Q. केरल के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन और पर्यावरण क्षरण की बढ़ती संवेदनशीलता के बीच संबंधों का पता लगाइए। इन प्रभावों को कम करने के लिए कौन से नीतिगत उपाय किए जाने चाहिए? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • पर्यावरण क्षरण और केरल के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की बढ़ती संवेदनशीलता के बीच संबंधों का पता लगाएँ।
  • इन प्रभावों को कम करने के लिए उठाए जाने वाले नीतिगत उपायों पर चर्चा कीजिये।

 

उत्तर:

केरल के पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषकर मानसून के दौरान में भूस्खलन का एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक खतरा बना रहता है। वनों की कटाई और अनियोजित विकास जैसे बढ़ते पर्यावरणीय क्षरण ने इन क्षेत्रों में भूस्खलन की संभावना को बढ़ा दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न प्रभावित हो रहा है, मानवीय गतिविधियों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के बीच परस्पर क्रिया केरल के भूभाग में अधिक अस्थिरता उत्पन्न कर रही है, जिसके लिए तत्काल हस्तक्षेप एवं स्थायी उपायों की आवश्यकता है।

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केरल के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन और पर्यावरण क्षरण की बढ़ती संवेदनशीलता के बीच संबंध

  • वनोंमूलन और निर्वनीकरण से  नुकसान: कृषि और निर्माण के लिए वनों की कटाई से पेड़ों का प्राकृतिक अवरोध खत्म हो जाती है, जिससे मृदा क्षरण होता है और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए: इडुक्की जिले में, बागानी फसलों के लिए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से क्षेत्र में भूस्खलन की आवृत्ति में वृद्धि हुई है।
  • निर्माण और उत्खनन: तीव्र, अनियोजित निर्माण और उत्खनन गतिविधियाँ प्राकृतिक ढलान स्थिरता को प्रभावित करती हैं, जिससे भूस्खलन शुरू हो जाता है। उदाहरण के लिए:  वर्ष 2020 में पेटीमुडी भूस्खलन का आंशिक कारण भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र के पास उत्खनन था, जिससे भूमि अस्थिर हो गई थी।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में तेजी: जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के पैटर्न में बदलाव, जैसे कि तीव्र मानसून, केरल के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि में योगदान करते हैं।
    • उदाहरण के लिए: वर्ष 2018 में केरल में अत्यधिक वर्षा के कारण आई बाढ़ के कारण राज्य भर में कई जगह भूस्खलन हुआ।
  • कृषि पद्धतियाँ और अतिचारण: असंवहनीय कृषि पद्धतियाँ, जैसे अतिचारण और अनुचित सीढ़ीनुमा खेती, मिट्टी की ऊपरी परत को नष्ट कर देती हैं, जिससे भूभाग भूस्खलन के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है। उदाहरण के लिए: वायनाड जिले में, पहाड़ी ढलानों पर अतिचारण के कारण मृदा संरचना कमजोर हुई है, जिससे अत्यधिक वर्षा के दौरान अक्सर भूस्खलन होता है।
  • नदी तट का कटाव और गाद: मानवीय गतिविधियों और गाद के जमाव के कारण नदी तटों का क्षरण मानसून के दौरान बाढ़ एवं भूस्खलन में योगदान देता है। उदाहरण के लिए: वर्ष 2018 की बाढ़ के दौरान पंबा नदी में काफी गाद जमा हो गई थी, जिससे आसपास के क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ गईं।
  • संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों पर अतिक्रमण: ऊँचे-ऊँचे क्षेत्रों जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों में मानव बस्तियाँ प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ती हैं, जिससे भूस्खलन की संभावना बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए: अट्टापडी पहाड़ियों के पास की बस्तियों में खड़ी ढलानों पर अतिक्रमण के कारण भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
  • खनन गतिविधियाँ और मिट्टी का उपयोग: केरल की पहाड़ियों में खनन कार्य मिट्टी और चट्टान की संरचना को अस्थिर करते हैं, जिससे संवेदनशील क्षेत्रों में भूस्खलन होता है। उदाहरण के लिए: मुन्नार जैसे क्षेत्रों में अवैध खनन गतिविधियाँ प्रत्यक्ष तौर पर भूस्खलन से संबंधित हैं, विशेषकर मानसून के मौसम के दौरान।

