प्रश्न की मुख्य माँग
- पुनर्संरचित पश्चिम एशिया में भारत–इजरायल के गहराते संबंधों का मूल्यांकन।
- भारत के वैश्विक दक्षिण नेतृत्व एवं मानक-आधारित (Normative) विश्वसनीयता पर प्रभाव।
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उत्तर
परिचय
इजरायल के साथ भारत की गहन होती रणनीतिक सहभागिता से रक्षा प्रौद्योगिकी, खुफिया सहयोग तथा कृषि नवाचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय रणनीतिक लाभ प्राप्त हुए हैं। तथापि, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण (Geopolitical Realignment)—जिसकी विशेषताएँ ईरान का पुनरुत्थान, खाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता तथा गाजा संघर्ष को लेकर बढ़ता ध्रुवीकरण हैं—के परिप्रेक्ष्य में यह निकटता भारत के रणनीतिक संतुलन तथा वैश्विक दक्षिण (Global South) के एक विश्वसनीय प्रतिनिधि स्वर के रूप में उसकी स्थिति को लेकर चिंताएँ भी उत्पन्न करती है।
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भारत–इजरायल साझेदारी का महत्त्व
- रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग का सुदृढ़ीकरण: इजरायल भारत के लिए उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी तथा विद्रोह-रोधी (Counter-insurgency) विशेषज्ञता का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया है।
- उदाहरण: भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा हेरॉन MK-I एवं हेरॉन MK-II जैसे इजरायली मानवरहित हवाई वाहन (UAVs) तथा निगरानी प्रणालियों (Surveillance Systems) का सीमायी सुरक्षा अभियानों में उपयोग।
- कृषि एवं प्रौद्योगिकी सहयोग: ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) एवं मरुस्थलीय कृषि (Desert Agriculture) से संबंधित इजरायली प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण से ग्रामीण कृषि उत्पादकता को बढ़ावा मिला है।
- उदाहरण: भारत–इजरायल कृषि उत्कृष्टता केंद्र (Indo-Israel Centres of Excellence) अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में जल उपयोग दक्षता (Water-use Efficiency) में सुधार कर रहे हैं।
- खुफिया एवं आतंकवाद-रोधी सहयोग: असममित युद्ध (Asymmetric Warfare) से निपटने के साझा अनुभव ने भारत की आंतरिक सुरक्षा तैयारियों को सुदृढ़ किया है।
- उदाहरण: भारत में प्रमुख आतंकवादी घटनाओं के बाद आतंकवाद-रोधी प्रौद्योगिकी (Counter-terror Technology) के क्षेत्र में भारत–इजरायल सहयोग को और मजबूत किया गया।
पुनर्संरचित/पुनर्गठित पश्चिम एशिया में भारत के समक्ष जोखिम
- ईरान से संबंधों में दूरी तथा बदलते क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का जोखिम: ईरान एक महत्त्वपूर्ण सभ्यतागत एवं भू-राजनीतिक शक्ति है, जिसका खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता एवं ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव है।
- उदाहरण: हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में किसी भी प्रकार का व्यवधान भारत के कच्चे तेल के आयात एवं ऊर्जा सुरक्षा को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
- पश्चिम एशिया में भारत की बहु-वैकल्पिक (Multi-vector) कूटनीति पर प्रभाव: इजरायल के साथ अत्यधिक निकटता भारत की इजरायल, ईरान एवं अरब खाड़ी देशों के बीच संतुलनकारी भूमिका को कमजोर कर सकती है।
- उदाहरण: खाड़ी देशों में भारत के विशाल प्रवासी समुदाय तथा प्रेषण (Remittances) पर निर्भरता भारत से संतुलित एवं तटस्थ कूटनीतिक दृष्टिकोण की अपेक्षा करती है।
- बढ़ता क्षेत्रीय ध्रुवीकरण एवं अनिश्चितता: इजरायल–ईरान तनाव तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (US) की बदलती क्षेत्रीय रणनीति के कारण किसी एक पक्ष के साथ प्रभावी रणनीतिक संरेखण जोखिमपूर्ण हो सकता है।
- उदाहरण: वर्ष 2026 में इजरायल–अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए समन्वित हमलों के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी तथा वैश्विक ऊर्जा बाजारों में व्यापक उतार-चढ़ाव देखने को मिला।
वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व पर भारत के लिए निहितार्थ
- मानक-आधारित असंगति की धारणा का जोखिम: वैश्विक दक्षिण के अधिकांश देश फिलिस्तीनी मुद्दे के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखते हैं। ऐसे में इजरायल के साथ अत्यधिक निकटता भारत की नैतिक एवं कूटनीतिक विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है।
- उदाहरण: “विश्वबंधु” के रूप में भारत की छवि बहुपक्षीय मंचों पर अपनी विश्वसनीयता खोने के जोखिम का सामना कर सकती है।
- भारत–यूरोप आर्थिक कूटनीति पर प्रभाव: यूरोप में जनमत इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों के प्रति लगातार अधिक आलोचनात्मक होता जा रहा है।
- उदाहरण: राजनीतिक धारणा (Political Optics) के कारण भारत–यूरोपीय संघ (EU), मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं पर अतिरिक्त समीक्षा एवं दबाव उत्पन्न हो सकता है।
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में गुटनिरपेक्ष विरासत के समक्ष चुनौती: किसी एक पक्ष के साथ अत्यधिक रणनीतिक निकटता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की अवधारणा को कमजोर कर सकती है।
- उदाहरण: खाड़ी देशों, ईरान तथा इजरायल के साथ भारत की समानांतर सहभागिता के लिए संतुलित एवं सावधानीपूर्वक कूटनीतिक संतुलन (Calibrated Balancing) बनाए रखना आवश्यक है।
आगे की राह
- बहु-संरेखण: पश्चिम एशिया नीति के मूल सिद्धांत के रूप में “विशिष्टता रहित बहु-संरेखण (Multi-Alignment without Exclusivity)” की नीति को पुनः सुदृढ़ किया जाए।
- समानांतर कूटनीति: इजरायल, ईरान तथा खाड़ी देशों के साथ समानांतर रणनीतिक संवाद बनाए रखा जाए तथा किसी एक पक्ष के साथ सुरक्षा-केंद्रित (Securitised) संरेखण से बचा जाए।
- आर्थिक संबंध: यूरोप एवं वैश्विक दक्षिण के साथ मानवीय मूल्यों पर आधारित सुसंगत कूटनीतिक दृष्टिकोण (Consistent Humanitarian Positioning) अपनाकर आर्थिक कूटनीति को सुदृढ़ किया जाए।
- मध्यस्थ की भूमिका (Mediation Role): पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक मध्यस्थता (Diplomatic Mediation) की भूमिका का विस्तार किया जाए, जिससे सेतु शक्ति (Bridge Power) के रूप में भारत की वैश्विक छवि और अधिक सुदृढ़ हो सके।
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निष्कर्ष
इजरायल के साथ भारत की सहभागिता रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी है, किंतु यह भू-राजनीतिक लागतों से पूर्णतः मुक्त नहीं है। तीव्र गति से पुनर्संरचित हो रहे पश्चिम एशिया में किसी एक पक्ष के साथ अत्यधिक निकटता भारत की कूटनीतिक लचीलापन (Diplomatic Flexibility) को सीमित कर सकती है तथा वैश्विक दक्षिण (Global South) के नेतृत्वकर्ता के रूप में उसकी भूमिका को कमजोर कर सकती है। इसलिए भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए संतुलित, रणनीतिक रूप से स्वायत्त तथा बहु-वैकल्पिक (Multi-vector) कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।