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Q. विश्लेषण कीजिए कि खाद्य की कमी वाले देश से खाद्य अधिशेष वाले देश में भारत के परिवर्तन ने खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण को कैसे प्रभावित किया है। सभी नागरिकों के लिए पौष्टिक आहार तक समान पहुँच सुनिश्चित करने में बनी चुनौतियों पर चर्चा कीजिए और ग्रामीण और शहरी दोनों संदर्भों में इन मुद्दों को संबोधित करने की रणनीतियाँ सुझाएँ (15 अंक, 250 शब्द)

October 16, 2024

GS Paper III

प्रश्न की मुख्य माँग

  • विश्लेषण कीजिए, कि भारत के खाद्यान्न की कमी वाले देश से खाद्यान्न अधिशेष वाले देश में हुए परिवर्तन ने खाद्य सुरक्षा के प्रति दृष्टिकोण को किस प्रकार प्रभावित किया है।
  • सभी नागरिकों के लिए पौष्टिक भोजन तक समान पहुँच सुनिश्चित करने में मौजूद चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।
  • ग्रामीण संदर्भ में इन मुद्दों के समाधान के लिए रणनीति सुझाइये।
  • शहरी संदर्भ में इन मुद्दों के समाधान के लिए रणनीति सुझाइये।

उत्तर

भारत का खाद्यान्न अल्पता वाले देश से खाद्यान्न अधिशेष वाले देश में परिवर्तित होने से खाद्य सुरक्षा के प्रति उसके दृष्टिकोण में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। वर्ष 1960 के दशक में भारत में अकाल की स्थिति थी, जो हरित क्रांति की सहायता से 2023-24 में 332.3 मिलियन टन का रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन हासिल करते हुए विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं और चावल उत्पादक देश बन गया है। इस परिवर्तन ने खाद्यान्न की उपलब्धता से हटकर पोषण सुरक्षा और समान पहुँच सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया है।

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भारत के खाद्यान्न-अधिशेष राष्ट्र में हुये परिवर्तन ने खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण को कैसे प्रभावित किया है

  • मात्रा से गुणवत्ता की ओर बदलाव: अधिशेष खाद्य उत्पादन के साथ, भारत का ध्यान खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करने से हटकर पोषण गुणवत्ता पर केंद्रित हो गया है। 
    • उदाहरण के लिए: पोषण अभियान का उद्देश्य विविध आहार और प्रमुख खाद्य पदार्थों के सुदृढ़ीकरण पर ध्यान केंद्रित करके बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के बीच व्याप्त कुपोषण की समस्या से निपटना है।
  • बेहतर बफर स्टॉक और खाद्य सुरक्षा: भारत के खाद्य अधिशेष राष्ट्र बनने की वजह से भारतीय खाद्य निगम (FCI) के माध्यम से बफर स्टॉक बनाये गये हैं जिससे खाद्य कीमतों और आपूर्ति में स्थिरता आई है। 
    • उदाहरण के लिए: NFSA 2013 के अनुसार , सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) 800 मिलियन लाभार्थियों को सब्सिडी वाले खाद्यान्न सुनिश्चित करती है, जिससे पूरे देश में खाद्य सुरक्षा बढ़ती है।
  • कृषि विविधीकरण पर नीतिगत ध्यान: अधिशेष उत्पादन के परिणामस्वरुप पोषण संतुलन और पर्यावरणीय संधारणीयता के लिए फसल विविधीकरण की ओर नीतिगत परिवर्तन संभव हो पाया है। 
    • उदाहरण के लिए: पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए विविध फसलों को बढ़ावा देते हुए और जलवायु प्रतिरोध सुनिश्चित करते हुए, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) में अब मिलेट जैसे पोषक अन्न को भी शामिल किया गया है।
  • निर्यात क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान: खाद्य अधिशेष वाले देश के रूप में भारत ने घरेलू बाजारों को स्थिर करने और विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए कृषि उपज के निर्यात पर ध्यान केंद्रित किया है। 
    • उदाहरण के लिए: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने वर्ष 2022-23 में 22 मिलियन टन से अधिक चावल का निर्यात किया, जिससे वह विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बन गया।
  • खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को मजबूत बनाना: खाद्य अधिशेष ने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के विकास को बढ़ावा दिया है, जिसका उद्देश्य अन्न की बर्बादी को कम करना और मूल्य संवर्धन को बढ़ाना है। 
    • उदाहरण के लिए: प्रधानमंत्री किसान सम्पदा योजना मेगा फूड पार्कों और कोल्ड चेन के विकास में सहायता करती है, जिससे खाद्यान्नों के बेहतर भंडारण और प्रसंस्करण में सुविधा होती है।
  • संधारणीय कृषि के तरीकों पर ध्यान: खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने के लिए संधारणीय कृषि की ओर बल दिया जाने लगा है।
    • उदाहरण के लिए: संधारणीय कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA) मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और जल-उपयोग दक्षता को बढ़ावा देता है, जिससे कृषि पद्धतियों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।
  • पोषण-उन्मुख योजनाएँ: खाद्य अधिशेष ने प्रच्छन्न भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए पोषण-विशिष्ट हस्तक्षेपों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने में सहायता की है। 
    • उदाहरण के लिए: मिड डे मील योजना, जो अब PM-POSHAN योजना में एकीकृत कर दी गई है, 120 मिलियन से अधिक स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन प्रदान करती है, कुपोषण की समस्या को दूर करती है और शिक्षण परिणामों में सुधार करती है।

