प्रश्न की मुख्य माँग
- जहाज निर्माण (Shipbuilding) क्षेत्र में भारत–दक्षिण कोरिया सहयोग का महत्त्व।
- भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र में विद्यमान संरचनात्मक एवं परिचालन संबंधी चुनौतियाँ।
- इन चुनौतियों के समाधान में वित्तीय एवं नीतिगत पहलों, जैसे SFCL की भूमिका।
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उत्तर
परिचय
भारत मैरीटाइम विजन 2030 एवं मैरीटाइम अमृतकाल विजन 2047 के अंतर्गत स्वयं को एक वैश्विक जहाज निर्माण केंद्र (Global Shipbuilding Hub) के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखता है, जिसमें क्रमशः विश्व के शीर्ष 10 एवं शीर्ष 5 देशों में स्थान प्राप्त करना शामिल है। भारत–दक्षिण कोरिया साझेदारी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह सहयोग भारत को डिजाइन विशेषज्ञता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा निवेश पूँजी उपलब्ध कराता है। इससे भारत को अपनी घरेलू जहाज निर्माण क्षमताओं का विस्तार करने तथा वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।
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भारत–दक्षिण कोरिया सहयोग का महत्त्व
- प्रौद्योगिकी एवं डिजाइन हस्तांतरण: दक्षिण कोरियाई कंपनियाँ बड़े पैमाने पर, ग्रीन शिपयार्ड तथा उन्नत समुद्री इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता लाती हैं।
- उदाहरण: हुंडई की सहायक कंपनी द्वारा तमिलनाडु के थूथुकुडी में लगभग $4 बिलियन के ग्रीनफील्ड शिपयार्ड निवेश की योजना।
- सहायक उद्योगों का विकास: यह साझेदारी आपूर्तिकर्ता, उपकरण निर्माताओं एवं मरम्मत सुविधाओं के एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को सक्षम बनाती है।
- उदाहरण: मुंबई में KOMEA कार्यालय 304 कोरियाई कंपनियों को भारत की जहाज निर्माण आपूर्ति शृंखला से जोड़ता है।
- कार्यबल विकास एवं मानव संसाधन: प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं संयुक्त पहलें भारत के नौसैनिक आर्किटेक्चर, इंजीनियरिंग एवं जहाज संचालन कौशल को सुदृढ़ करती हैं।
- उदाहरण: अप्रैल 2026 में राष्ट्रपति ली जे म्युंग की यात्रा के दौरान समुद्री शिक्षा एवं कार्यबल विकास पर MoUs हस्ताक्षरित किए गए।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा एवं निर्यात क्षमता: यह सहयोग दक्षता, गुणवत्ता तथा सतत जहाज निर्माण प्रथाओं को बढ़ाकर भारतीय शिपयार्ड्स को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बनाता है।
विद्यमान स्थायी चुनौतियाँ
- अवसंरचनात्मक एवं परिचालनगत अंतराल: सीमित शिपयार्ड क्षमता, अनुमोदनों में विलंब तथा विखंडित औद्योगिक क्लस्टर विकास को बाधित करते हैं।
- नियामकीय एवं नीतिगत बाधाएँ: असंगत नियमावली तथा दीर्घकालिक प्रोत्साहनों की कमी निजी निवेश की गति को धीमा करती है।
- वित्तीय सीमाएँ: ग्रीनफील्ड परियोजनाओं हेतु उच्च पूँजीगत व्यय तथा कम लागत एवं दीर्घकालिक वित्त की सीमित उपलब्धता विस्तार में बाधा उत्पन्न करती है।
- प्रौद्योगिकी आत्मसात: कोरियाई तकनीक एवं विशेषज्ञता के पूर्ण एकीकरण हेतु भारतीय उद्योग को निरंतर क्षमता निर्माण एवं समर्थन की आवश्यकता है।
SFCL एवं नीतिगत पहलों की भूमिका
- वित्तीय सहायता एवं ऋण उपलब्धता: सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (SFCL) जहाज निर्माण परियोजनाओं हेतु कम लागत एवं दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराती है।
- उदाहरण: SFCL (भारत की पहली मैरीटाइम NBFC) का उपयोग ₹25,000 करोड़ के मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड (MDF) तथा ₹70,000 करोड़ के पुनर्गठित व्यापक जहाज निर्माण वित्तीय पैकेज के साथ अभिसरण में किया जा रहा है।
- निवेश जोखिम में कमी: SFCL तथा शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट फंड निजी एवं विदेशी निवेशकों के लिए प्रवेश बाधाओं को कम करते हैं, जिससे निवेश आकर्षक बनता है।
- एकीकृत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र: यह पहल कार्यबल प्रशिक्षण, आपूर्तिकर्ता स्थानीयकरण तथा अनुसंधान साझेदारियों को समर्थन देकर आत्मनिर्भर जहाज निर्माण क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देती है।
- सतत नीतिगत समर्थन: शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट योजना एवं मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड जैसी पूरक योजनाएँ निरंतर वित्तीय एवं नीतिगत प्रोत्साहन प्रदान करती हैं।
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निष्कर्ष
भारत–दक्षिण कोरिया साझेदारी भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित करने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रौद्योगिकी, निवेश एवं कौशल विकास को सुदृढ़ करती है। अवसंरचनात्मक, नियामकीय, वित्तीय एवं तकनीकी आत्मसातीकरण से जुड़ी स्थायी चुनौतियों को SFCL जैसी नीतिगत एवं वित्तीय पहलों के माध्यम से दूर किया जाए तो भारत एक प्रतिस्पर्द्धी एवं आत्मनिर्भर वैश्विक जहाज निर्माण केंद्र के रूप में उभर सकता है।