Q. संस्थागत गुणवत्ता आर्थिक प्रदर्शन का एक महत्त्वपूर्ण कारक है। इस संदर्भ में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सिविल सेवा में सुधारों का सुझाव दीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • आर्थिक प्रदर्शन के प्रेरक के रूप में संस्थागत गुणवत्ता की भूमिका का वर्णन कीजिए।
  • कमजोर संस्थागत गुणवत्ता से उत्पन्न समस्याओं को रेखांकित कीजिए।
  • लोकतंत्र को सुदृढ़ करने हेतु सिविल सेवा सुधार की चर्चा कीजिए।

उत्तर

भ्रष्टाचार बोध सूचकांक 2025 यह दर्शाता है कि कमजोर होती संस्थागत गुणवत्ता शासन की विश्वसनीयता और आर्थिक प्रदर्शन को प्रभावित करती है। अतः सिविल सेवा सुधार लोकतंत्र को सुदृढ़ करने और भारत की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

आर्थिक प्रदर्शन के प्रेरक के रूप में संस्थागत गुणवत्ता

  • निवेश वातावरण: मजबूत संस्थाएँ निवेशकों का विश्वास बढ़ाती हैं और जोखिम को कम करती हैं।
    • उदाहरण: CPI स्कोर 39 संप्रभु जोखिम धारणा और पूँजी प्रवाह को प्रभावित करता है।
  • दक्षता में वृद्धि: पारदर्शी शासन भ्रष्टाचार को कम करता है और सार्वजनिक व्यय के परिणामों में सुधार लाता है।
    • उदाहरण: डिजिटल प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) से कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार कम हुआ है।
  • लागत में कमी: कम भ्रष्टाचार से लेन-देन और अनुपालन लागत घटती है।
    • उदाहरण: भ्रष्टाचार से भारत की जीडीपी का लगभग 0.5–1.5% वार्षिक नुकसान होने का अनुमान है।
  • उत्पादकता में वृद्धि: कुशल विनियमन से लाभ कमाने की प्रवृत्ति से हटकर नवाचार पर ध्यान केंद्रित होता है।
    • उदाहरण: जीएसटी ने अर्थव्यवस्था के औपचारीकरण और कर की पता लगाने की क्षमता में सुधार किया है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता: शासन की विश्वसनीयता वैश्विक बाजारों में एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक कारक बन जाती है।
    • उदाहरण: जिन देशों की CPI रैंकिंग में सुधार होता है, वे अधिक निरंतर निवेश आकर्षित करते हैं।

कमजोर संस्थागत गुणवत्ता से उत्पन्न समस्याएँ

  • उच्च अनुपालन बोझ: जटिल नियमों के कारण प्रशासनिक विवेक बढ़ता है, जिससे भ्रष्टाचार के जोखिम बढ़ते हैं।
  • निरर्थकता: अत्यधिक विवेकाधिकार रिश्वतखोरी और अकार्यकुशलता को बढ़ावा देता है।
    • उदाहरण: फार्मा स्टार्ट-अप्स के लिए लगभग 998 अनुपालन आवश्यकताएँ।
  • कम जवाबदेही: कमजोर निगरानी से जन विश्वास और लोकतांत्रिक वैधता कमजोर होती है।
  • न्यायिक देरी: अप्रभावी प्रवर्तन से कानून का शासन कमजोर पड़ता है।
  • नीतिगत अनिश्चितता: असंगत विनियामक ढाँचे दीर्घकालिक निवेश को हतोत्साहित करते हैं।
    • उदाहरण: अस्थिर अनुपालन वातावरण से व्यापारिक विश्वास प्रभावित होता है।

लोकतंत्र को सुदृढ़ करने हेतु सिविल सेवा सुधार

  • पार्श्व प्रवेश (Lateral Entry): नीति निर्माण और क्रियान्वयन में सुधार के लिए विषय-विशेषज्ञों को शामिल किया जाए।
    • उदाहरण: स्वास्थ्य और अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता का उपयोग।
  • प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन: पदोन्नति को मापनीय परिणामों और जवाबदेही से जोड़ा जाए।
    • उदाहरण: कल्याणकारी योजनाओं में परिणाम-आधारित मूल्यांकन
  • प्रक्रियाओं का सरलीकरण: नियामक जटिलता को कम कर विवेकाधिकार को सीमित किया जाए।
  • डिजिटल शासन: ई-गवर्नेंस का विस्तार कर पारदर्शिता और पता लगाने की क्षमता (ट्रेसबिलिटी) को बढ़ाया जाए।
    • उदाहरण: आरबीआई डिजिटल पेमेंट्स इंडेक्स का 516.76 तक पहुँचना।
  • संस्थागत स्वतंत्रता: नियामक और ऑडिट संस्थाओं की स्वायत्तता को सुदृढ़ कर निष्पक्षता सुनिश्चित की जाए।

निष्कर्ष

सिविल सेवा सुधारों के माध्यम से संस्थागत गुणवत्ता को सुदृढ़ करना, शासन को आर्थिक आकांक्षाओं के अनुरूप बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। पारदर्शी, जवाबदेह और कुशल संस्थाएँ न केवल लोकतांत्रिक वैधता को मजबूत करेंगी, बल्कि सतत् विकास और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को भी बढ़ावा देंगी।

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