प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के विकसित भारत@2047 के लिए मुख्य सबक।
- भारत के लिए इन सबकों के अनुकूलन करने में आने वाली बाधाएँ।
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उत्तर
एकीकृत आवास, सार्वभौमिक शिक्षा और सशक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों जैसी सामाजिक संरचनाओं पर सिंगापुर के जोर ने अवसंरचना-आधारित विकास और सतत् दीर्घकालिक विकास को पूरक बनाया है। विकसित भारत@2047 के लिए प्रयासरत भारत , सिंगापुर की चमचमाती गगनचुंबी इमारतों से परे अंतर्निहित “सामाजिक सीमेंट (बंधन)” की ओर देख सकता है, जो इसकी आर्थिक प्रगति को राष्ट्रीय स्थिरता के साथ एकीकृत करता है।
भारत के विकसित भारत@2047 के लिए मुख्य सबक
- अवसंरचना के रूप में सामाजिक सामंजस्य: सिंगापुर सामाजिक सद्भाव को एक नैतिक आदर्श के रूप में नहीं बल्कि एक आर्थिक आवश्यकता के रूप में मानता है, जो व्यावसायिक जोखिमों (लेन-देन लागत) को कम करता है और वैश्विक निवेश को आकर्षित करता है।
- एकीकरण के लिए आवास: सार्वजनिक आवास का उपयोग सामाजिक इंजीनियरिंग के लिए एक उपकरण के रूप में किया जाता है, जो विशेष धर्म, नस्ल की बस्तियों के गठन को रोकने और साझा राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा देने के लिए नृजातीय मिश्रण को लागू करता है।
- उदाहरण के लिए: 80% से अधिक सिंगापुरवासी एचडीबी फ्लैटों में रहते हैं, जहाँ नृजातीय कोटा विविधतापूर्ण पड़ोस सुनिश्चित करता है, एक मॉडल जिसे भारत अपने आगामी स्मार्ट शहरों के लिए अनुकूलित कर सकता है।
- योग्यतावाद के माध्यम से गतिशीलता: सार्वभौमिक शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से एक विश्वसनीय “गतिशीलता का एस्केलेटर” यह सुनिश्चित करता है कि पहचान के बजाय प्रतिभा, सफलता निर्धारित करती है।
- उदाहरण के लिए: भारत का शिक्षा मंत्रालय हाल ही में व्यावसायिक प्रशिक्षण और आजीवन सीखने को भारतीय स्कूली पाठ्यक्रम में एकीकृत करने के लिए सिंगापुर के साथ सहयोग करने पर सहमत हुआ है।
- निवारक सार्वजनिक स्वास्थ्य: प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में निरंतर निवेश यह सुनिश्चित करता है कि आधारभूत स्वास्थ्य परिणाम आय के स्तर से प्रभावित न हो और उच्च उत्पादकता वाले कार्यबल को बनाए रखें।
- उदाहरण के लिए: निवारक स्वास्थ्य और आधारभूत परिणामों पर सिंगापुर का ध्यान भारत की आयुष्मान भारत योजना को सशक्त करने के लिए एक सबक के रूप में कार्य कर सकता है, ताकि केवल स्वास्थय बीमा प्रदान करने वाली योजना से आगे इसका विस्तार कर इसमें व्यापक देखभाल को शामिल किया जा सके।
- पारगमन-उन्मुख विकास: कुशल सार्वजनिक परिवहन के साथ आवास को एकीकृत कर सभी नागरिकों की नौकरियों तक समान पहुँच सुनिश्चित करने से “गरीबी का स्थानिक अलगाव” कम होता है।
- संस्थागत विश्वास और सत्यनिष्ठा: पक्षपात से मुक्त एक पेशेवर, अच्छे वेतन वाली सिविल सेवा भ्रष्टाचार को कम करती है और राज्य संस्थानों में सार्वजनिक विश्वास को मजबूत करती है।
- उदाहरण के लिए: सिंगापुर के भ्रष्ट आचरण जाँच ब्यूरो (CPIB) और इसकी योग्यता-आधारित भर्ती को इसके ‘तीसरी दुनिया से पहली दुनिया’ में उन्नयन का आधार माना जाता है।
