Q. न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही एक सुदृढ़ संवैधानिक ढाँचे के दो स्तंभ हैं। भारत में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए। वर्तमान ढाँचे की सीमाओं और संभावित कमियों का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
  • वर्तमान ढाँचे की सीमाओं और संभाव्य कमियों को रेखांकित कीजिए।
  • कमियों के निस्तारण हेतु सुधारात्मक उपायों के साथ आगे की राह लिखिए।

उत्तर

न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही एक सशक्त संवैधानिक ढाँचे के दो प्रमुख स्तंभ हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि न्यायपालिका कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त रहे, लेकिन साथ ही कानून के प्रति उत्तरदायी भी बनी रहे। भारत में, न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया अत्यंत कठोर है ताकि उन्हें राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षा प्रदान की जा सके। यद्यपि हाल के वर्षों में इस प्रक्रिया की आलोचना इसके “जटिल और राजनीतिक रूप से प्रेरित” स्वरूप के कारण की जा रही है।

उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया

यह प्रक्रिया दोनों ही न्यायालयों के लिए समान है, जिसे संविधान के अनुच्छेद-124(4) और अनुच्छेद-217(1) द्वारा नियंत्रित किया गया है और न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 में विस्तृत रूप से इसका उल्लेख किया गया है।

  • प्रस्ताव की प्रक्रिया: हटाने का प्रस्ताव लोकसभा के 100 सदस्य या राज्यसभा के 50 सदस्य द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए और इसे लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2018 में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध 71 सांसदों द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन इसे राज्यसभा के सभापति ने प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार कर दिया।
  • जाँच समिति का गठन: यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो पीठासीन अधिकारी एक तीन सदस्यीय समिति का गठन करता है, जिसमें एक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा एक प्रतिष्ठित न्यायविद् शामिल होते हैं।
    • उदाहरण: न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (2011) मामले में समिति ने उन्हें पदोन्नति से पूर्व निधियों के दुरुपयोग का दोषी पाया था।
  • संसदीय मतदान: यदि समिति न्यायाधीश को दोषी पाती है, तो दोनों सदनों को एक ही सत्र में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है। विशेष बहुमत का तात्पर्य है- सदन के सदस्यों की कुल संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान कर रहे सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत।
    • उदाहरण: न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी (1993) के विरुद्ध लाया गया प्रस्ताव लोकसभा में इसलिए विफल हो गया था, क्योंकि सत्तारूढ़ दल प्रस्ताव पर मतदान के दौरान अनुपस्थित रहा जिससे आवश्यक बहुमत नहीं मिल सका।
  • राष्ट्रपति का आदेश: जब दोनों सदन विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देते हैं, तब भारत के राष्ट्रपति द्वारा न्यायाधीश को पद से हटाने का अंतिम आदेश जारी किया जाता है।

वर्तमान ढाँचे की सीमाएँ और संभावित कमियाँ

  • विवेकाधीन वीटो: लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति को प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का पूर्ण विवेकाधिकार प्राप्त है तथा वे बिना किसी विस्तृत कानूनी औचित्य के प्रस्ताव को प्रारंभिक स्तर पर ही प्रस्ताव को अस्वीकृत कर सकते हैं। 
    • उदाहरण: विधि विशेषज्ञों का तर्क है कि यह “गेटकीपिंग” प्रक्रिया न्यायिक कदाचार की वैध जाँच को राजनीतिक उद्देश्य से रोकने के लिए उपयोग की जा सकती है।
  • उच्च राजनीतिक बहुमत की आवश्यकता: विशेष बहुमत की शर्त के कारण यह प्रक्रिया दलीय मतदान की शिकार हो जाती है, जिससे कई बार न्यायाधीश उत्तरदायित्व से बच जाते हैं।
  • सीमित आधार: न्यायाधीशों को केवल “सिद्ध दुर्व्यवहार” या “अक्षमता” के आधार पर ही हटाया जा सकता है।इस स्थिति में न्यायिक अनुचित आचरण एवं लघु कदाचार के समाधान हेतु कोई सुव्यवस्थित तंत्र उपलब्ध नहीं होता है।
    • उदाहरण: न्यायमूर्ति एस.के. गंगेले (2015) के मामले में जाँच के दौरान आरोप संबंधी अपर्याप्त साक्ष्य पाए गए, परंतु इसने दुर्व्यवहार और महाभियोग योग्य अपराध के बीच मौजूद अंतर को उजागर किया।
  • अंतरिम उपायों का अभाव: जाँच प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान न्यायाधीश को कार्य से रोकने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है, जब तक कि यह स्वेच्छा से या “आंतरिक” सहकर्मी दबाव के माध्यम से न किया जाए।

कमियों के निस्तारण हेतु सुधारात्मक उपायों के साथ आगे की राह

  • न्यायिक मानक विधेयक: न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक को पुनः प्रस्तुत कर उसे संशोधित रूप में लागू किया जाए, ताकि “दुर्व्यवहार” को परिभाषित किया जा सके और स्पष्ट नैतिक मानदंड निर्धारित किए जा सकें।
    • उदाहरण: वर्ष 2022 के विधेयक में नागरिकों को शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया प्रस्तावित की गई थी, जो वर्तमान संवैधानिक ढाँचे में अनुपस्थित है।
  • स्वचालित समिति गठन: वर्ष 1968 के अधिनियम में संशोधन कर यह अनिवार्य किया जाए कि यदि कोई प्रस्ताव संख्या की शर्तें पूरी करता है तो उसे स्वचालित रूप से एक जाँच समिति को भेजा जाए।
  • स्तरीय उत्तरदायित्व तंत्र: ऐसे आचरण के लिए “मामूली दंड” (जैसे सार्वजनिक निंदा या कार्य से हटाना) लागू करना जो पद से हटाने का कारण नहीं बनता है लेकिन न्यायिक गरिमा को कम करता है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय की “इन-हाउस प्रक्रिया” (1999) पहले से ही मुख्य न्यायाधीश को कार्य वापस लेने की अनुमति देती है, लेकिन एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए इसे वैधानिक समर्थन की आवश्यकता है।
  • स्वतंत्र पर्यवेक्षण निकाय: शिकायतों की प्रारंभिक छँटनी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और नागरिक समाज के सदस्यों से युक्त एक स्थायी, स्वतंत्र निकाय की स्थापना की जाए, ताकि हर शिकायत सीधे संसद तक न पहुँचे।

निष्कर्ष

न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के “मूल ढाँचे” का एक हिस्सा है, लेकिन यह व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का ढाल नहीं बन सकती। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है, “एक बेईमान न्यायाधीश पूरी व्यवस्था को कलंकित कर देता है।” विशुद्ध रूप से राजनीतिक “महाभियोग” मॉडल से हटकर नियम-आधारित जवाबदेही ढाँचे को अपनाकर भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसके न्यायाधीश पूरी तरह से स्वतंत्र और त्रुटिहीन रूप से जवाबदेह बने रहें, जिससे न्याय के मंदिर में जनता का विश्वास बना रहे।

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