इंडिया जैसी सरकारी पहलों के बावजूद , कई ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सुरक्षा के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांँचे का अभाव है। हाई-स्पीड इंटरनेट और उचित उपकरणों तक सीमित पहुंच बच्चों को ऑनलाइन शैक्षिक सामग्री तक सुरक्षित रूप से पहुंचने से रोकती है। उदाहरण के लिए : वर्ष 2023 तक केवल 53% ग्रामीण भारत में इंटरनेट की पहुंँच थी, जो डिजिटल सुरक्षा उपायों की पहुंँच को सीमित करता है।
  • स्कूलों में सीमित डिजिटल साक्षरता: जबकि आधुनिक शिक्षा डिजिटल साक्षरता पर जोर देती है , भारतीय स्कूलों में अभी भी व्यापक ऑनलाइन सुरक्षा शिक्षा का अभाव है विशेष रूप से कम आय वाले क्षेत्रों में।

दृष्टिकोण की कमियाँ

  • पूर्ण प्रतिबंध की अव्यवहार्यता: कुछ प्लेटफार्मों पर बच्चों को प्रतिबंधित करने से वे वैकल्पिक उपाय ढूंढने लगेंगे, जिससे प्रतिबंध अप्रभावी हो जाएगा।
  • गोपनीयता संबंधित चिंताएँ : पहचान से संबंधित दस्तावेजों की आवश्यकता वाले आयु सत्यापन सिस्टम गोपनीयता से संबंधित मुद्दे उठाते हैं और अक्सर आवश्यकता से अधिक डेटा एकत्र करते हैं।
    उदाहरण के लिए : भारत में, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आयु सत्यापन के लिए आधार के उपयोग ने डेटा के दुरुपयोग के संबंध में चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
  • पहुँच संबंधी बाधाएँ : जटिल या कठोर ऑनलाइन नियम अनजाने में हाशिए पर स्थित समुदायों के बच्चों को पहचान से संबंधित दस्तावेजों या डिजिटल संसाधनों तक सीमित पहुँच से वंचित कर सकते हैं।
    उदाहरण के लिए : ग्रामीण भारत में, उचित पहचान के बिना बच्चों को सख्त नियमों के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करना मुश्किल हो सकता है ।
  • टेक कंपनियों पर अनावश्यक भार : टेक प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक सख्त नियम लागू करने से नवाचार बाधित हो सकता है और वैश्विक फर्मों के लिए संचालन जटिल हो सकता है।
    उदाहरण के लिए : गूगल और मेटा जैसी टेक कंपनियों ने अपने व्यापार मॉडल को प्रभावित करने वाले जटिल कानूनी ढाँचों पर चिंता व्यक्त की है।
  • प्रतिबंधों पर अत्यधिक जोर : पहुंँच को प्रतिबंधित करने पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करने से डिजिटल युग में बच्चों के
    शैक्षिक अवसरों और कौशल विकास में बाधा आ सकती है। उदाहरण के लिए : अध्ययनों से पता चलता है कि डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म तक बच्चों की पहुँच उनके कौशल और रोजगार क्षमता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

आगे की राह 

  • डिजिटल साक्षरता में सुधार : सरकारों को माता-पिता और बच्चों दोनों के लिए डिजिटल साक्षरता में सुधार को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि उन्हें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित रूप से नेविगेट करने में मदद मिल सके। उदाहरण के लिए : भारत की डिजिटल इंडिया पहल ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के लिए ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता को कवर करने के लिए अपने दायरे का विस्तार कर सकती है।
  • अभिभावकों के नियंत्रण को मजबूत करना :तकनीकी प्लेटफॉर्म को मजबूत अभिभावकीय नियंत्रण की सुविधाएँ विकसित करनी चाहिए जो गोपनीयता का उल्लंघन किए बिना बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की बेहतर निगरानी की अनुमति प्रदान करने हैं।
    उदाहरण के लिए : YouTube Kids जैसे प्लेटफॉर्म स्क्रीन टाइम को मैनेज करने और कंटेंट को प्रतिबंधित करने के लिए कस्टमाइज करने योग्य पैरेंटल कंट्रोल सेटिंग्स प्रदान करते हैं।
  • आयु-उपयुक्त डिजाइन: UK के आयु-उपयुक्त डिजाइन कोड जैसे कानूनों को अपनाने से यह सुनिश्चित होगा कि तकनीकी प्लेटफॉर्म बेहतर सुरक्षा सुविधाओं के साथ बच्चों के अनुकूल डिजिटल वातावरण को विकसित करे।
    उदाहरण के लिए: भारत में भी इसी प्रकार के दिशा-निर्देश लागू किये जा सकते हैं, जिसके तहत तकनीकी प्लेटफॉर्म को अलग-अलग आयु समूहों के लिए सुविधाओं को संशोधित करने की आवश्यकता होगी।
  • ऑनलाइन सुरक्षा शिक्षा पर ध्यान देना: स्कूलों को बच्चों को डिजिटल स्पेस में स्वयं को सुरक्षित रखने के तरीके सिखाने के लिए पाठ्यक्रम में ऑनलाइन सुरक्षा शिक्षा को शामिल करना चाहिए। उदाहरण के लिए : भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में स्कूली पाठ्यक्रम में ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल जिम्मेदारी के प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं।
  • सहयोगात्मक प्रयास : सरकारों, तकनीकी कंपनियों और नागरिक समाज को बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण बनाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, साथ ही सूचना तक उनकी पहुँच का अधिकार सुनिश्चित करना चाहिए
    उदाहरण के लिए: भारतीय शिक्षा मंत्रालय और तकनीकी प्लेटफॉर्म के बीच सहयोग से व्यापक बाल सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जा सकते हैं।

डिजिटल युग में, ऑनलाइन सुरक्षा और बच्चों के सूचना तक पहुँच के अधिकार के बीच संतुलन बनाना एक जटिल चुनौती बनी हुई है। सहयोगात्मक प्रयासों, डिजिटल साक्षरता में सुधार और आयु-उपयुक्त मजबूत विनियमों को लागू कर , बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बेहतर तरीके से सुरक्षित किया जा सकता है। एक समग्र दृष्टिकोण जिसमें माता-पिता, शिक्षकों, सरकारों और तकनीकी प्लेटफार्मों शामिल हो से वैश्विक स्तर पर बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित और समावेशी डिजिटल स्थान तैयार होंगे।

 

In the digital age protecting children online while ensuring their right to access information presents complex challenges. Critically examine the various approaches adopted globally to address this issue, with special reference to  India’s policy framework and socio- economic realities. in hindi

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