केरल के पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन के प्रभाव को कम करने के उपाय

  • सख्त भूमि-उपयोग विनियमन लागू करना: भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण एवं भूमि उपयोग पर सख्त विनियमन लागू करना, अनियमित विकास को रोकने के लिए महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए: केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण के लिए सख्त जोनिंग विनियमन का प्रस्ताव दिया है।
  • वनरोपण और पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना: भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में वनस्पति आवरण को पुनर्स्थापना करने और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए वनरोपण कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए: पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल ने केरल के पहाड़ी क्षेत्रों को स्थिर करने के लिए बड़े पैमाने पर वनरोपण परियोजनाओं की सिफारिश की।
  • सतत कृषि पद्धतियाँ: समोच्च जुताई और कृषि वानिकी जैसी टिकाऊ कृषि तकनीकों को अपनाने से मिट्टी को स्थिर करने और भूस्खलन को रोकने में मदद मिल सकती है। उदाहरण के लिए: वायनाड में कृषि वानिकी पहल किसानों को ऐसी पद्धतियाँ अपनाने में मदद कर रही है जो उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ कटाव को कम करती हैं।
  • निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: उन्नत निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ, जैसे वर्षा पैटर्न और ढलान स्थिरता सेंसर, स्थापित करने से जन हानि को रोकने के लिए समय पर चेतावनी दी जा सकती है। उदाहरण के लिए: केरल सरकार ने वर्षा संबंधी आँकड़ों का उपयोग करके चुनिंदा संवेदनशील क्षेत्रों में भूस्खलन की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की है।
  • आपदा प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी: आपदा तैयारी और जागरूकता कार्यक्रमों में स्थानीय समुदायों को शामिल करने से भूस्खलन के विरुद्ध लचीलापन बढ़ाया जा सकता है। उदाहरण के लिए: केरल में आपदा प्रबंधन योजना में स्थानीय लोगों को भूस्खलन के जोखिम और निकासी प्रक्रियाओं के बारे में शिक्षित करने के लिए समुदाय-आधारित पहल शामिल हैं।
  • उत्खनन और खनन गतिविधियों का विनियमन: उत्खनन और खनन गतिविधियों के लिए एक सख्त विनियामक ढाँचा भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों की अस्थिरता को कम कर सकता है। उदाहरण के लिए: केरल के खनन और भूविज्ञान विभाग ने इडुक्की जैसे भूस्खलन-संवेदनशील क्षेत्रों में खदानों पर सख्त नियंत्रण लागू किया है।
  • जलवायु अनुकूल अवसंरचना विकास: अवसंरचना विकास योजनाओं में जलवायु अनुकूलता को एकीकृत करना, जैसे कि रिटेनिंग दीवारें बनाना और सीढ़ीनुमा खेत बनाना, भूस्खलन के जोखिम को कम कर सकता है। उदाहरण के लिए: नाबार्ड ने वायनाड में जलवायु अनुकूल अवसंरचना परियोजनाओं को वित्तपोषित किया है, जिसका उद्देश्य बेहतर जल निकासी प्रणालियों और ढलान के  प्रबंधन के माध्यम करके भूस्खलन की भेद्यता को कम करना है।

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केरल के पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की बढ़ती संवेदनशीलता को संबोधित करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें सतत भूमि-उपयोग प्रथाएँ, सामुदायिक सहभागिता और मजबूत नीतिगत ढाँचे शामिल हैं। प्रभावी वनरोपण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और विनियामक प्रवर्तन के माध्यम से, केरल भूस्खलन के प्रभावों को कम कर सकता है, राज्य आबादी की सुरक्षा और अपने पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता सुनिश्चित कर सकता है।

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