प्रश्न की मुख्य माँग
- लैंड पूलिंग: समावेशी शहरी एवं ग्रामीण विकास के उत्प्रेरक के रूप में।
- लैंड पूलिंग से संबंधित चुनौतियाँ।
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
भारत को वर्ष 2030 तक अवसंरचना एवं शहरीकरण के लिए लगभग 25 मिलियन हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होगी। पारंपरिक भूमि अधिग्रहण में होने वाली देरी एवं विवादों के बीच, लैंड पूलिंग (Land Pooling) एक सहभागी मॉडल के रूप में उभरती है, जो भूमि स्वामियों के हितों के साथ विकास का समन्वय करते हुए समावेशी विकास को बढ़ावा देती है।
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लैंड पूलिंग: समावेशी शहरी एवं ग्रामीण विकास का उत्प्रेरक
- साझा लाभ: भूमि स्वामी भूमि का योगदान देकर विकास के भागीदार बनते हैं तथा एकमुश्त मुआवजे के बजाय अधिक मूल्य वाले छोटे विकसित भूखंड प्राप्त करते हैं।
- त्वरित भूमि उपलब्धता: स्वैच्छिक लैंड पूलिंग से अनिवार्य भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुकदमों, विरोध-प्रदर्शनों एवं देरी में कमी आती है।
- उदाहरण: दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की लैंड पूलिंग नीति, 2018 शहरी विस्तार के लिए सहमति-आधारित भूमि समेकन पर आधारित है।
- सुनियोजित विकास: सड़कों, सार्वजनिक सुविधाओं एवं हरित क्षेत्रों की समेकित योजना संभव होती है, जिससे अव्यवस्थित विकास को रोका जा सकता है।
- ग्रामीण समृद्धि: बेहतर कनेक्टिविटी से कृषि बाजारों तक पहुँच, गैर-कृषि रोजगार तथा आसपास के गाँवों में भूमि के मूल्य में वृद्धि होती है।
- उदाहरण: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के राजमार्ग गलियारों के आस-पास लॉजिस्टिक्स पार्क एवं वेयरहाउसिंग क्लस्टरों का विकास हुआ है।
- कम सार्वजनिक व्यय: सरकारों को प्रारंभिक मुआवजे पर कम खर्च करना पड़ता है तथा पूल की गई भूमि के बढ़े हुए मूल्य के माध्यम से अवसंरचना का वित्तपोषण किया जा सकता है।
- उदाहरण: गुजरात की टाउन प्लानिंग स्कीम शहरी अवसंरचना के वित्तपोषण के लिए भूमि पुनर्समायोजन (Land Readjustment) मॉडल का उपयोग करती है।
लैंड पूलिंग से संबंधित चुनौतियाँ
- सहमति संबंधी समस्याएँ: विभिन्न हितों वाले अनेक भू-स्वामियों से सहमति प्राप्त करना कठिन होता है।
- कानूनी अस्पष्टता: विखंडित भूमि अभिलेख एवं स्वामित्व संबंधी विवाद लैंड पूलिंग की प्रक्रिया में देरी करते हैं।
- असमान लाभ: लघु एवं सीमांत किसानों को बड़े भूमि स्वामियों की तुलना में आनुपातिक रूप से कम लाभ मिल सकता है।
- क्रियान्वयन क्षमता की कमी: भूमि पुनर्समायोजन के लिए स्थानीय निकायों के पास अक्सर योजना निर्माण एवं तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव होता है।
- उदाहरण: कई शहरी स्थानीय निकाय टाउन प्लानिंग योजनाएँ तैयार करने के लिए राज्य एजेंसियों पर निर्भर रहते हैं।
- आजीविका संबंधी चिंताएँ: परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान किसानों की तात्कालिक कृषि आय प्रभावित हो सकती है।
- उदाहरण: अवसंरचना परियोजनाओं में केवल भूमि पुनर्वितरण के अतिरिक्त पुनर्वास सहायता की भी आवश्यकता होती है।
आगे की राह
- स्पष्ट कानूनी ढाँचा: राज्यों में पारदर्शी लैंड पूलिंग के लिए व्यापक कानूनी दिशा-निर्देश बनाए जाएँ।
- उदाहरण: मॉडल प्रावधान गुजरात की टाउन प्लानिंग स्कीम के ढाँचे पर आधारित हो सकते हैं।
- डिजिटल भूमि अभिलेख: लैंड पूलिंग से पहले भूमि अभिलेखों का पूर्ण डिजिटलीकरण एवं स्वामित्व (Title) का सत्यापन सुनिश्चित किया जाए।
- उदाहरण: डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम, 2016 स्वामित्व संबंधी विवादों को कम कर सकता है।
- निष्पक्ष पुनर्वितरण: विकसित भूमि की न्यायसंगत वापसी एवं पारदर्शी मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाए।
- समेकित योजना निर्माण: केवल सड़क गलियारों तक सीमित न रहकर आवास, सार्वजनिक सुविधाओं एवं हरित पट्टियों के लिए भी भूमि का समेकित विकास किया जाए।
- आजीविका सहायता: प्रभावित परिवारों के लिए लैंड पूलिंग को कौशल विकास एवं पुनर्वास उपायों के साथ जोड़ा जाए।
- उदाहरण: दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY–NRLM) जैसी योजनाओं के साथ अभिसरण आय के वैकल्पिक स्रोतों की ओर संक्रमण में सहायता कर सकता है।
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निष्कर्ष
लैंड पूलिंग भूमि स्वामियों को निष्क्रिय लाभार्थियों से विकास के सक्रिय भागीदारों में परिवर्तित करती है। पारदर्शी शासन, सुदृढ़ भूमि अभिलेख तथा न्यायसंगत लाभ-साझेदारी के माध्यम से यह अवसंरचना विस्तार को सामाजिक न्याय के साथ संतुलित कर सकती है, जिससे भारत का शहरीकरण एवं ग्रामीण रूपांतरण अधिक समावेशी तथा सतत् बन सकता है।