प्रश्न की मुख्य माँग
- MSME द्वारा सामना की जाने वाली संरचनात्मक बाधाओं की चर्चा कीजिए।
- निहितार्थों का उल्लेख कीजिए।
- निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने के उपाय सुझाइए।
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उत्तर
भारत की गहरी खेल संस्कृति, 50 अरब डॉलर के वैश्विक खेल सामग्री व्यापार में इसकी नगण्य 0.5% हिस्सेदारी के विपरीत है। यह MSME-नेतृत्व वाले विनिर्माण में संरचनात्मक बाधाओं को दर्शाता है, जो अंतर्निहित क्षमताओं के बावजूद पैमाने, गुणवत्ता और निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सीमित करती हैं।
संरचनात्मक बाधाएँ
- खंडित इकाइयाँ: यह क्षेत्र छोटे और असंगठित सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) द्वारा संचालित है, जिससे पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ सीमित हो जाती हैं।
- निम्न प्रौद्योगिकी स्तर: आधुनिक मशीनरी और नवाचार का सीमित उपयोग।
- उदाहरण: जालंधर जैसे पारंपरिक विनिर्माण क्लस्टर अभी भी मैनुअल प्रक्रियाओं पर निर्भर हैं।
- वित्तीय अंतराल: क्षमता उन्नयन के लिए सुलभ ऋण तक पर्याप्त पहुँच का अभाव।
- उदाहरण: औपचारिक ऋण प्रणाली में MSMEs को उच्च जमानत की आवश्यकता का सामना करना पड़ता है।
- गुणवत्ता संबंधी समस्याएँ: वैश्विक प्रमाणन और मानकीकरण की कमी।
- उदाहरण: अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में कठिनाई के कारण निर्यात सीमित रहता है।
- कमजोर संपर्क: वैश्विक मूल्य शृंखलाओं और ब्रांड्स के साथ अपर्याप्त एकीकरण।
- उदाहरण: अंतरराष्ट्रीय खेल आपूर्ति शृंखलाओं में सीमित भागीदारी।
निहितार्थ
- निर्यात में कमी: बड़े घरेलू आधार के बावजूद वैश्विक हिस्सेदारी बहुत कम है।
- उदाहरण: वैश्विक खेल सामान व्यापार में भारत का योगदान लगभग 0.5% ही है।
- मूल्य हानि: क्षेत्र निम्न-मूल्य खंडों में सीमित है और ब्रांडिंग का अभाव है।
- उदाहरण: उच्च-स्तरीय विशेष उपकरणों के बजाय सामान्य उपकरणों पर अधिक ध्यान।
- रोजगार सीमाएँ: श्रम-प्रधान होने के बावजूद यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन नहीं कर पा रहा है।
- आयात पर निर्भरता: उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों के लिए विदेशी उत्पादों पर निर्भरता।
- उदाहरण: पेशेवर स्तर के खेल उपकरण अक्सर आयात किए जाते हैं।
- चूके हुए अवसर: खेलों की बढ़ती लोकप्रियता और वैश्विक माँग का पूरा लाभ नहीं उठाया जा सका है।
प्रतिस्पर्द्धात्मकता हेतु उपाय
- क्लस्टर विकास: विशेषीकृत विनिर्माण क्लस्टरों को बढ़ावा दिया जाए।
- उदाहरण: क्लस्टर-आधारित योजनाओं के तहत जालंधर जैसे केंद्रों को सुदृढ़ करना।
- प्रौद्योगिकी उन्नयन: आधुनिक मशीनरी और अनुसंधान एवं विकास को अपनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाए।
- उदाहरण: लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए क्रेडिट लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी योजना (CLCSS)।
- गुणवत्ता मानक: वैश्विक प्रमाणन और परीक्षण सुविधाओं को सुनिश्चित किया जाए।
- उदाहरण: BIS मानक और निर्यात गुणवत्ता अनुपालन तंत्र।
- बाज़ार तक पहुँच: MSMEs को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़ा जाए।
- उदाहरण: निर्यात प्रोत्साहन परिषदों और व्यापार समझौतों के माध्यम से समर्थन।
- वित्तीय सहायता: कम लागत वाले ऋण और सब्सिडी तक पहुँच को बेहतर बनाया जाए।
- उदाहरण: लघु एवं मध्यम उद्यमों की सहायता के लिए आपातकालीन ऋण गारंटी योजना (ECLGS)।
निष्कर्ष
भारत के खेल विनिर्माण क्षेत्र को रूपांतरित करने के लिए प्रौद्योगिकी, वित्त और पैमाने से जुड़ी संरचनात्मक कमियों को दूर करना अत्यंत आवश्यक है। रणनीतिक नीतिगत समर्थन, क्लस्टर-आधारित विकास और वैश्विक एकीकरण के माध्यम से निर्यात क्षमता को बढ़ाया जा सकता है तथा भारत को वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्द्धी खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया जा सकता है।