प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत को अमेरिका का स्वाभाविक सहयोगी मानने के पक्ष में तर्क दीजिए।
- भारत को अमेरिका का स्वाभाविक सहयोगी मानने के विरोध में तर्क दीजिए।
- आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
रक्षा, प्रौद्योगिकी तथा हिंद-प्रशांत सहयोग के क्षेत्रों में भारत–अमेरिका संबंधों में उल्लेखनीय गहराई आई है, किंतु भारत की विदेश नीति अब भी रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। ईरान युद्ध और अमेरिका की एकपक्षीय नीतियाँ इस संतुलन को और अधिक जटिल, साथ ही आवश्यक बनाती हैं।
अमेरिका के स्वाभाविक सहयोगी के रूप में भारत — पक्ष में तर्क
- रणनीतिक अभिसरण: दोनों देश एक स्थिर हिंद-प्रशांत क्षेत्र तथा नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करते हैं, विशेषकर चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के संदर्भ में।
- उदाहरण: भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया हिंद-प्रशांत स्थिरता हेतु क्वाड के माध्यम से सहयोग करते हैं।
- रक्षा सहयोग: लॉजिस्टिक समझौतों, सैन्य अभ्यासों और प्रौद्योगिकी साझाकरण के माध्यम से बढ़ते रक्षा संबंध रणनीतिक विश्वास को दर्शाते हैं।
- उदाहरण: भारत ने अमेरिका के साथ COMCASA और BECA जैसे आधारभूत समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।
- प्रौद्योगिकी साझेदारी: अमेरिका अर्द्धचालक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में भारत का प्रमुख साझेदार है, जो भारत के एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभार को समर्थन देता है।
- उदाहरण: भारत–अमेरिका iCET पहल कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग और अर्द्धचालक आपूर्ति शृंखलाओं में सहयोग को बढ़ावा देती है।
- आर्थिक परस्पर निर्भरता: व्यापार, निवेश और सेवा क्षेत्र में मजबूत संबंध दोनों देशों को एक-दूसरे के लिए आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण बनाते हैं।
- उदाहरण: अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है, जहाँ सेवाओं और डिजिटल व्यापार का निरंतर विस्तार हो रहा है।
- लोकतांत्रिक मूल्य: लोकतंत्र, बहुलवाद और खुले समाज के प्रति साझा प्रतिबद्धता दीर्घकालिक साझेदारी के लिए वैचारिक सहजता प्रदान करती है।
भारत अमेरिका का स्वाभाविक सहयोगी क्यों नहीं है?
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत गठबंधन-आधारित राजनीति से बचते हुए स्थायी संरेखण के बजाय मुद्दा-आधारित साझेदारियों को प्राथमिकता देता है।
- उदाहरण: रूस–यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने स्वतंत्र संबंध बनाए रखे।
- ईरान से जुड़े हित: भारत को ऊर्जा सुरक्षा, संपर्क परियोजनाओं तथा क्षेत्रीय संतुलन के लिए ईरान के साथ स्थिर संबंधों की आवश्यकता है, जो कई बार अमेरिकी नीतियों से टकरा सकते हैं।
- अमेरिकी एकपक्षीयता: अमेरिका की एकपक्षीय कार्रवाइयाँ अक्सर भारत के रणनीतिक क्षेत्र को सीमित करती हैं और वॉशिंगटन पर अत्यधिक निर्भरता की सीमाओं को उजागर करती हैं।
- व्यापारिक दबाव: अमेरिका के शुल्क युद्ध और संरक्षणवादी नीतियाँ यह दर्शाती हैं कि वॉशिंगटन साझेदारी प्रतिबद्धताओं से अधिक अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।
- बहुध्रुवीय व्यवस्था की प्राथमिकता: भारत वितरित बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन करता है, जबकि अमेरिका प्रायः एकध्रुवीय प्रभुत्व बनाए रखने की दिशा में कार्य करता है।
- उदाहरण: फ्राँस और यूरोपीय संघ के साथ भारत की गहरी होती साझेदारी उसकी रणनीतिक लचीलेपन की खोज को प्रतिबिंबित करती है।
आगे की राह
- मुद्दा-आधारित सहयोग: भारत को उन क्षेत्रों में अमेरिका के साथ सहयोग करना चाहिए, जहाँ हितों का अभिसरण हो, किंतु कठोर सैन्य गठबंधनों का हिस्सा बनने से बचना चाहिए।
- उदाहरण: हिंद-प्रशांत सुरक्षा में सहयोग जारी रखा जा सकता है, बिना NATO जैसे औपचारिक सैन्य गुट में शामिल हुए।
- ईरान संबंधों का संरक्षण: ऊर्जा पहुँच और मध्य एशिया से संपर्क बनाए रखने हेतु भारत को ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए।
- उदाहरण: चाबहार बंदरगाह भारत की पश्चिमोन्मुखी संपर्क रणनीति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना हुआ है।
- यूरोप के साथ संबंध सुदृढ़ करना: यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारियों का विस्तार वॉशिंगटन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करेगा तथा भारत की सौदेबाजी क्षमता को मजबूत करेगा।
- घरेलू क्षमता निर्माण: रणनीतिक स्वायत्तता के लिए घरेलू रक्षा उत्पादन, ऊर्जा लचीलापन और प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
- उदाहरण: रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भर भारत पहल स्वतंत्र विदेश नीति विकल्पों को समर्थन देती है।
- लचीली बहुध्रुवीयता: भारत को बहु-संरेखण की नीति जारी रखनी चाहिए, जिसमें वह अमेरिका, रूस, यूरोप और पश्चिम एशिया — सभी के साथ समानांतर रूप से कार्य करे।
- उदाहरण: क्वाड, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन तथा खाड़ी देशों के साथ भारत के समानांतर संबंध उसके व्यावहारिक रणनीतिक लचीलेपन को दर्शाते हैं।
निष्कर्ष
भारत की विदेश नीति स्थायी गठबंधनों से अधिक लचीले राष्ट्रीय हितों द्वारा संचालित होती है। वास्तविक चुनौती अमेरिका के साथ सहयोग को गहरा करने के साथ-साथ अपनी स्वतंत्र रणनीतिक पसंद को सुरक्षित रखने में निहित है, विशेषकर ऐसे समय में जब ईरान संकट और पश्चिम एशिया की अस्थिरता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की दृढ़ता की परीक्षा ले रहे हैं।