प्रश्न की मुख्य माँग
- ऐसे प्रस्तावों के पीछे जनसांख्यिकीय तर्क
- सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ।
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उत्तर
परिचय
भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) घटकर 1.9 हो गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) 2.1 से कम है। इस जनसांख्यिकीय परिवर्तन ने जनसंख्या संरचना एवं दीर्घकालिक विकास संबंधी चुनौतियों के संदर्भ में बड़े परिवारों को प्रोत्साहित करने संबंधी बहस को पुनः जीवित कर दिया है।
ऐसे प्रस्तावों के पीछे जनसांख्यिकीय तर्क
- वृद्ध होती जनसंख्या: घटती प्रजनन दर से वृद्ध आश्रितों (Elderly Dependents) का अनुपात बढ़ता है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं एवं सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर दबाव भी बढ़ता है।
- उदाहरण: केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में TFR लगभग 1.3 दर्ज किया गया है।
- कार्यबल की सुरक्षा: जन्म दर में निरंतर गिरावट भविष्य में कार्यशील आयु वर्ग (Working-Age Population) को कम कर सकती है, जिससे आर्थिक उत्पादकता एवं विकास प्रभावित हो सकता है।
- आश्रितता संतुलन: प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर आश्रित एवं उत्पादक जनसंख्या के मध्य संतुलित अनुपात बनाए रखने में सहायक होती है।
- क्षेत्रीय चिंताएँ: अत्यंत निम्न प्रजनन दर वाले राज्यों को दीर्घकालिक जनसंख्या ह्रास एवं जनसंख्या संकुचन की आशंका है।
- उदाहरण: आंध्र प्रदेश ने तीसरे एवं चौथे बच्चे के लिए क्रमशः ₹30,000 और ₹40,000 की प्रोत्साहन राशि की घोषणा की है।
- प्रतिनिधित्व संबंधी मुद्दे: जनसंख्या प्रवृत्तियाँ परिसीमन (Delimitation) से जुड़ी भविष्य की राजनीतिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं।
- उदाहरण: कई दक्षिणी राज्यों ने संसद में अपने प्रतिनिधित्व में संभावित कमी को लेकर चिंता व्यक्त की है।
सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ
- राजकोषीय बोझ: बड़े परिवारों को प्रोत्साहित करने हेतु दी जाने वाली नकद प्रोत्साहन राशि सार्वजनिक वित्त पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
- लैंगिक चिंताएँ: जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहित करने वाली नीतियाँ महिलाओं की प्रजनन भूमिका से जुड़ी पारंपरिक अपेक्षाओं को और मजबूत कर सकती हैं।
- सीमित प्रभाव: केवल वित्तीय प्रोत्साहन प्रजनन संबंधी निर्णयों को सीमित रूप से ही प्रभावित कर पाते हैं, क्योंकि ये व्यापक सामाजिक-आर्थिक कारकों से भी निर्धारित होते हैं।
- उदाहरण: दक्षिण कोरिया जैसे देशों में व्यापक प्रोत्साहनों के बावजूद प्रजनन दर निम्न बनी हुई है।
- मानव पूँजी से जुड़े समझौते: बड़े परिवारों के कारण प्रत्येक बच्चे के स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर होने वाला घरेलू व्यय कम हो सकता है।
- समानता संबंधी मुद्दे: समान प्रोत्साहन बाल-देखभाल सुविधाओं की कमी तथा रोजगार एवं पारिवारिक दायित्वों के बीच संतुलन जैसी संरचनात्मक बाधाओं का प्रभावी समाधान करने में असफल हो सकते हैं।
- उदाहरण: विशेषज्ञ केवल नकद हस्तांतरण पर निर्भर रहने के बजाय बाल-देखभाल सहायता एवं परिवार-अनुकूल नीतियों के विस्तार की वकालत करते हैं।
निष्कर्ष
भारत को ऐसी संतुलित जनसांख्यिकीय रणनीति अपनानी चाहिए, जो परिवारों को सहयोग प्रदान करने के साथ-साथ महिला सशक्तीकरण, वृद्धजन कल्याण एवं मानव पूँजी विकास को भी प्राथमिकता दे। इससे जनसांख्यिकीय उद्देश्यों को समावेशी एवं सतत् विकास के व्यापक लक्ष्यों के साथ प्रभावी रूप से समन्वित किया जा सकेगा।