उत्तर:
दृष्टिकोण:
- प्रस्तावना: भारतीय संदर्भ में दिव्यांगजनजन अधिकार अधिनियम, 2016 के महत्व और विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांग व्यक्तियों की जरूरतों को संबोधित करने में इसकी भूमिका को स्वीकार करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए।
- मुख्य विषयवस्तु:
- बुनियादी ढांचे के विकास और स्वास्थ्य देखभाल संबंधी पहुंच जैसे आवश्यक प्रणालीगत परिवर्तनों पर चर्चा कीजिए।
- शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा उपायों सहित नीति-स्तरीय परिवर्तनों को संबोधित कीजिए।
- दिव्यांगों के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए। व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करने हेतु हाल की सरकारी पहलों और प्रत्यक्ष उदाहरणों को शामिल कीजिए।
- निष्कर्ष: नीतियों और कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और समुदायों को शामिल करते हुए एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण के महत्व पर जोर देते हुए निष्कर्ष निकालिए।
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प्रस्तावना:
दिव्यांगजनजन अधिकार अधिनियम, 2016, दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के साथ जुड़ाव हेतु भारत की एक महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करता है। हालाँकि, ग्रामीण क्षेत्रों में इस अधिनियम का प्रभावी कार्यान्वयन दिव्यांगों के लिए समावेशी विकास और टिकाऊ आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है।
मुख्य विषयवस्तु:
प्रणालीगत परिवर्तन:
- बुनियादी ढांचे का विकास: 2015 में शुरू किए गए सुगम्य भारत अभियान का उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों को सुलभ बनाना था, लेकिन इसका ध्यान ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़कर शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रहा है, जहां भारत की 69.9% दिव्यांग आबादी रहती है। ग्रामीण बुनियादी ढांचे में सुधार से सुविधाओं का एकीकरण करना जरूरी है, जो समावेशिता के लिए आवश्यक है।
- स्वास्थ्य देखभाल और ऊर्जा तक पहुंच: कई दिव्यांगों को सहायक प्रौद्योगिकी हेतु बिजली की आवश्यकता होती है, फिर भी भारत की राष्ट्रीय बिजली नीति या योजना में दिव्यांगता पर ध्यान नहीं दिया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच सुनिश्चित करना दिव्यांगों के सशक्तिकरण के लिए आवश्यक एक महत्वपूर्ण प्रणालीगत परिवर्तन है।
नीति-स्तर पर परिवर्तन:
- शिक्षा और रोजगार: भारत सरकार ने दिव्यांगों को समर्थन देने के लिए विभिन्न योजनाएं और विशिष्ट दिव्यांगता आईडी(Unique Disability ID) कार्ड पेश किया है। हालाँकि, ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी दिव्यांगों के लिए शिक्षा और रोजगार की पहुंच में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो अधिक लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता को दर्शाता है।
- सामाजिक सुरक्षा संबंधी उपाय: राष्ट्रीय नीति के मसौदे में दिव्यांगता पर दिव्यांगता प्रमाणन, अस्पतालों में सांकेतिक भाषा संबंधी दुभाषियों और सुलभ सार्वजनिक स्थानों जैसे उपायों का प्रस्ताव किया गया है। हालाँकि यह पीडबल्यूडी(PWD) द्वारा किए जाने वाले अतिरिक्त ऊर्जा संबंधी व्यय को नजरअंदाज करता है और इसमें अंतर-मंत्रालयी समन्वय का अभाव दिखाई पड़ता है।
व्यवहारगत परिवर्तन:
- जागरूकता और समावेशन: दिव्यांगजनों की धारणा को दान की वस्तुओं से हटाकर निर्णय लेने में सक्रिय प्रतिभागियों की ओर स्थानांतरित करने की अत्यधिक आवश्यकता है। अकादमिक और अनुसंधान सहयोग संवर्धन योजना(स्पार्क) जैसी पहल दृष्टिकोण में बदलाव लाने और समावेशन को बढ़ावा देने में सफल रही है।
- सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदाय की भागीदारी को प्रोत्साहित करना और ग्रामीण क्षेत्रों के दुर्गम इलाकों तक पहुँच को सुनिश्चित करना, दिव्यांगों के सामाजिक-आर्थिक समावेशन के लिए आवश्यक है।
हालिया पहल:
- दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग(डीईपीडब्ल्यूडी) ने कई पहल शुरू की हैं, जिसमें सार्वभौमिक पहुंच व पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए वास्तुकला परिषद के साथ सहयोग, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार हेतु पीएम दक्ष-डीईपीडब्ल्यूडी पोर्टल एवं दिव्यांगजनों की शिकायतों से निपटने बावत एक ऑनलाइन पोर्टल का निर्माण शामिल है।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: कार्यबल में दिव्यांगों के सफल समावेश के लिए नियोक्ता संघों और ट्रेड यूनियनों को शामिल करना महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष:
ग्रामीण भारत में दिव्यांगों के स्थायी आजीविका के अवसरों और सामाजिक-आर्थिक समावेशन के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है। इस संदर्भ में बुनियादी ढांचे में सुधार, नीतियों को अधिक समावेशी बनाने के लिए उन्हें संशोधित करना, व्यवहार संबंधी बाधाओं को दूर करना और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाना जरूरी है। हाल की पहल इस प्रगति का संकेत देती हैं, लेकिन नीति और कार्यान्वयन के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर बना हुआ है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। यह सुनिश्चित करने के लिए कि ग्रामीण भारत में दिव्यांगजन देश की विकास यात्रा में पीछे न रह जाएं, सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज को मिलकर ठोस प्रयास करने की आवश्यकता है।