प्रश्न की मुख्य माँग
- बताइए कि कैसे भारत की विदेश नीति सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखने को दर्शाती है (भारत-इजरायल संबंधों के संदर्भ में)।
- चुनौतियों और सीमाओँ को रेखांकित कीजिए।
|
उत्तर
भारत की पश्चिम एशिया नीति ऐतिहासिक रूप से व्यावहारिकता और सिद्धांतों के संतुलित समन्वय पर आधारित रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इजरायल यात्रा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भारत एक ओर रणनीतिक संबंधों को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरी ओर फिलिस्तीनी आकांक्षाओं और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति अपने दीर्घकालिक समर्थन को भी बनाए रखना चाहता है।
भारत की विदेश नीति में सावधानीपूर्ण संतुलन का प्रतिबिंब (भारत–इजरायल संबंधों के संदर्भ में)
- इजरायल के साथ रणनीतिक संबंधों का उन्नयन: भारत ने संबंधों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक उन्नत किया है, जिसके अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि, संस्कृति और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार हुआ है।
- उदाहरण: वर्ष 2026 की यात्रा के दौरान 15 से अधिक समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए।
- रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग: महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों और रक्षा प्रणालियों के क्षेत्र में इजरायल भारत का एक प्रमुख भागीदार बना हुआ है।
- दो-राष्ट्र समाधान के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता: इजरायल के साथ घनिष्ठ संबंधों के बावजूद भारत ने फिलिस्तीनी संप्रभुता के समर्थन को पुनः दोहराया है।
- बहुपक्षीय क्षेत्रीय सहभागिता: भारत विशिष्ट गुटों के स्थान पर समावेशी क्षेत्रीय समूहों को प्रोत्साहित करता है।
- उदाहरण: यात्रा के दौरान I2U2 समूह और भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे पर बल दिया गया।
- अरब विश्व के साथ संबंधों का संरक्षण: भारत खाड़ी देशों पर ऊर्जा, प्रवासी भारतीय समुदाय और व्यापार संबंधी निर्भरता को ध्यान में रखते हुए संतुलन बनाए रखता है।
चुनौतियाँ और सीमाएँ
- पक्षपात की धारणा: इजरायल की ओर प्रबल राजनीतिक संकेत भारत की पारंपरिक तटस्थता के क्षीण होने के रूप में देखे जा सकते हैं।
- अरब भागीदारों के साथ संभावित तनाव: खाड़ी देश अपेक्षा करते हैं कि भारत फिलिस्तीन के प्रति अपने ऐतिहासिक समर्थन को बनाए रखे।
- घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएँ: पश्चिम एशिया संबंधी नीति भारत के विविध सामाजिक ताने-बाने में प्रतिध्वनित होती है, जिसके कारण संतुलित और सावधानीपूर्ण कूटनीति आवश्यक हो जाती है।
- भू-राजनीतिक अस्थिरता: यात्रा के दौरान ईरान पर संभावित अमेरिकी हमलों की आशंका ने क्षेत्रीय संघर्ष में उलझने के जोखिम को बढ़ा दिया है।
- क्षेत्रीय परियोजनाओं का संस्थानीकरण: भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे जैसी पहलों की सफलता क्षेत्रीय शांति पर निर्भर करती है, जबकि ध्रुवीकरण की स्थिति प्रगति को बाधित कर सकती है।
निष्कर्ष
भारत को इजरायल के साथ रणनीतिक सहयोग को सुदृढ़ बनाए रखते हुए वार्ता-आधारित दो-राष्ट्र समाधान के प्रति अपने सिद्धांतगत समर्थन की पुनर्पुष्टि करनी चाहिए। अपनी संतुलित नीति का स्पष्ट और पारदर्शी प्रतिपादन, फिलिस्तीन तथा खाड़ी देशों के साथ निरंतर संवाद तथा आर्थिक गलियारों को क्षेत्रीय संघर्षों से सुरक्षित रखना- ये सभी कदम भारत की विश्वसनीयता और दीर्घकालिक क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।
To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.
Latest Comments