प्रश्न की मुख्य माँग
- जनसंख्या की वृद्धावस्था एवं बदलती कार्यबल संरचना के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव।
- क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असमानताओं के राजनीतिक प्रभाव।
- नीतिगत उपाय।
|
उत्तर
परिचय
भारत एक महत्त्वपूर्ण जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जहाँ 20वीं शताब्दी की जनसंख्या विस्फोट संबंधी चिंता से आगे बढ़कर 21वीं शताब्दी में वृद्ध होती जनसंख्या तथा क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असमानताओं की चुनौती उभर रही है। यद्यपि भारत की जनसंख्या के इस शताब्दी में आगे चलकर चरम स्तर पर पहुँचने के बाद घटने की संभावना है, किंतु वर्तमान में प्रमुख चुनौती वृद्ध होती जनसंख्या के प्रबंधन के साथ-साथ राज्यों के मध्य प्रजनन दर, कार्यबल की उपलब्धता तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में विद्यमान असमानताओं का प्रभावी ढंग से समाधान करना है।
IAS coaching
जनसांख्यिकीय संक्रमण के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- वृद्ध होती जनसंख्या एवं सामाजिक सुरक्षा का बढ़ता भार: वृद्धजन आबादी में वृद्धि से पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं तथा दीर्घकालिक देखभाल प्रणालियों की माँग बढ़ेगी।
- उदाहरण: पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अनुसार, 60 वर्ष एवं उससे अधिक आयु के भारतीयों की हिस्सेदारी वर्ष 2021 में 11% से बढ़कर वर्ष 2051 तक 28% होने का अनुमान है।
- बदलती कार्यबल संरचना: कार्यशील आयु वर्ग (Working-Age Population) में क्रमिक कमी से श्रम आपूर्ति एवं आर्थिक विकास प्रभावित हो सकते हैं। तथापि, प्रौद्योगिकी के माध्यम से उत्पादकता में वृद्धि तथा महिलाओं की कार्यबल भागीदारी बढ़ाकर इस प्रभाव की भरपाई की जा सकती है।
- स्वास्थ्य क्षेत्र में परिवर्तन: वृद्धावस्था के कारण गैर-संचारी रोगों तथा जेरियाट्रिक केयर की आवश्यकता बढ़ जाती है।
- उदाहरण: मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा डिमेंशिया के बढ़ते मामलों के कारण प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
- उत्पादक मानव पूँजी में निवेश की आवश्यकता: प्रजनन दर में कमी से प्रत्येक बच्चे की शिक्षा एवं कौशल विकास पर अधिक निवेश करने का अवसर प्राप्त होता है।
- उदाहरण: तमिलनाडु में कम प्रजनन दर के साथ मानव विकास में अधिक निवेश हुआ, जिससे 1990 के दशक में राज्य की GDP में हिस्सेदारी 7.1% से बढ़कर वर्ष 2023–24 में 8.9% हो गई।
क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असमानताएँ एवं राजनीतिक प्रभाव
- उत्तर-दक्षिण जनसांख्यिकीय विभाजन: दक्षिणी राज्यों में प्रजनन दर में कमी पहले आई, जबकि उत्तरी राज्यों में अपेक्षाकृत युवा जनसंख्या बनी हुई है।
- उदाहरण: तमिलनाडु की भारत की कुल जनसंख्या में हिस्सेदारी वर्ष 1971 में 7.5% से घटकर वर्ष 2011 में 6% हो गई, जबकि बिहार एवं उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की जनसंख्या में हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है।
- प्रतिनिधित्व एवं संघीय तनाव: भविष्य में जनसंख्या के आधार पर होने वाला परिसीमन उन राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है। इससे जनसांख्यिकीय उपलब्धि प्राप्त राज्यों एवं उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों के मध्य निष्पक्षता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- असमान आर्थिक अवसर: युवा जनसंख्या वाले राज्यों को रोजगार सृजन की आवश्यकता है, जबकि वृद्ध होती जनसंख्या वाले राज्यों को स्वास्थ्य सेवाओं एवं सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों की आवश्यकता अधिक है।
- उदाहरण: उत्तरी राज्यों से औद्योगिक रूप से विकसित दक्षिणी राज्यों की ओर श्रम प्रवासन में वृद्धि हो सकती है।
- लैंगिक एवं सामाजिक नीति संबंधी प्रभाव: प्रजनन दर पर होने वाली बहस का ध्यान प्रायः महिलाओं के प्रजनन संबंधी विकल्पों को नियंत्रित करने की ओर स्थानांतरित हो जाता है, जबकि कल्याण पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
- उदाहरण: उपलब्ध साक्ष्य दर्शाते हैं कि प्रजनन दर में कमी का संबंध शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा तथा बाल-पालन की लागत में कमी से है।
आगे की राह
- वृद्धावस्था के अनुरूप सामाजिक सुरक्षा प्रणाली का निर्माण: पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं तथा वृद्धजन देखभाल अवसंरचना का विस्तार किया जाए।
- उदाहरण: अटल पेंशन योजना को सुदृढ़ किया जाए तथा आयुष्मान भारत के अंतर्गत जराचिकित्सा सेवाओं का विस्तार किया जाए।
- महिलाओं की कार्यबल भागीदारी बढ़ाना: महिलाओं की अप्रयुक्त श्रम क्षमता का उपयोग कर जनसांख्यिकीय वृद्धावस्था के प्रभाव को कम किया जाए।
- उदाहरण: बाल देखभाल सुविधाओं, सुरक्षित कार्यस्थलों तथा लचीले रोजगार मॉडल का विस्तार किया जाए।
- संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना: विभिन्न राज्यों की जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के अनुरूप निवेश किया जाए।
- उदाहरण: युवा जनसंख्या वाले राज्यों में कौशल विकास एवं विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार कर जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग किया जाए।
- संतुलित संघीय प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना: परिसीमन के लिए ऐसा संतुलित दृष्टिकोण विकसित किया जाए, जिसमें जनसंख्या के साथ-साथ विकासात्मक योगदान को भी ध्यान में रखा जाए।
- उदाहरण: जनसांख्यिकीय भार के साथ सुशासन एवं आर्थिक योगदान जैसे संकेतकों को भी सम्मिलित किया जाए।
- जनसंख्या नियंत्रण से जनसंख्या प्रबंधन की ओर बढ़ना: बलपूर्वक प्रजनन नियंत्रण नीतियों के स्थान पर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तथा मानव पूँजी विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
Click to Know UPSC OnlyIAS Coaching Centres
निष्कर्ष
भारत का जनसांख्यिकीय भविष्य केवल जनसंख्या के आकार से निर्धारित नहीं होगा, बल्कि वृद्ध होती जनसंख्या, कार्यबल में हो रहे परिवर्तन तथा क्षेत्रीय असमानताओं के प्रभावी प्रबंधन की क्षमता पर निर्भर करेगा। सामाजिक सुरक्षा, मानव पूँजी विकास, महिला सशक्तीकरण तथा सहकारी संघवाद पर आधारित संतुलित रणनीति ही यह सुनिश्चित करेगी कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन भारत के लिए चुनौती के बजाय विकास का अवसर सिद्ध हो।