Q. भारत वैश्विक AI केंद्र बनने की आकांक्षा रखता है, फिर भी बुनियादी AI अनुसंधान में निवेश सीमित है। विदेशी AI अवसंरचना और प्लेटफार्मों पर निर्भरता किस प्रकार डिजिटल उपनिवेशवाद के नए रूप को जन्म दे सकती है, इस पर चर्चा कीजिए। भारत अपनी तकनीकी संप्रभुता की रक्षा कैसे कर सकता है? (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बताइए कि विदेशी एआई अवसंरचना पर निर्भरता किस प्रकार डिजिटल उपनिवेशवाद को जन्म देती है।
  • समझाइए कि भारत अपनी प्रौद्योगिकीय संप्रभुता की रक्षा कैसे कर सकता है।

उत्तर

परिचय

कृत्रिम बुद्धिमत्ता 21वीं सदी में आर्थिक और सामरिक शक्ति का निर्णायक साधन बनकर उभर रही है। यद्यपि भारत एक वैश्विक एआई केंद्र बनने की आकांक्षा रखता है, परंतु विदेशी अवसंरचना, मॉडलों और पूँजी पर अत्यधिक निर्भरता डिजिटल उपनिवेशवाद के पैटर्न को पुनः उत्पन्न कर सकती है, जिससे दीर्घकालिक प्रौद्योगिकीय संप्रभुता तथा नवाचार क्षमता प्रभावित हो सकती है।

विदेशी एआई अवसंरचना पर निर्भरता किस प्रकार डिजिटल उपनिवेशवाद को जन्म देती है

  • बौद्धिक निर्भरता: जब आधारभूत मॉडल विदेशों में विकसित होते हैं, तो भारत सृजनकर्ता के बजाय केवल उपभोक्ता बनकर रह जाता है।
    • उदाहरण: सरकारी और स्टार्ट-अप अनुप्रयोगों के लिए अमेरिका स्थित बड़े भाषा मॉडलों पर अत्यधिक निर्भरता।
  • विदेश-नियंत्रित कंप्यूटिंग अवसंरचना: विदेशी क्लाउड सर्वरों पर महत्त्वपूर्ण एआई कार्यभार चलने से सामरिक संवेदनशीलता उत्पन्न होती है।
    • उदाहरण: भारतीय एआई स्टार्ट-अप्स का GPU उपलब्धता के लिए विदेशी हाइपरस्केलर पर निर्भर रहना।
  • मूल्य-संरक्षण के बिना डेटा दोहन: भारत विशाल डेटा उपलब्ध कराता है, जबकि मूल्य सृजन और मुद्रीकरण विदेशों में होता है।
    • उदाहरण: वैश्विक प्लेटफॉर्म भारतीय उपयोगकर्ता डेटा पर मॉडल प्रशिक्षित करते हैं, परंतु बौद्धिक संपदा (IP) विदेश में सुरक्षित रखते हैं।
  • बाह्य रूप से निर्धारित मानक और नियम: एआई शासन ढाँचे प्रभावशाली शक्तियों द्वारा निर्मित होते हैं, जो घरेलू नीति-निर्माण के दायरे को प्रभावित करते हैं।
    • उदाहरण: स्वदेशी मानक-निर्माण नेतृत्व के बिना अमेरिकी या यूरोपीय संघ के एआई मानकों के साथ अनुकूलन का दबाव।
  • आर्थिक अपवाह एवं सीमित बौद्धिक संपदा स्वामित्व: घरेलू सेमीकंडक्टर और आधारभूत अनुसंधान एवं विकास (R&D) पारितंत्र के अभाव में पूँजी का बाह्य प्रवाह होता है।
    • उदाहरण: उन्नत एआई चिप्स के लिए सीमित स्वदेशी विनिर्माण क्षमता के कारण आयात पर निर्भरता।

भारत अपनी प्रौद्योगिकीय संप्रभुता की रक्षा कैसे कर सकता है

  • आधारभूत अनुसंधान क्षमता का निर्माण: केवल API-आधारित अनुप्रयोगों से आगे बढ़कर स्वदेशी आधारभूत मॉडल विकसित करना आवश्यक है।
    • उदाहरण: IITs और IISc में अग्रणी एआई अनुसंधान के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण, जिसमें सहकर्मी-समीक्षित प्रकाशन सुनिश्चित हों।
  • कंप्यूट को रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में मानना: सॉवरन GPU क्लस्टर और घरेलू क्लाउड पारितंत्र में निवेश किया जाए।
    • उदाहरण: स्टार्ट-अप्स और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ राष्ट्रीय एआई कंप्यूट ग्रिड की स्थापना।
  • सेमीकंडक्टर क्षेत्र की सुदृढ़ता: घरेलू चिप डिजाइन और विनिर्माण क्षमता का विकास।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय चिप मिशनों के अंतर्गत सेमीकंडक्टर विनिर्माण प्रोत्साहनों का विस्तार।
  • STEM एवं कौशल पारितंत्र में सुधार: रटने वाली शिक्षा से हटकर व्यावहारिक एआई अनुसंधान और उत्पाद विकास पर बल देना।
    • उदाहरण: विश्वविद्यालय-उद्योग एआई प्रयोगशालाएँ, जो वास्तविक अनुप्रयोगों और पेटेंट पर केंद्रित हों।

निष्कर्ष

एआई के संदर्भ में डिजिटल उपनिवेशवाद, भू-क्षेत्रीय नियंत्रण के माध्यम से नहीं, बल्कि एल्गोरिदम, गणना अवसंरचना और बौद्धिक संपदा पर नियंत्रण के माध्यम से स्थापित होता है। भारत के लिए प्रौद्योगिकीय संप्रभुता सुनिश्चित करने हेतु वास्तविक अनुसंधान-गहनता, सेमीकंडक्टर सुदृढ़ता, संप्रभु गणना अवसंरचना तथा संस्थागत जवाबदेही आवश्यक है। इसके लिए AI के मात्र अंगीकरण से आगे बढ़कर प्रामाणिक एआई सृजन और वैश्विक मानक-निर्धारण में नेतृत्व की दिशा में ठोस परिवर्तन करना अनिवार्य होगा।

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