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Q. पिछले दशक में कई मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) में प्रवेश करने के बावजूद, भारत ने आसियान और जापान जैसे प्रमुख साझेदारों के साथ व्यापार घाटे में वृद्धि देखी है। इस प्रवृत्ति के पीछे संरचनात्मक कारणों का विश्लेषण कीजिए और अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ आगामी समझौतों से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

December 13, 2025

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • व्यापार घाटे में वृद्धि के संरचनात्मक कारण
  • आगामी अमेरिकी समझौते से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के उपाय
  • आगामी यूरोपीय संघ समझौते से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के उपाय

उत्तर

पिछले एक दशक में अनेक मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, आसियान और जापान जैसे साझेदारों के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़ा है। यह विरोधाभास केवल शुल्क उदारीकरण के परिणामों से नहीं, बल्कि भारत के विनिर्माण क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरियों, निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता और मुक्त व्यापार समझौतों के सीमित उपयोग से उत्पन्न होता है।

व्यापार घाटा बढ़ने के पीछे संरचनात्मक कारण

  • आयात-प्रधान समझौते: भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) ने निर्यात की तुलना में आयात पर शुल्क को तेजी से कम किया, जिससे भागीदार अर्थव्यवस्थाओं को अधिक लाभ हुआ।
    • उदाहरण: आसियान मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी के आयात में भारी वृद्धि हुई।
  • कमजोर विनिर्माण आधार: सीमित पैमाना, प्रौद्योगिकी अंतराल और उच्च लॉजिस्टिक्स लागत भारत की निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को बाधित करते हैं।
    • उदाहरण: वैश्विक विनिर्माण में भारत की हिस्सेदारी 2% से कम बनी हुई है।
  • समझौतों का कम उपयोग: उत्पत्ति के जटिल नियम और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों में जागरूकता की कमी से तरजीही शुल्कों के प्रभावी उपयोग को कम करती है।
    • उदाहरण: भारत की मुक्त व्यापार समझौते (FTA) संबंधी उपयोग दर लगभग 25% है।
  • सेवाओं का अपर्याप्त उपयोग: समझौते वस्तुओं पर अधिक केंद्रित रहे, जिससे सेवा क्षेत्र में भारत की शक्ति का पूरा लाभ नहीं मिला।

आगामी अमेरिका समझौते से लाभ अधिकतम करने के उपाय

  • सेवाओं के बाजार तक पहुँच: सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और पेशेवरों की आवाजाही सुनिश्चित करना।
  • प्रौद्योगिकी–विनिर्माण समन्वय: अर्द्धचालक, रक्षा और स्वच्छ प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं के साथ समझौते का संरेखण।
    • उदाहरण: भारत–अमेरिका महत्त्वपूर्ण एवं उभरती iCET प्रौद्योगिकी पहल
  • मानकों का सामंजस्य: मानकों की पारस्परिक मान्यता से गैर-शुल्क बाधाओं में कमी।
  • रणनीतिक शुल्क संतुलन: संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करते हुए प्रतिस्पर्द्धी निर्यात क्षेत्रों को खोलना।
    • उदाहरण: व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी से बाहर निकलने के अनुभव।
  • डिजिटल व्यापार नियम: भारत की डिजिटल संप्रभुता की रक्षा करते हुए निष्पक्ष डेटा संबंधी शासन सुनिश्चित करना।

आगामी यूरोपीय संघ समझौते से लाभ अधिकतम करने के उपाय

  • हरित संक्रमण का लाभ: नवीकरणीय ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन में निर्यात बढ़ाने हेतु यूरोपीय हरित मांग का उपयोग करना।
    • उदाहरण: भारत–यूरोपीय संघ स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी।
  • कार्बन समायोजन की तैयारी: निर्यातकों को कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के अनुरूप ढलने में सहायता प्रदान करना ।
  • भौगोलिक संकेतक और सूक्ष्म उद्यम संरक्षण: भारत के भौगोलिक संकेतकों और लघु उत्पादकों की सुरक्षा करना।
    • उदाहरण: भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) वार्ता में भौगोलिक संकेत संबंधी वार्ता।
  • सेवाएँ और गतिशीलता: सूचना प्रौद्योगिकी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ाना।
  • श्रम–पर्यावरण संतुलन: अनुपालन को विकास प्राथमिकताओं के साथ संतुलित करना।
    • उदाहरण: यूरोपीय संघ के सतत् विकास संबंधी प्रावधानों पर भारत का दृष्टिकोण।

निष्कर्ष

भारत के मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि केवल बाजार पहुँच से ही व्यापारिक लाभ सुनिश्चित नहीं हो सकते। अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ भविष्य के समझौते रणनीतिक, क्षेत्र-विशिष्ट और क्षमतावर्धक होने चाहिए, जो व्यापार नीति को औद्योगिक शक्ति, सेवा क्षेत्र में नेतृत्व और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में दीर्घकालिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता के अनुरूप हो।

“Despite entering into numerous Free Trade Agreements (FTAs) in the last decade, India has witnessed a widening trade deficit with key partners like ASEAN and Japan. Analyze the structural reasons behind this trend and suggest measures to maximize gains from upcoming pacts with the US and EU.” in hindi

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