भारत के लिए इन सबकों का अनुकूलन करने में आने वाली बाधाएँ
- पैमाने में अंतर: सिंगापुर एक शहर-राज्य है, जिसकी आबादी कई भारतीय महानगरीय क्षेत्रों से कम है, जिससे केंद्रीकृत रूप से व्यापक सामाजिक परिवर्तनों को लागू करना मुश्किल हो जाता है।
- उदाहरण के लिए: 1.4 बिलियन की आबादी का प्रबंधन करना तार्किक और प्रशासनिक जटिलताएँ प्रस्तुत करता है, जिनका सामना एक छोटे द्वीप राष्ट्र को नहीं करना पड़ता है।
- सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता: भारत में गहरी जड़ें जमा चुकी भाषायी, धार्मिक और जाति-आधारित पहचान सिंगापुर की त्रि-जातीय (चीनी, मलय, भारतीय) संरचना की तुलना में अधिक जटिल हैं।
- उदाहरण के लिए: आवास में अनिवार्य नृजातीय कोटा के सिंगापुर में सफल रहने के बावजूद, इसे भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे में महत्त्वपूर्ण कानूनी और राजनीतिक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
- संघीय शासन संरचना: सिंगापुर की एकात्मक सरकार के विपरीत, भारत की संघीय संरचना के लिए केंद्र और राज्यों के बीच आम सहमति की आवश्यकता होती है, जिससे अक्सर नीति बाधित होती हैं।
- उदाहरण के लिए: श्रम संहिता या शिक्षा सुधारों का कार्यान्वयन अक्सर रुक जाता है क्योंकि भारत में “स्वास्थ्य” और “शिक्षा” मुख्य रूप से राज्य या समवर्ती विषय हैं।
- अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का प्रभुत्व: भारत के कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, जिससे “नियोक्ता-योगदान” सामाजिक सुरक्षा मॉडल (जैसे- सिंगापुर का सीपीएफ) को लागू करना मुश्किल हो जाता है।
- लोकतांत्रिक बनाम सत्तावादी संक्रमण: कठोर, व्यवस्था-केंद्रित प्रणाली का उपयोग करके सिंगापुर तेजी से विकसित हुआ, लेकिन यह दृष्टिकोण भारत के खुले और बहस-संचालित लोकतांत्रिक परिवेश के साथ अच्छी तरह से सामंजस्य नहीं बना पाता है।
- राजकोषीय सीमाएँ: एक सरल शासन संरचना के साथ सिंगापुर एक उच्च प्रति व्यक्ति जीडीपी वाला राष्ट्र है, जबकि भारत को गरीबों के लिए भारी सब्सिडी बिल के साथ बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचे के खर्च को संतुलित करना पड़ता है।
- उदाहरण के लिए: भारत का सब्सिडी बोझ (खाद्य, उर्वरक, ईंधन) सिंगापुर जैसे विकास के लिए आवश्यक आरंभिक निवेश के लिए वित्तीय उपलब्धता को सीमित करता है।
निष्कर्ष
विकसित भारत के लिए सबक यह है कि आर्थिक महत्त्वाकांक्षा का मिलान ‘सामाजिक संरचना’ से होना चाहिए। भारत को सिंगापुर के तरीकों की नकल करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसकी प्राथमिकताओं को अपनाने की जरूरत है। स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने के लिए शहरी नियोजन को विकेंद्रीकृत करके और सामाजिक एकजुटता को “राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में संस्थागत बनाकर, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि वर्ष 2047 तक की उसकी यात्रा केवल आर्थिक वृद्धि के बारे में नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए गतिशीलता का एक विश्वसनीय, समावेशी एस्केलेटर (प्रगति पथ) बनाने के बारे में है।
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