Q. औपनिवेशिक संस्थागत विरासत और केंद्रीकृत सत्ता तथा स्थानीय सामाजिक-पारिस्थितिकीय वास्तविकताओं के बीच असंतुलन के कारण भारत का वन प्रशासन संकट का सामना कर रहा है। मात्र आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि वन प्रशासन का व्यापक पुनर्गठन आवश्यक है। चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • आधुनिकीकरण क्यों अपर्याप्त है।
  • व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता।

उत्तर

भारत का वन प्रशासन आज भी वर्ष 1927 के भारतीय वन अधिनियम से बँधा हुआ है, जो औपनिवेशिक काल की एक विरासत है और संरक्षण के बजाय व्यावसायिक काष्ठ के दोहन के लिए बनाया गया था। यह केंद्रीकृत सत्ता स्थानीय सामाजिक-पारिस्थितिकी वास्तविकताओं के साथ असंगति उत्पन्न करती है, जिसके परिणामस्वरूप भूमि अधिकारों को लेकर लगातार संघर्ष, जैव विविधता की हानि और आदिवासी समुदायों के हाशिए पर पहुँच जाने जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

आधुनिकीकरण क्यों अपर्याप्त है?

  • तकनीकी रूप से संकीर्ण सोच: भूमि स्वामित्व संबंधी अंतर्निहित मुद्दों को हल किए बिना निगरानी के लिए ड्रोन और उपग्रहों का उपयोग करना, वनवासियों पर औपनिवेशिक शैली में की जाने वाली निगरानी को केवल ‘स्वचालित’ कर देता है।
    • उदाहरण: कई राज्यों में वन मित्र ऐप की आलोचना की गई है क्योंकि यह स्थानीय वन समितियों को सशक्त बनाने के बजाय बहिष्कार को डिजिटल रूप दे रहा है।
  • समान वन संवर्द्धन पूर्वाग्रह: एकल वृक्षारोपण (जैसे- यूकेलिप्टस) के माध्यम से आधुनिकीकरण देशी वनों की जटिल कार्यात्मक जैव विविधता को पुनर्स्थापित करने के बजाय ‘हरित आवरण’ के आँकड़ों पर केंद्रित होता है।
    • उदाहरण: क्षतिपूर्ति वनीकरण कोष (CAMPA) अक्सर सामुदायिक भूमि पर वृक्षारोपण को वित्तपोषित करता है, जिससे पारंपरिक चरागाह क्षेत्र विस्थापित हो जाते हैं।
  • केंद्रीकृत कार्बन क्रेडिटवाद: वनों को वैश्विक व्यापार के लिए केवल ‘कार्बन सिंक’ के रूप में मानना, लाखों वन-आश्रित लोगों के लिए ‘जीवंत परिदृश्य’ के रूप में उनकी भूमिका की अनदेखी करता है।
    • उदाहरण: विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यदि स्थानीय अधिकारों को कानूनी रूप से सुरक्षित नहीं किया गया तो पेरिस समझौते के अनुच्छेद-6 के तहत ‘पर्यावरण संरक्षण का हनन’ हो सकता है।
  • नौकरशाही वर्चस्व की निरंतरता: डिजिटल उपकरणों के माध्यम से संभागीय वन अधिकारी (DFO) की शक्ति बढ़ाना, अंग्रेजों से विरासत में मिली ‘आदेश और नियंत्रण’ की मानसिकता को नहीं बदलता है।
    • उदाहरण: वन संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2023 और वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के बीच विसंगतियाँ इस निरंतर विधायी संघर्ष को उजागर करती हैं।
  • अपर्याप्त सामुदायिक परामर्श: आधुनिक “संयुक्त वन प्रबंधन” (JFM) अक्सर सामुदायिक भागीदारी के बजाय शीर्ष स्तर से निर्देशित प्रक्रिया के रूप में ही कार्य कर रहा है। जहाँ वन विभाग, ग्राम सभाओं पर वीटो शक्ति बरकरार रखता है।

व्यापक सुधार की आवश्यकता

  • सामुदायिक अधिकारों को प्राथमिकता देना: वन संसाधन अधिनियम, 2006 के तहत सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकारों को सख्ती से लागू करके शासन प्रणाली को ‘राज्य-प्रबंधित’ से ‘सामुदायिक नेतृत्व’ की ओर ले जाना।
    • उदाहरण: ओडिशा ने 4,000 से अधिक CFR शीर्षक को मान्यता देकर और जनजातियों को लघु वन उत्पादों के प्रबंधन और बिक्री के लिए सशक्त बनाकर एक अग्रणी भूमिका निभाई है।
  • पारिस्थितिकी क्षतिपूर्ति सुधार: शुद्ध वर्तमान मूल्य (NPV) तंत्र को नया रूप देना, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वन भूमि के दोहन के लिए क्षतिपूर्ति सीधे प्रभावित स्थानीय समुदायों तक पहुँचे।
  • भू-भाग स्तर प्रबंधन: कठोर प्रशासनिक सीमाओं से हटकर ऐसे “पारिस्थितिकी गलियारों” की ओर बढ़ना, जो वन्यजीवों और पशुपालकों की प्रवासी आवश्यकताओं को पूरा करते हों।
    • उदाहरण: प्रोजेक्ट टाइगर 2.0 का ढाँचा अब कठोर “विशिष्ट” कोर-बफर मॉडल के बजाय “सह-अस्तित्व” क्षेत्रों पर जोर देता है।
  • अंतर-विभागीय समन्वय: वन भूमि पर “दोहरे अधिकार” के गतिरोध को हल करने के लिए जनजातीय मामलों के मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय को एक साथ लाना।
  • कानूनी बहुलवाद की मान्यता: पवित्र वनों और स्वदेशी संरक्षण प्रथाओं की रक्षा के लिए वन प्रबंधन कानूनों में पारंपरिक पारिस्थितिकी ज्ञान (TEK) को एकीकृत करना।

निष्कर्ष

व्यापक परिवर्तन के तहत “बहिष्कार के माध्यम से संरक्षण” की जगह “साझेदारी के माध्यम से शासन” को अपनाना होगा। ग्राम सभा को वन संपदा का प्राथमिक संरक्षक बनाकर, भारत औपनिवेशिक काल के संघर्षों का समाधान कर सकता है और जैव विविधता तथा मानवीय गरिमा दोनों का सम्मान करने वाला एक स्थायी सामाजिक-पारिस्थितिकी भविष्य का निर्माण कर सकता है।

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