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Q. भारत-यूरोपीय संघ संबंध लंबे समय से 'संभाव्यता के जाल' (Potential Trap) से प्रभावित रहे हैं। 'निर्भरता के शस्त्रीकरण' (Weaponization of dependence) के युग में, समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए कि दोनों क्षेत्र 'रणनीतिक प्रशंसकों' (Strategic Admirers) से 'वास्तविक आर्थिक भागीदारों' के रूप में कैसे परिवर्तित हो सकते हैं। (15 अंक, 250 शब्द)

June 24, 2026

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग 

  • भारत–यूरोपीय संघ (EU) के आर्थिक एवं सामरिक संबंधों में विद्यमान चुनौतियों तथा तथाकथित “संभाव्यता जाल (Potential Trap)”। 
  • भारत–यूरोपीय संघ (EU) संबंधों को एक वास्तविक आर्थिक भागीदारी में परिवर्तित करने के उपाय सुझाइए।

उत्तर

परिचय

दशकों से भारत–यूरोपीय संघ (EU) संबंधों की पहचान ठोस उपलब्धियों की अपेक्षा अप्रयुक्त संभावनाओं से रही है। ऐसे समय में जब व्यापार, आपूर्ति शृंखलाएँ, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सामरिक प्रभाव के प्रमुख साधन बनते जा रहे हैं, भारत और यूरोप दोनों निर्भरता-आधारित कमजोरियों के जोखिम का सामना कर रहे हैं। एक वास्तविक साझेदारी के लिए केवल संवाद और पारस्परिक प्रशंसा से आगे बढ़कर ऐसे ठोस एवं पारस्परिक रूप से लाभकारी परियोजनाओं पर बल देना आवश्यक है, जो सामरिक स्वायत्तता को सुदृढ़ कर सकें।

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भारत–यूरोपीय संघ (EU) संबंधों में विद्यमान चुनौतियाँ

  • संभाव्यता जाल एवं अपर्याप्त सहयोग: बार-बार होने वाले शिखर सम्मेलनों, मंचों और संवादों के बावजूद अधिकांश भारत–यूरोपीय संघ (EU) पहलें अभी भी आकांक्षात्मक स्तर पर ही सीमित हैं। भारत विश्व की सबसे तीव्र गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था तथा उन्नत डिजिटल अवसंरचना वाला देश है, फिर भी यूरोपीय संघ (EU) का दृष्टिकोण प्रायः सह-निर्माण के बजाय विकास सहायता एवं नियामकीय मार्गदर्शन पर केंद्रित रहता है।
  • निर्भरता का शस्त्रीकरण: वैश्विक व्यापार, प्रौद्योगिकी एवं ऊर्जा प्रवाह शक्ति-प्रयोग के साधन बनते जा रहे हैं, जिससे सामरिक स्वायत्तता के लिए जोखिम उत्पन्न होता है।
    • उदाहरण: यदि भारत  यूरोपीय संघ (EU) अथवा तृतीय-पक्ष प्रौद्योगिकियों पर अत्यधिक निर्भर हो, तो महत्त्वपूर्ण खनिजों या आपूर्ति शृंखलाओं पर प्रतिबंध उसके विनिर्माण एवं हरित ऊर्जा कार्यक्रमों को प्रभावित कर सकते हैं।
  • सामरिक समझ में असमानता: यूरोपीय संघ (EU) प्रायः भारत को पुराने विकास-केंद्रित दृष्टिकोण से देखता है, जबकि भारत का ध्यान बाजार पहुँच एवं अनुपालन संबंधी बाधाओं पर अधिक रहता है, जिससे संतुलित सहभागिता बाधित होती है।
  • विखंडित नियामकीय ढाँचे: सततता, डिजिटल मानकों तथा औद्योगिक नीतियों से संबंधित विभिन्न नियामकीय व्यवस्थाएँ व्यापारिक मतभेदों और अवरोधों को जन्म देती हैं।
  • भू-अर्थशास्त्रीय प्रतिस्पर्धा: उभरते वैश्विक शक्ति-केंद्रों ने अंतरराष्ट्रीय संतुलन को परिवर्तित कर दिया है। साझा दृष्टि के अभाव में भारत–यूरोपीय संघ (EU) संबंध सामरिक साझेदारी के बजाय केवल लेन-देन आधारित संबंध बनकर रह सकते हैं। साथ ही, समन्वित ग्लोबल साउथ सहभागिता के अभाव में दोनों क्षेत्र प्रतिस्पर्द्धी प्रभाव-क्षेत्रों की ओर आकर्षित होने का जोखिम उठाते हैं। 

