प्रश्न की मुख्य माँग
- यह स्पष्ट कीजिए कि यह सहभागिता भू-राजनीतिक आवश्यकता क्यों है।
- इस सहभागिता से जुड़े नैतिक सरोकारों का विश्लेषण कीजिए।
- संतुलित एवं विवेकपूर्ण दृष्टिकोण के लिए उपायों का सुझाव देते हुए आगे की राह लिखिए।
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उत्तर
परिचय
भारत की म्याँमार नीति एक ओर जहाँ रणनीतिक यथार्थवाद पर आधारित है, वहीं दूसरी ओर यह लोकतांत्रिक मूल्यों एवं मानवाधिकारों के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के साथ जुड़ी हुई है। इस संबंध के प्रभावी प्रबंधन हेतु सुरक्षा एवं कनेक्टिविटी से जुड़े भू-राजनीतिक हितों तथा नैतिक सरोकारों के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
भू-राजनीतिक आवश्यकता के रूप में सहभागिता
- एक्ट ईस्ट पॉलिसी का सेतु: म्याँमार, भारत का दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एकमात्र स्थलीय मार्ग है, जिससे यह एक्ट ईस्ट पॉलिसी के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनता है।
- उदाहरण: भारत–म्याँमार–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी परियोजनाएँ म्याँमार के सहयोग पर निर्भर हैं।
- सीमा सुरक्षा: उग्रवाद एवं सीमा पार सुरक्षा चुनौतियों के समाधान हेतु सहभागिता आवश्यक है।
- उदाहरण: भारत एवं म्याँमार ने 1,643 किमी. लंबी सीमा पर सक्रिय उग्रवादी समूहों के विरुद्ध सहयोग किया है।
- चीनी कारक: सतत् कूटनीतिक सहभागिता म्याँमार को चीन के एकमात्र रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र में जाने से रोकने में सहायक है।
- कनेक्टिविटी एवं अवसंरचना परियोजनाएँ: क्षेत्रीय एकीकरण के लिए स्थिर संबंध आवश्यक हैं।
- उदाहरण: कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना कोलकाता को मिजोरम से म्याँमार के माध्यम से जोड़ती है।
- सभ्यतागत संबंध: साझा सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक हितों से आगे बढ़ाकर सुदृढ़ बनाती है।
- उदाहरण: मिन आंग ह्लाइंग की बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर यात्रा बौद्ध सभ्यतागत संबंधों को रेखांकित करती है।
नैतिक सरोकारों का कारण
- लोकतांत्रिक विरोधाभास: सैन्य शासन (जुंटा) के साथ सहभागिता भारत की लोकतांत्रिक पहचान के अनुरूप नहीं प्रतीत होती।
- उदाहरण: भारत ने ऐतिहासिक रूप से म्याँमार में लोकतांत्रिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं का समर्थन किया है।
- वैधता का जोखिम: उच्च-स्तरीय कूटनीतिक संपर्कों को सैन्य शासन को अप्रत्यक्ष वैधता प्रदान करने के रूप में देखा जा सकता है।
- मानवाधिकार चिंताएँ: म्याँमार का सैन्य शासन व्यापक मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों का सामना कर रहा है।
- उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने म्याँमार की मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
- शरणार्थी मुद्दा: संघर्ष के कारण म्याँमार से शरणार्थियों का आगमन हुआ है, जिससे विशेषकर मिजोरम जैसे राज्यों पर प्रशासनिक एवं मानवीय दबाव बढ़ा है।
- मानकगत विश्वसनीयता: व्यावहारिक सहभागिता भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षक के रूप में वैश्विक छवि को कमजोर कर सकती है।
- उदाहरण: यह भारत के रणनीतिक हितों और संविधान में निहित स्वतंत्रता एवं न्याय के मूल्यों के बीच तनाव उत्पन्न करता है।
आगे की राह
- द्वि-आयामी सहभागिता: सैन्य शासन (जुंटा) के साथ व्यावहारिक हितों के आधार पर संवाद जारी रखते हुए लोकतंत्र समर्थक हितधारकों से भी संपर्क बनाए रखना।
- लोकतांत्रिक पुनर्समझौता: समावेशी राजनीतिक समाधान एवं राष्ट्रीय पुनर्समझौते पर निरंतर बल देना।
- उदाहरण: आसियान की पाँच-सूत्रीय सहमति का समर्थन, जो सभी पक्षों के बीच संवाद की वकालत करती है।
- परियोजना निरंतरता: पूर्वोत्तर भारत एवं एक्ट ईस्ट पॉलिसी के लिए महत्त्वपूर्ण कनेक्टिविटी परियोजनाओं की सुरक्षा एवं समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।
- उदाहरण: कलादान मल्टी-मॉडल परियोजना एवं त्रिपक्षीय राजमार्ग को तीव्र गति से आगे बढ़ाना।
- मानवीय सहायता: मानवीय सहायता को राजनीतिक मान्यता से अलग रखते हुए आवश्यकता-आधारित सहायता तंत्र विकसित करना।
- क्षेत्रीय समन्वय: म्याँमार में सकारात्मक परिणामों के लिए आसियान (ASEAN) सहित क्षेत्रीय मंचों के साथ सहयोग को मजबूत करना।
- उदाहरण: क्षेत्रीय मंचों में भारत की भूमिका का उपयोग कर शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक संक्रमण को प्रोत्साहित करना।
निष्कर्ष
भारत की म्याँमार नीति को सिद्धांत-आधारित व्यावहारिकता का प्रतिबिंब होना चाहिए, जिसमें रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता न किया जाए। एक संतुलित एवं विवेकपूर्ण दृष्टिकोण, जो सहभागिता, मानवीय संवेदनशीलता तथा समावेशी संवाद को समाहित करता है, न केवल भारत के राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करता है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता को भी सुदृढ़ बनाता है।