प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत और पाकिस्तान के बीच सार्थक संवाद की व्यवहार्यता
- ट्रैक-II कूटनीति की भूमिका एवं सीमाएँ
- आगे की राह
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उत्तर
परिचय
वर्ष 2016 में पठानकोट और उरी आतंकवादी हमलों के बाद से भारत–पाकिस्तान संवाद निलंबित है। इसके बाद की पुलवामा (2019) तथा 22 अप्रैल, 2025 के पहलगाम नरसंहार जैसी घटनाओं के परिणामस्वरूप ऑपरेशन सिंदूर और मई 2025 का चार-दिवसीय युद्ध हुआ, इन परिस्थितियों दोनों देशों के संबंधों को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया। फिर भी, दो परमाणु-संपन्न पड़ोसी देशों के बीच पूर्ण संवादहीनता गंभीर जोखिम उत्पन्न करती है। इस संदर्भ में गैर-क्षेत्रीय मुद्दों पर कार्यात्मक संवाद तथा ट्रैक-II कूटनीति (Track-II Diplomacy) विश्वास-निर्माण के लिए सीमित, किंतु सार्थक माध्यम प्रदान कर सकते हैं।
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गैर-क्षेत्रीय मुद्दों पर कार्यात्मक संवाद की व्यावहारिकता
- साझी विकासात्मक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करना: नागरिकों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर संवाद, राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रीय विवादों से बचने में सहायक हो सकता है।
- उदाहरण: जलवायु परिवर्तन एवं वायु प्रदूषण जैसे साझा मुद्दों पर सहयोग, पराली जलाने तथा सीमा-पार प्रदूषण जैसी समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकता है।
- परमाणु स्थिरता एवं संकट संचार: गलत आकलन के कारण तनाव बढ़ने से रोकने के लिए संचार तंत्र बनाए रखना आवश्यक है।
- उदाहरण: ब्रह्मोस मिसाइल के आकस्मिक प्रक्षेपण की घटना के दौरान सैन्य संचार माध्यमों ने तनाव बढ़ने से रोकने में सहायता की।
- मानवीय एवं आर्थिक सहयोग: सीमित स्तर पर सहयोग, मूलभूत सुरक्षा चिंताओं से समझौता किए बिना संस्थागत विश्वास को पुनः स्थापित कर सकता है।
- क्षेत्रीय चुनौतियों के समाधान हेतु सहयोग की आवश्यकता: आतंकवाद, जलवायु संकट तथा जल असुरक्षा जैसी चुनौतियों का प्रभावी समाधान पूर्ण कूटनीतिक अलगाव के माध्यम से संभव नहीं है।
ट्रैक-II कूटनीति की भूमिका एवं सीमाएँ
- वैकल्पिक संवाद माध्यमों का निर्माण: जब आधिकारिक संवाद बाधित हो, तब ट्रैक-II कूटनीति पूर्व अधिकारियों, शिक्षाविदों एवं नागरिक समाज के मध्य संवाद का अवसर प्रदान करती है।
- सामाजिक विश्वास का निर्माण: गैर-सरकारी संवाद आपसी शत्रुता कम कर पारस्परिक समझ को बढ़ावा दे सकते हैं।
- राज्य-स्तरीय कार्रवाई का विकल्प नहीं: ट्रैक-II कूटनीति के पास समझौतों को लागू करने या सुरक्षा संबंधी विवादों का समाधान करने का अधिकार नहीं होता है।
- उदाहरण: पूर्व की शांति पहलें पठानकोट (2016) और पुलवामा (2019) जैसे आतंकवादी हमलों के कारण बार-बार बाधित हुईं।
- जवाबदेही के बिना संवाद का जोखिम: आतंकवाद के विरुद्ध विश्वसनीय कार्रवाई के बिना संवाद, भारत के लिए राजनीतिक एवं सुरक्षा संबंधी चिंताएँ उत्पन्न कर सकता है।
आगे की राह
- आतंकवाद को संवाद का केंद्रीय आधार बनाए रखना: किसी भी संवाद प्रक्रिया के लिए सीमा-पार आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। भारत लगातार संबंधों को सामान्य करने के एवज में आतंकी ढाँचे के पूर्ण उन्मूलन की बात करता रहा है।
- मुद्दा-आधारित क्रमिक सहभागिता: विवादास्पद राजनीतिक मुद्दों से पहले कार्यात्मक सहयोग के क्षेत्रों में संवाद प्रारंभ किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संबंधी सहयोग विश्वास निर्माण उपाय के रूप में कार्य कर सकते हैं।
- संस्थागत संचार तंत्र: संकट की स्थिति के प्रभावी प्रबंधन हेतु सैन्य एवं कूटनीतिक हॉटलाइन जैसे संचार तंत्रों को बनाए रखना और सुदृढ़ करना आवश्यक है।
- हितधारकों के साथ संतुलित सहभागिता: पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए, उन संस्थाओं के साथ संवाद स्थापित किया जाए, जो किए गए वादों एवं प्रतिबद्धताओं को प्रभावी ढंग से लागू करने में सक्षम हों।
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निष्कर्ष
कार्यात्मक संवाद और ट्रैक-II कूटनीति स्वयं में भारत–पाकिस्तान विवाद का समाधान नहीं कर सकते, किंतु वे संबंधों को और द्विपक्षीय संबंधों में और अधिक तनाव को रोकने तथा सहयोग के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सुरक्षा आश्वासनों, मुद्दा-आधारित सहभागिता तथा निरंतर संवाद तंत्र पर आधारित व्यावहारिक दृष्टिकोण, भारत के मूलभूत हितों की रक्षा करते हुए स्थायी एवं सतत् शांति की दिशा में एक यथार्थवादी मार्ग प्रदान कर सकता है।