वास्तविक आर्थिक भागीदारी की ओर संक्रमण

  • मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का प्रभावी क्रियान्वयन: FTA का शीघ्र अनुमोदन, उत्पत्ति के नियम (Rules of Origin) का निर्धारण तथा अनुपालन ढाँचे का विकास किया जाए।
    • उदाहरण: हरित हाइड्रोजन, बैटरी पारितंत्र तथा डिजिटल सेवाओं के लिए संयुक्त मंचों की स्थापना।
  • निर्देशन के बजाय सह-निर्माण: केवल नियामकीय मार्गदर्शन तक सीमित रहने के बजाय प्रौद्योगिकी एवं औद्योगिक परियोजनाओं के बड़े पैमाने पर संयुक्त विकास तथा कार्यान्वयन पर बल दिया जाए।
  • विविधीकृत सामरिक सहभागिता: विशिष्ट गुटों तक सीमित रहने के बजाय उभरते बाजारों के साथ सेतु-निर्माण करते हुए द्विपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ किया जाए।
    • उदाहरण: भारत के तीव्र बंदरगाह, हवाई अड्डा एवं औद्योगिक क्लस्टर विस्तार का लाभ उठाते हुए नवीकरणीय ऊर्जा एवं अवसंरचना परियोजनाओं में सहयोग।
  • संस्थागत विवाद-प्रबंधन तंत्र: कार्बन मानकों, डिजिटल विनियमन तथा बाजार पहुँच जैसे मुद्दों पर मतभेदों का रचनात्मक समाधान करने हेतु संस्थागत तंत्र विकसित किया जाए, ताकि साझेदारी प्रभावित न हो।
  • संयुक्त अनुसंधान एवं नवाचार पहल: भारत और यूरोपीय संघ (EU) जलवायु, ऊर्जा तथा डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्रों में उन्नत प्रौद्योगिकियों का संयुक्त विकास कर सकते हैं।
  • आपूर्ति शृंखला प्रत्यास्थता का सुदृढ़ीकरण: सामरिक क्षेत्रों में परस्पर निर्भरता से उत्पन्न जोखिमों को कम करने हेतु स्रोतों एवं लॉजिस्टिक नेटवर्क का विविधीकरण किया जाए।
    • उदाहरण: सेमीकंडक्टर एवं बैटरी विनिर्माण के लिए भारत–यूरोपीय संघ (EU) औद्योगिक गलियारों में निवेश।

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निष्कर्ष

“संभाव्यता जाल” (Potential Trap) से बाहर निकलने तथा निर्भरता-जनित जोखिमों का सामना करने के लिए भारत और यूरोपीय संघ (EU) को सह-निर्माण, परियोजना-आधारित क्रियान्वयन, सामरिक विविधीकरण तथा मतभेदों के संस्थागत प्रबंधन पर विशेष बल देना होगा। तभी यह संबंध सामरिक प्रशंसा से आगे बढ़कर वास्तविक आर्थिक भागीदारी में रूपांतरित हो सकेगा।

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The India-EU relationship has long suffered from the ‘potential trap’. In the era of ‘weaponisation of dependence’, critically analyse how both regions can transition from strategic admirers to genuine economic partners. in hindi

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