प्रश्न की मुख्य माँग
- वर्ष 2025 में प्रमुख बाह्य चुनौतियाँ।
- वर्ष 2026 में भारतीय कूटनीति के अवसर।
- इन अवसरों से उत्पन्न चुनौतियाँ।
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उत्तर
वर्ष 2025 में भारत की विदेश नीति अप्रत्याशित वैश्विक घटनाक्रमों और बढ़ी हुई भू-राजनीतिक अनिश्चितता, विशेष रूप से ‘ट्रंप 2.0’ संक्रमण और क्षेत्रीय अस्थिरता से प्रभावित हुई। ‘लेन-देन संबंधी कूटनीति’ के इस युग ने पूर्व-निर्धारित संस्थागत मानदंडों का स्थान ले लिया, जिससे भारत को कई ‘ग्रे जोन’ संघर्षों का प्रबंधन करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
वर्ष 2025 में प्रमुख बाहरी चुनौतियाँ
- लेन-देन पर आधारित अमेरिका-भारत संबंध: राष्ट्रपति ट्रंप की वापसी से उच्च टैरिफ (50% तक) और इमिग्रेशन पर पाबंदियाँ लगीं, जिससे पिछले वर्षों में बना रणनीतिक विश्वास कम हुआ है।
- उदाहरण: भारतीय आयात पर दंडात्मक शुल्क लगाए जाने और H-1B वीजा नियमों को सख्त किए जाने के बाद अमेरिका-भारत संबंध कमजोर हुए हैं।
- पड़ोसी देशों में राजनीतिक उथल-पुथल: बांग्लादेश और नेपाल में संवेदनशील राजनीतिक बदलावों ने भारत-विरोधी भावना और भीड़ हिंसा को बढ़ावा दिया, जिससे ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति खतरे में पड़ गई।
- उदाहरण: नेपाल में ‘जेनरेशन-Z’ के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न की, जबकि बांग्लादेश में अशांति के कारण भारतीय दूतावासों को निशाना बनाने के प्रयास किए गए।
- पाकिस्तान के साथ तनाव में वृद्धि: ‘पहलगाम आतंकी हमले’ ने चार दिनों तक चले भारत-पाकिस्तान संघर्ष (ऑपरेशन सिंदूर) को जन्म दिया, जिससे तीसरे पक्ष की मध्यस्थता संबंधी बयानबाजी की गई, जिसका भारत लंबे समय से विरोध करता रहा है।
- रूस-यूक्रेन के बीच तनाव का परिणाम: रूस के साथ ऊर्जा संबंधों स्थापित होने से भारतीय संस्थाओं पर द्वितीयक प्रतिबंध लगाए गए, जिससे भारत के रणनीतिक संतुलन की सीमाएँ परखी गईं।
- उदाहरण: वर्ष 2025 में नायरा एनर्जी पर यूरोपीय संघ और ब्रिटेन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा संबंधी महत्त्वपूर्ण चुनौतियों को जन्म दिया।
- चीन की दोहरी चुनौती: रणनीतिक तनाव कम करने के प्रयासों के बावजूद, पाकिस्तान को चीन का सैन्य समर्थन और महत्त्वपूर्ण खनिजों पर व्यापार प्रतिबंध विश्वास को सीमित करते रहे हैं।
वर्ष 2026 में भारतीय कूटनीति के लिए अवसर
- ‘ईयर ऑफ यूरोप’ का फोकस: अमेरिका के साथ तनावपूर्ण संबंधों ने भारत को लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) को अंतिम रूप देने का अवसर प्रदान किया है।
- भारत और EFTA ने व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) पर हस्ताक्षर किए।
- उभरती प्रौद्योगिकी में नेतृत्व: ग्लोबल AI समिट 2026 की मेजबानी से भारत को डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) और AI गवर्नेंस के लिए नैतिक मानदंड निर्धारित करने का अवसर मिलता है।
- उदाहरण: इंडिया AI मिशन की सफलता ने संप्रभु प्रौद्योगिकी में ग्लोबल साउथ के नेतृत्व के लिए एक रोडमैप प्रस्तुत किया है।
- चीन के साथ संतुलित संबंध: वीजा नियमों में ढील और तीर्थयात्राओं की पुनः शुरुआत सीमा सुरक्षा से समझौता किए बिना व्यापार को सामान्य बनाने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करती है।
- उदाहरण: वर्ष 2025 में कैलाश-मानसरोवर यात्रा की पुनः शुरुआत वर्ष 2026 के लिए संभावित ‘स्थिरीकरण चरण’ का संकेत देती है।
- यूरेशियाई कनेक्टिविटी को बढ़ावा: INSTC के संचालन से मध्य एशिया और रूस के साथ व्यापार के लिए एक गैर-पश्चिमी विकल्प उपलब्ध होता है।
- उदाहरण: मध्य पूर्व में अस्थिरता के दौरान पारंपरिक समुद्री बाधाओं को दूर करने के लिए INSTC को प्राथमिकता दी जा रही है।
- पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक संबंध सुधार: श्रीलंका, मालदीव और भूटान को बुनियादी ढाँचागत सहायता प्रदान करने से क्षेत्रीय विश्वास पुनः प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
- उदाहरण: वर्ष 2025 के अंत में उच्च स्तरीय यात्राओं और सहायता प्रतिबद्धताओं से मालद्वीव और श्रीलंका के साथ संबंध स्थिर होने लगे हैं।
इन अवसरों से उत्पन्न चुनौतियाँ
- गुटीय राजनीति का दबाव: ‘ईयर ऑफ यूरोप’ या ‘चीन के साथ संबंधों में सुधार’ जैसी नीतियों को अपनाने से ट्रंप प्रशासन की ओर से प्रतिक्रियात्मक लेन-देन संबंधी दबाव या द्वितीयक प्रतिबंध लग सकते हैं।
- पड़ोसी देशों में प्रतिक्रिया का जोखिम: बांग्लादेश जैसे अस्थिर पड़ोसी देशों में आर्थिक सहयोग को स्थानीय कार्यकर्ता अलोकप्रिय सरकारों को “समर्थन” देने के रूप में देख सकते हैं।
- वैश्विक दक्षिण की अपेक्षाएँ: AI या जलवायु परिवर्तन के एजेंडे का नेतृत्व करने के लिए बड़े पैमाने पर घरेलू संसाधनों को जुटाना आवश्यक है, जिससे भारत की वित्तीय क्षमता पर दबाव पड़ सकता है।
- रणनीतिक विश्वास की कमी: चीन के साथ संबंधों को संतुलित करना जोखिम भरा बना हुआ है; किसी भी सामरिक तनाव कम करने के कदम का लाभ बीजिंग, दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए उठा सकता है।
निष्कर्ष
वर्ष 2026 में भारतीय कूटनीति का आगे का रास्ता ‘सुधार, पुनर्निर्माण और संतुलन’ में निहित है। अपने पड़ोसी देशों में होने वाले राजनीतिक बदलाव से अपनी आंतरिक सुरक्षा को सुरक्षित रखते हुए और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौतों को तेजी से आगे बढ़ाते हुए, भारत वर्तमान चुनौतियों को एक स्थिर विकास पथ में परिवर्तित कर सकता है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए यह सुनिश्चित किया जाए कि “विश्व एक परिवार है” केवल एक नारा न रहकर समावेश का एक साधन बना रहे।
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