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Q. वर्ष 2047 तक विकसित भारत की ओर भारत की यात्रा न केवल जीडीपी वृद्धि को बनाए रखने पर निर्भर है, बल्कि इसके विनिर्माण क्षेत्र में संरचनात्मक शिथिलता को दूर करने पर भी निर्भर है। जोंबी फर्मों (Zombie Firms) की समस्या और संसाधनों के रुके हुए पुनर्आवंटन के विशेष संदर्भ में विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

May 16, 2026

GS Paper IIIIndian Economy

प्रश्न की मुख्य माँग

  • विकसित भारत 2047 की प्राप्ति में विनिर्माण क्षेत्र सुधारों के महत्त्व को रेखांकित कीजिए।
  • जॉम्बी फर्मों तथा संसाधनों के अवरुद्ध पुनर्आवंटन के प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनने की भारत की आकांक्षा केवल उच्च जीडीपी वृद्धि पर नहीं, बल्कि उत्पादकता-आधारित औद्योगिक विस्तार पर भी निर्भर करती है। इसके लिए एक सशक्त और गतिशील विनिर्माण क्षेत्र अत्यंत आवश्यक है, किंतु जॉम्बी फर्मों तथा संसाधनों के अवरुद्ध पुनर्विनियोजन जैसी समस्याएँ इसकी क्षमता को लगातार कमजोर कर रही हैं।

विकसित भारत 2047 की प्राप्ति में विनिर्माण क्षेत्र सुधारों का महत्त्व

  • रोजगार सृजन: विनिर्माण क्षेत्र बड़े पैमाने पर रोजगार उत्पन्न करता है, विशेषकर कृषि से अन्य क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे अर्द्ध-कुशल युवाओं के लिए।
    • उदाहरण: वस्त्र और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्र मेक इन इंडिया तथा उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के केंद्र में हैं।
  • उत्पादकता में वृद्धि: आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, औद्योगिक विस्तार कम उत्पादकता वाली कृषि और असंगठित सेवा क्षेत्रों की तुलना में श्रम उत्पादकता को बढ़ाता है।
  • निर्यात क्षमता का सुदृढ़ीकरण: मजबूत विनिर्माण आधार निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाता है तथा व्यापार असंतुलन को कम करने में सहायक होता है।
  • आपूर्ति सुरक्षा: घरेलू विनिर्माण अर्द्धचालक और रक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में आयात पर निर्भरता को घटाता है।
    • उदाहरण: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन उन्नत विनिर्माण में रणनीतिक आत्मनिर्भरता स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
  • समावेशी विकास: विनिर्माण क्षेत्र औद्योगिक समूहों तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के विस्तार के माध्यम से क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देता है।
    • उदाहरण: दिल्ली–मुंबई औद्योगिक गलियारा जैसे औद्योगिक गलियारे क्षेत्रीय विकास को प्रोत्साहित कर रहे हैं।

जॉम्बी फर्मों तथा संसाधनों के अवरुद्ध पुनर्विनियोजन का प्रभाव

  • पूँजी का अवरोधन: कम उत्पादकता के बावजूद जीवित बनी रहने वाली जॉम्बी फर्में पूँजी को अवरुद्ध कर देती हैं, जिसे अधिक दक्ष उद्यमों की ओर स्थानांतरित किया जा सकता था।
  • ऋण का गलत आवंटन: वित्तीय संसाधन अव्यवहारिक कंपनियों में फँसे रहते हैं, जिससे नवाचार-आधारित क्षेत्रों में निवेश की क्षमता घटती है।
    • उदाहरण: ट्विन बैलेंस शीट समस्या ने दबावग्रस्त कॉरपोरेट ऋण और कमजोर बैंक ऋण चक्र को उजागर किया था।
  • कम उत्पादकता: अनुत्पादक फर्में समग्र औद्योगिक दक्षता को कम करती हैं तथा तकनीकी उन्नयन की गति धीमी कर देती हैं।
  • कमजोर प्रतिस्पर्द्धा: जॉम्बी फर्में प्रदर्शन के बजाय नीतिगत समर्थन के आधार पर टिके रहकर बाजार प्रतिस्पर्द्धा को विकृत करती हैं।

आगे की राह

  • निकास व्यवस्था: अव्यावहारिक कंपनियों के त्वरित बंद होने अथवा पुनर्गठन को सुनिश्चित करने हेतु दिवालियापन समाधान प्रणाली को और सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की समय-सीमा में सुधार परिसंपत्तियों के तेज पुनर्चक्रण को प्रोत्साहित कर सकता है।
  • बेहतर ऋण प्रवाह: संस्थागत वित्त को उत्पादक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों, उभरते क्षेत्रों तथा नवाचार-आधारित उद्योगों की ओर पुनर्निर्देशित किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: औद्योगिक नीति के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक्स, विद्युत वाहन और हरित विनिर्माण क्षेत्रों को प्राथमिक समर्थन दिया जा रहा है।
  • श्रम सुधार: श्रमिक सुरक्षा के साथ लचीले श्रम बाजार औद्योगिक दक्षता और प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ा सकते हैं।
    • उदाहरण: श्रम संहिताएँ अनुपालन को सरल बनाने और औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देने का प्रयास करती हैं।
  • प्रौद्योगिकी प्रोत्साहन: स्वचालन, अनुसंधान एवं विकास तथा औद्योगिक उन्नयन को प्रोत्साहित कर प्रतिस्पर्द्धात्मकता और उत्पादकता बढ़ाई जानी चाहिए।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय विनिर्माण नीति नवाचार-आधारित औद्योगिक विस्तार को समर्थन प्रदान करती है।
  • प्रतिस्पर्द्धी बाजार: संरक्षणवाद को कम कर और व्यवसाय सुगमता में सुधार कर दक्ष कंपनियों को तेजी से विकसित होने का अवसर दिया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: GST और लॉजिस्टिक सुधार बाजार एकीकरण तथा औद्योगिक दक्षता को सुदृढ़ करते हैं।

निष्कर्ष

सतत् विकास लक्ष्य 8 (सम्मानजनक कार्य और आर्थिक विकास) तथा सतत् विकास लक्ष्य 9 (उद्योग, नवाचार और अवसंरचना) के अनुरूप, विकसित भारत 2047 की दिशा में भारत की प्रगति के लिए ऐसा विनिर्माण क्षेत्र आवश्यक है, जो दक्षता, नवाचार और प्रतिस्पर्द्धात्मकता को प्रोत्साहित करे। आज औद्योगिक गतिशीलता को पुनर्जीवित करना ही यह निर्धारित करेगा कि भविष्य का विकास वास्तव में परिवर्तनकारी बन पाएगा या नहीं।

India’s journey towards Viksit Bharat by 2047 hinges not just on maintaining GDP growth, but on addressing the structural lethargy within its manufacturing sector. Analyze with special reference to the problem of Zombie Firms and stalled reallocation of resources. in hindi

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