प्रश्न की मुख्य माँग
- औपनिवेशिक काल की न्यायालयी अवकाश व्यवस्था का न्यायिक दक्षता पर प्रभाव।
- लंबित मामलों के अन्य संरचनात्मक एवं प्रक्रियात्मक कारण।
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
भारत की न्यायिक व्यवस्था गंभीर मामलों की लंबितता (Pendency) के संकट का सामना कर रही है। दिसंबर 2025 तक 5.39 करोड़ से अधिक मामले लंबित थे, जिनमें जिला न्यायालयों में 4.76 करोड़, उच्च न्यायालयों में 63.6 लाख तथा सर्वोच्च न्यायालय में 92,000 से अधिक मामले शामिल हैं। यद्यपि न्यायिक रिक्तियाँ इसका एक प्रमुख कारण हैं, फिर भी न्यायालयों की एक साथ होने वाली अवकाश व्यवस्था जैसी संस्थागत प्रथाएँ भी न्यायिक क्षमता को और कम कर देती हैं। इस चुनौती के समाधान के लिए क्षमता वृद्धि तथा प्रक्रियात्मक सुधार, दोनों आवश्यक हैं।
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न्यायिक रिक्तियाँ एवं संस्थागत क्षमता संबंधी बाधाएँ
- न्यायाधीशों की कमी: रिक्तियाँ न्यायालयों की मामलों का कुशलतापूर्वक निस्तारण करने की क्षमता को उल्लेखनीय रूप से कम कर देती हैं।
- उदाहरण: उच्च न्यायालयों में लगभग एक-तिहाई पद रिक्त हैं, जिससे कार्यरत न्यायाधीशों पर कार्यभार बढ़ जाता है।
- अत्यधिक कार्यभार से प्रभावित न्यायिक अधिकारी: भारतीय न्यायाधीश विश्व में सबसे अधिक मामलों के भार का सामना करने वालों में शामिल हैं, जिससे समयबद्ध न्याय प्रदान करना प्रभावित होता है।
- उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय में 92,000 से अधिक मामले लंबित होने के साथ तीन दशकों में लंबित मामलों का स्तर सर्वाधिक हो गया।
- अपर्याप्त न्यायिक अवसंरचना: सीमित न्यायालय कक्ष, कर्मचारी तथा प्रौद्योगिकी क्षमता मामलों के निस्तारण की दर को सीमित करते हैं।
- उदाहरण: 4.76 करोड़ से अधिक मामलों का निस्तारण कर रहे जिला न्यायालयों को अधिक सुदृढ़ प्रशासनिक एवं डिजिटल समर्थन की आवश्यकता है।
न्यायालयों की अवकाश व्यवस्था की औपनिवेशिक विरासत एवं उसका प्रभाव
- सामूहिक न्यायिक अवकाश से संस्थागत कार्य निरंतरता बाधित होती है: सामूहिक अवकाश के कारण अत्यधिक लंबित मामलों की अवधि में उपलब्ध पीठों की संख्या कम हो जाती है। ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान सर्वोच्च न्यायालय पूर्ण क्षमता के स्थान पर केवल सीमित अवकाशकालीन पीठों के माध्यम से कार्य करता है।
- औपनिवेशिक काल की यह व्यवस्था वर्तमान संदर्भ में उचित नहीं: ऐतिहासिक रूप से न्यायालय कैलेंडर भारत की जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप ब्रिटिश न्यायाधीशों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाए गए थे।
- उदाहरण: वर्ष 2024 में ग्रीष्मकालीन अवकाश का नाम बदलकर आंशिक न्यायालय कार्य दिवस कर दिया गया, फिर भी वास्तविक कार्य दिवस लगभग 190 ही रहे।
- संवेदनशील वादकारियों पर प्रभाव: न्याय में विलंब का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव विचाराधीन बंदियों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़ता है।
- उदाहरण: भारत के लगभग तीन-चौथाई कैदी विचाराधीन बंदी हैं, जिनमें से अनेक विचारण की प्रतीक्षा में लंबे समय तक कारावास में रहते हैं।
मामलों की लंबितता के अन्य संरचनात्मक एवं प्रक्रियात्मक कारण
- वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) का सीमित उपयोग: न्यायालयों पर अत्यधिक निर्भरता से अनावश्यक वाद-विवाद बढ़ते हैं।
- उदाहरण: राष्ट्रीय लोक अदालत की एक ही बैठक में 2.59 करोड़ मामलों का निस्तारण किया गया, जो इसकी व्यापक क्षमता को दर्शाता है।
- प्रक्रियात्मक विलंब एवं बार-बार स्थगन: अकुशल केस प्रबंधन के कारण विचारण में अधिक समय लगता है तथा मामलों की लंबितता बढ़ती है।
- कमजोर जवाबदेही तंत्र: मामलों के निस्तारण के लिए स्पष्ट लक्ष्यों एवं निगरानी तंत्र के अभाव में संस्थागत दक्षता प्रभावित होती है।
आगे की राह
- न्यायालयों की चरणबद्ध अवकाश व्यवस्था: न्यायाधीशों को पर्याप्त विश्राम सुनिश्चित करते हुए न्यायालयों का निरंतर संचालन बनाए रखा जाए।
- उदाहरण: संसदीय स्थायी समिति (2023) ने संपूर्ण न्यायालय बंद रखने के स्थान पर चरणबद्ध अवकाश की अनुशंसा की।
- न्यायिक नियुक्तियों में तेजी लाना: कॉलेजियम एवं सरकार के मध्य बेहतर समन्वय स्थापित कर रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए।
- वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) तंत्र का विस्तार: मध्यस्थता, आर्बिट्रेशन तथा लोक अदालतों को बढ़ावा देकर अनावश्यक वाद-विवाद को रोका जाए।
- उदाहरण: मध्यस्थता अधिनियम, 2023 उपयुक्त विवादों में वाद-पूर्व (Pre-Litigation) समझौते को प्रोत्साहित करता है।
- सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की विशेषज्ञता का उपयोग: अनुभवी पूर्व न्यायाधीशों की सहायता से विशेष निस्तारण दल गठित किए जाएँ।
- उदाहरण: सेवानिवृत्त न्यायाधीश लंबित मामलों के समूहों की पहचान कर लक्षित मामला-निस्तारण कार्यक्रमों का पर्यवेक्षण कर सकते हैं।
- प्रौद्योगिकी-आधारित वाद प्रबंधन को सुदृढ़ करना: एआई-सक्षम ट्रैकिंग, डिजिटल सुनवाई तथा स्वचालित समय-निर्धारण का उपयोग किया जाए।
- उदाहरण: ई-कोर्ट्स पहल पारदर्शिता बढ़ाने तथा प्रक्रियात्मक विलंब को कम करने में सहायक हो सकती है।
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निष्कर्ष
न्यायिक रिक्तियाँ भारत में मामलों की लंबितता का प्रमुख कारण बनी हुई हैं, किंतु न्यायालयों की एक साथ होने वाली अवकाश व्यवस्था जैसी संस्थागत अक्षमताएँ इस समस्या को और गंभीर बनाती हैं। सुधार के लिए पर्याप्त न्यायिक क्षमता, न्यायालयों का निरंतर संचालन, वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) का विस्तार तथा प्रौद्योगिकी-संचालित वाद प्रबंधन को सम्मिलित करने वाला समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, ताकि नागरिकों को समयबद्ध न्याय सुनिश्चित किया जा सके।