पौष्टिक भोजन तक समान पहुँच सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ

  • खाद्य वितरण में क्षेत्रीय असमानताएँ: अधिशेष उत्पादन के बावजूद, खाद्य उपलब्धता के संदर्भ में क्षेत्रीय असंतुलन बना हुआ है, जो दूरदराज के क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है। 
    • उदाहरण के लिए: बिहार और झारखंड जैसे राज्य PDS में अक्षमताओं और परिवहन बाधाओं के कारण खाद्य असुरक्षा के उच्च स्तर का सामना कर रहे हैं ।
  • सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी: उच्च उपज वाली किस्मों पर अधिक ध्यान देने से फसलों के पोषण संबंधी प्रोफाइल पर नकारात्मक असर पड़ा है, जिससे फसलों में व्यापक रूप से सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी आ रही है। 
    • उदाहरण के लिए: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 में बताया गया है कि भारत में पाँच वर्ष से कम उम्र के दो-तिहाई बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं,  अतः: फोर्टिफिकेशन और विविध आहार पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • वहनीयता संबंधी मुद्दे: खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें और मुद्रास्फीति के कारण निम्न आय वाले परिवारों के लिए पौष्टिक भोजन का व्यय वहन कर पाना कठिन हो जाता है।
  • आपूर्ति शृंखला की अक्षमताएँ: अपर्याप्त भंडारण और परिवहन बुनियादी ढाँचे के कारण फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान, खाद्य उपलब्धता को कम करते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, अपर्याप्त कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं के कारण भारत में कृषि उपज का लगभग 10% हिस्से का नुक़सान हो जाता है, जिससे खाद्य गुणवत्ता और उपलब्धता प्रभावित होती है।
  • शहरी-ग्रामीण विभाजन: शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच पौष्टिक भोजन की उपलब्धता  काफी भिन्न होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर कुपोषण की दर अधिक होती है। 
    • उदाहरण के लिए: NFHS-5 के आंकड़े दर्शाते हैं, कि ग्रामीण भारत में बच्चो में स्टंटिंग (Child Stunting) की दर शहरी क्षेत्रों की तुलना में 9% अधिक है, जो भोजन की उपलब्धता में मौजूद असमानता को दर्शाता है।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: जलवायु परिवर्तन, फसल उत्पादन को प्रभावित करता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और उपलब्धता प्रभावित होती है।
  • पोषण संबंधी जागरूकता और आहार संबंधी प्राथमिकताएँ: संतुलित आहार के संबंध में जागरूकता की कमी और प्रमुख अन्न के लिए सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के परिणामस्वरूप विविध खाद्य पदार्थों की माँग प्रभावित होती है। 
    • उदाहरण के लिए: ईट राइट इंडिया मूवमेंट के तहत चलाये गये जागरूकता अभियानों का उद्देश्य भोजन की स्वस्थ  आदतों को बढ़ावा देना है, परंतु FSSAI के अनुसार कई क्षेत्रों में इसे अभी नहीं अपनाया गया है ।

