प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के जल संकट के मूल कारण के रूप में संस्थागत विफलताओं की चर्चा कीजिए।
- भारत की वर्तमान जल शासन व्यवस्था की प्रभावशीलता का वर्णन कीजिए।
- सतत् एवं कुशल जल प्रबंधन हेतु आवश्यक सुधार सुझाइए।
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उत्तर
भारत का जल संकट पूर्ण जल-अभाव नहीं, बल्कि कमजोर शासन व्यवस्था को दर्शाता है। लगभग 4,000 बीसीएम वार्षिक वर्षा होने के बावजूद केवल लगभग 1,100 बीसीएम जल ही उपयोग योग्य है, जो भंडारण, आवंटन, विनियमन एवं सतत् प्रबंधन में संस्थागत विफलताओं को प्रदर्शित करता है।
भारत के जल संकट के मूल कारण के रूप में संस्थागत एवं शासन संबंधी विफलताएँ
- खंडित शासन व्यवस्था: जल प्रबंधन अनेक मंत्रालयों एवं राज्यों द्वारा अलग-अलग किया जाता है, जिससे समन्वय की कमी, कार्यों की पुनरावृत्ति तथा नीतिगत अंतराल उत्पन्न होते हैं।
- उदाहरण: भूजल एवं सतही जल की परस्पर निर्भरता के बावजूद उनका प्रबंधन अलग-अलग किया जाता है।
- अपर्याप्त भंडारण क्षमता: अपर्याप्त जलाशयों, पुनर्भरण प्रणालियों एवं शहरी नियोजन की विफलताओं के कारण भारत वार्षिक वर्षा का केवल सीमित भाग ही संचित कर पाता है।
- उदाहरण: लगभग 4,000 बीसीएम वर्षा होने के बावजूद केवल लगभग 1,100 बीसीएम जल उपयोग योग्य है।
- भूजल का दुरुपयोग: कमजोर विनियमन एवं मुफ्त बिजली की व्यवस्था कृषि क्षेत्र में अत्यधिक भूजल दोहन को बढ़ावा देती है, जिससे जलभृतों का क्षरण होता है।
- उदाहरण: धान की कृषि के कारण पंजाब एवं हरियाणा में भूजल स्तर में गंभीर गिरावट देखी जा रही है।
- अकुशल सिंचाई प्रणाली: जल संकट के बावजूद बाढ़ द्वारा सिंचाई की प्रधानता बनी हुई है, जो दक्षता एवं मूल्य निर्धारण सुधारों को बढ़ावा देने में संस्थागत कमजोरी को दर्शाती है।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देती है, फिर भी अनेक राज्यों में इसका सीमित उपयोग हो रहा है।
- कमजोर स्थानीय निकाय: पंचायतों एवं शहरी स्थानीय निकायों के पास सतत् जल प्रबंधन हेतु पर्याप्त वित्तीय संसाधन एवं तकनीकी क्षमता का अभाव है।
भारत की वर्तमान जल शासन व्यवस्था की प्रभावशीलता
- संवैधानिक विभाजन: जल राज्य सूची का विषय है, जबकि केंद्र नीतियों एवं वित्तपोषण के माध्यम से मार्गदर्शन प्रदान करता है। इससे संघीय भागीदारी सुनिश्चित होती है, लेकिन समन्वय संबंधी समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।
- उदाहरण: राज्य सूची की प्रविष्टि 17 एवं संघ सूची की प्रविष्टि 56।
- नीतिगत ढाँचा: `राष्ट्रीय जल नीति संरक्षण, नदी बेसिन योजना एवं माँग प्रबंधन को बढ़ावा देती है, किंतु इसका कार्यान्वयन अभी भी कमजोर है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय जल नीति 2012 पेयजल एवं पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं को प्राथमिकता देती है।
- संस्थागत योजनाएँ: सरकारी योजनाएँ पेयजल, सिंचाई एवं संरक्षण के लिए लक्षित हस्तक्षेप प्रदान करती हैं।
- उदाहरण: जल जीवन मिशन का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को नल जल उपलब्ध कराना है।
- डेटा निगरानी: मूल्यांकन प्रणालियाँ साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को बेहतर बनाती हैं, किंतु सुधारात्मक कार्रवाई हेतु इनके पास प्रवर्तन शक्तियों का अभाव है।
- उदाहरण: नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक ने 60 करोड़ लोगों को उच्च जल तनाव की स्थिति में बताया।
- नदी प्रबंधन: नदी बेसिन प्रबंधन हेतु प्राधिकरण मौजूद हैं, लेकिन अंतरराज्यीय विवाद एवं सीमित बेसिन-स्तरीय शासन व्यवस्था उनकी प्रभावशीलता को कम कर देती है।
- उदाहरण: कावेरी विवाद न्यायाधिकरणों एवं प्राधिकरणों के बावजूद संस्थागत कमजोरी को दर्शाता है।
सतत एवं कुशल जल प्रबंधन हेतु आवश्यक सुधार
- बेसिन आधारित दृष्टिकोण: एकीकृत एवं वैज्ञानिक जल शासन के लिए प्रशासनिक सीमाओं के स्थान पर नदी-बेसिन आधारित योजना अपनाई जानी चाहिए।
- उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया का मर्रे–डार्लिंग बेसिन मॉडल वैश्विक स्तर पर एक श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
- अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग: उपचारित अपशिष्ट जल का उद्योग एवं कृषि में पुनः उपयोग कर मीठे जल पर निर्भरता कम की जानी चाहिए।
- सिंचाई सुधार: दक्षता बढ़ाने हेतु ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों को प्रोत्साहन, मूल्य निर्धारण सुधार तथा फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- उदाहरण: इजरायल का कुशल सिंचाई मॉडल जल उत्पादकता के लिए विश्वभर में उद्धृत किया जाता है।
- सशक्त विनियमन: अस्थिर जल दोहन को रोकने के लिए मीटरिंग, जल मूल्य निर्धारण एवं कठोर भूजल कानून आवश्यक हैं।
- उदाहरण: अटल भूजल योजना जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में सामुदायिक आधारित भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देती है।
- प्रौद्योगिकी का एकीकरण: कुशल योजना निर्माण एवं रिसाव रोकने हेतु डिजिटल उपकरणों, सेंसर, GIS मैपिंग एवं वास्तविक समय निगरानी का उपयोग किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: शहरी जल उपयोगिताओं में स्मार्ट जल ऑडिट जवाबदेही बढ़ाते हैं तथा जल हानि को कम करते हैं।
निष्कर्ष
भारत का जल भविष्य नए स्रोतों की खोज पर कम और उपलब्ध जल संसाधनों के विवेकपूर्ण प्रबंधन पर अधिक निर्भर करता है। जल सुरक्षा एवं सतत् विकास सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत सुधार, संसाधनों का कुशल आवंटन तथा जवाबदेह संघीय सहयोग अत्यंत आवश्यक हैं।