Q. भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किस सीमा तक सामाजिक-सांस्कृतिक एकीकरण के बजाय सुरक्षा संबंधी चर्चा तक ही सीमित रहा है? विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • सामाजिक-सांस्कृतिक एकीकरण के बजाय सुरक्षा संबंधी चर्चा तक सीमित मुख्यधारा में सम्मिलन की चर्चा कीजिए। 
  • सुरक्षा-प्रधान मुख्यधारा में सम्मिलन के कारणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर

वर्ष 2001 में पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय की स्थापना के बाद से भारत ने पूर्वोत्तर क्षेत्र को राष्ट्रीय मुख्यधारा में एकीकृत करने का प्रयास किया है। यद्यपि, बढ़े हुए वित्तीय आवंटनों और संपर्क परियोजनाओं के बावजूद, यह एकीकरण प्रायः गहन सामाजिक-सांस्कृतिक समावेशन के स्थान पर सुरक्षा तथा प्रशासनिक दृष्टिकोणों के माध्यम से परिभाषित होता हुआ प्रतीत होता है।

मुख्य भाग

सामाजिक-सांस्कृतिक एकीकरण के बजाय सुरक्षा संबंधी चर्चा तक सीमित मुख्यधारा में सम्मिलन

  • कानून-व्यवस्था केंद्रित दृष्टिकोण: एकीकरण के प्रयासों में भावनात्मक जुड़ाव की अपेक्षा प्रायः पुलिसिंग और प्रशासनिक नियंत्रण को प्राथमिकता दी जाती है।
  • संस्थागत पहल पर अधिक बल, सामाजिक सहभागिता का अभाव: पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय की स्थापना ने प्रशासनिक उपेक्षा को कुछ सीमा तक संबोधित किया, किंतु सामाजिक दृष्टिकोणों में अपेक्षित परिवर्तन नहीं ला सकी।
    • उदाहरण: वर्ष 2001 में मंत्रालय की स्थापना के बावजूद दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के युवाओं के विरुद्ध नस्लीय दुर्व्यवहार की घटनाएँ सामने आती रहती हैं।
  • बजटीय विस्तार, किंतु पहचान की सीमित मान्यता: वित्तीय आवंटन में वृद्धि ने अवसंरचना और विकास पर बल दिया है, परंतु क्षेत्रीय पहचान की स्वीकृति अभी भी सीमित है।
    • उदाहरण: बजट आवंटन वर्ष 2014–15 में ₹2,332 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2023–24 में ₹5,892 करोड़ (लगभग 152% वृद्धि) हो गया, फिर भी “भावनात्मक एकीकरण” की माँग बनी हुई है।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों का रणनीतिक दृष्टिकोण से आकलन: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पूर्वोत्तर जैसे क्षेत्रों को प्रायः “सीमावर्ती क्षेत्र” के रूप में रणनीतिक महत्त्व के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है।
    • उदाहरण: पूर्वोत्तर को अन्य संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ वर्गीकृत किया जाना सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
  • शैक्षिक कथानकों में सीमित प्रतिनिधित्व: राष्ट्रीय पाठ्यक्रमों में पूर्वोत्तर के इतिहास और नायकों का पर्याप्त उल्लेख नहीं है, जिससे सांस्कृतिक एकीकरण कमजोर होता है।

सुरक्षा-प्रधान मुख्यधारा में सम्मिलन के कारण

  • ऐतिहासिक उग्रवाद संबंधी चिंताएँ: दीर्घकालीन उग्रवादी आंदोलनों ने राज्य की प्रतिक्रिया को स्थिरता और नियंत्रण पर केंद्रित बना दिया।
    • उदाहरण: केंद्रीय हस्तक्षेप और विशेष मंत्रालयों की स्थापना प्रारंभ में अशांति और उपेक्षा को संबोधित करने के उद्देश्य से की गई थी।
  • भू-रणनीतिक संवेदनशीलता: चीन, म्याँमार और बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के कारण सुरक्षा प्राथमिकता अधिक हो जाती है।
    • उदाहरण: नीतिगत विमर्श में पूर्वोत्तर को प्रायः व्यापक “सीमा प्रबंधन” ढाँचे के अंतर्गत देखा जाता है।
  • प्रशासनिक, न कि सामाजिक समाधान: सरकारी पहलें मुख्यतः योजनाओं के माध्यम से संचालित होती हैं, जबकि सामाजिक आदान-प्रदान के तंत्र अपेक्षाकृत कम विकसित हैं।
  • नौकरशाही का सीमित जमीनी अनुभव: अधिकारियों को प्रायः सीमावर्ती क्षेत्रों की सामाजिक वास्तविकताओं का प्रत्यक्ष अनुभव कम होता है।
    • उदाहरण: भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में दो वर्ष की अनिवार्य सेवा का सुझाव वर्तमान दूरी को इंगित करता है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की कमी: पूर्वोत्तर के प्रमुख व्यक्तित्व और प्रतीक राष्ट्रीय चेतना में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व पाते हैं।

निष्कर्ष

यद्यपि अवसंरचना विकास और सुरक्षा स्थिरीकरण आवश्यक हैं, किंतु वास्तविक मुख्यधारा में सम्मिलन के लिए भावनात्मक एकीकरण अनिवार्य है। पाठ्यक्रम सुधार, संस्थागत सांस्कृतिक आदान-प्रदान, नौकरशाही का क्षेत्रीय अनुभव तथा पूर्वोत्तर के प्रमुख व्यक्तित्वों का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान- ये सभी कदम, विमर्श को सीमा सुरक्षा से आगे बढ़ाकर साझा पहचान की दिशा में ले जा सकते हैं, जिससे तथाकथित “परिधीय क्षेत्रों” को भारत की सभ्यतागत कथा के अभिन्न योगदानकर्ताओं के रूप में स्थापित किया जा सके।

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