ग्रामीण संदर्भ में इन मुद्दों के समाधान हेतु रणनीतियाँ

  • कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देना: फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने से ग्रामीण क्षेत्रों में  वर्षभर पोषण उपलब्धता सुनिश्चित हो सकती है। 
    • उदाहरण के लिए: राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVV) अंतर-फसल और हॉर्टीकल्चर में मदद करती है, जिससे ग्रामीण किसानों को आय के वैकल्पिक स्रोत और बेहतर पोषण मिलता है।
  • स्थानीय भंडारण सुविधाओं को मजबूत बनाना: ग्रामीण स्तर पर कोल्ड स्टोरेज और गोदामों का विकास करके फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
    • उदाहरण के लिए: ग्रामीण भंडारण योजना ग्रामीण क्षेत्र में गोदामों के लिए सब्सिडी प्रदान करती है, जिससे जल्दी खराब होने वाली उपज का बेहतर भंडारण सुनिश्चित होता है और खाद्य उपलब्धता में सुधार होता है।
  • फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों तक पहुँच में सुधार: ग्रामीण क्षेत्रों में फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों तक पहुँच का विस्तार करके सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर किया जा सकता है। 
    • उदाहरण के लिए: FSSAI के अंतर्गत खाद्य सुदृढ़ीकरण संसाधन केंद्र (FFRC) चावल, दूध और खाद्य तेल के फोर्टिफिकेशन में सहायता करते हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण स्तर बढ़ता है।
  • सामुदाय आधारित पोषण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना: सामुदायिक कार्यक्रम, जागरूकता और आहार संबंधी आदतों को बेहतर बनाने में भूमिका निभा सकते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: पोषण वाटिका पहल आंगनवाड़ियों में पौष्टिक उद्यानों को विकसित करने में प्रोत्साहित करती है, जिससे कुपोषण से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सब्जियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
  • ग्रामीण संपर्क बढ़ाना: ग्रामीण सड़कों और परिवहन में सुधार करने से बाजारों और PDS दुकानों तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित हो सकती है। 
    • उदाहरण के लिए: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) ने ग्रामीण संपर्क में सुधार किया है, जिससे दूरदराज के इलाकों में खाद्यान्न का बेहतर वितरण संभव हो पाया है।

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शहरी संदर्भ में इन मुद्दों को संबोधित करने की रणनीतियाँ

  • शहरी पोषण कार्यक्रम: शहरी मलिन बस्तियों में पोषण-विशिष्ट कार्यक्रमों को लागू करने से कुपोषण की समस्या से निपटा जा सकता है
  • शहरी खाद्य बैंकों का विस्तार: शहरी खाद्य बैंक शहरी गरीबों के बीच खाद्य असुरक्षा को दूर कर सकते हैं। 
    • उदाहरण के लिए: दिल्ली के फूड बैंक नेटवर्क ने कोविड-19 जैसे संकट के दौरान भूखमरी को दूर करने के लिए कम आय वाले परिवारों को भोजन वितरित किए।
  • शहरी कृषि को प्रोत्साहित करना: रुफटॉप फार्मिंग और सामुदायिक उद्यानों को बढ़ावा देने से ताजा उपज की उपलब्धता बढ़ सकती है।
  • शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बेहतर बनाना: शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कार्यकुशलता में सुधार करके किफायती खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। 
    • उदाहरण के लिए: दिल्ली की e-PDS प्रणाली ने राशन वितरण को डिजिटल बना दिया है, जिससे लीकेज की समस्या कम हुई है और खाद्यान्नों की समय पर डिलीवरी सुनिश्चित हुई है।
  • भोजन वितरण के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना: प्रौद्योगिकी प्लेटफार्म का उपयोग करके शहरी क्षेत्रों में पौष्टिक भोजन वितरण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सकता है।
    • उदाहरण के लिए: अक्षय पात्र फाउंडेशन शहरी स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने के लिए ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम का उपयोग करता है, जिससे समय पर और सुरक्षित वितरण सुनिश्चित होता है।

खाद्यान्न अल्पता वाले देश से खाद्यान्न अधिशेष वाले देश बनने की भारत की यात्रा ने खाद्य सुरक्षा के प्रति उसके दृष्टिकोण को नया आकार दिया है, तथा पोषण गुणवत्ता और न्यायसंगत पहुँच पर ध्यान केंद्रित किया है। जबकि क्षेत्रीय असमानताएँ और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, सभी के लिए व्यापक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु समावेशिता, संधारणीयता और तकनीकी एकीकरण पर ध्यान केंद्रित करने वाला एक समन्वित दृष्टिकोण आवश्यक है।

Analyse how India’s transition from a food deficient to a food surplus nation has impacted the approach to food security. Discuss the challenges that persist in ensuring equitable access to nutritious food for all the citizens and suggest strategies to address these issues in both rural and urban contexts in hindi

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