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Q. भारत में न्यायिक विलोपन (Judicial Recusal) से संबंधित कानून, तकनीकी विषय होने के बजाय एक नैतिक विषय अधिक है। हालिया घटनाओं के आलोक में, भारत में न्यायिक विलोपन को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों की चर्चा कीजिए। क्या आपको लगता है कि इन नियमों को संहिताबद्ध करने की आवश्यकता है? (15 अंक, 250 शब्द)

April 29, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत में न्यायिक विलोपन को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों की चर्चा कीजिए।
  • बताइए कि विलोपन नियमों के संहिताकरण की आवश्यकता क्यों है।

उत्तर

भारत में न्यायिक विलोपन का अर्थ है कि कोई न्यायाधीश संभावित पक्षपात या हितों के टकराव के कारण किसी मामले से स्वयं को अलग कर लेता है। यद्यपि यह विधिक सिद्धांतों में निहित है, लेकिन यह मुख्यतः निष्पक्षता और न्यायपालिका में जन-विश्वास को बनाए रखने के लिए एक नैतिक सुरक्षा उपाय है।

भारत में न्यायिक विलोपन को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत

  • पक्षपात के विरुद्ध सिद्धांत: किसी न्यायाधीश को उस मामले का निर्णय नहीं करना चाहिए, जहाँ पक्षपात की वास्तविक संभावना या उचित आशंका हो, ताकि निर्णय-निर्माण में निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
  • पक्षपात की युक्तिसंगत आशंका का परीक्षण: विलोपन इस आधार पर निर्देशित होता है कि क्या एक निष्पक्ष और विवेकशील पर्यवेक्षक पक्षपात की संभावना देखेगा। पश्चिम बंगाल राज्य बनाम शिवानंद पाठक जैसे मामलों में इस सिद्धांत को रेखांकित किया गया है, जहाँ व्यक्तिगत मंशा से अधिक सार्वजनिक धारणा को प्राथमिकता दी जाती है।
  • न्यायिक अंतःकरण और आत्म-नियमन: विलोपन मुख्यतः न्यायाधीश के अपने नैतिक विवेक पर निर्भर करता है, क्योंकि इसके लिए कोई कठोर वैधानिक ढाँचा मौजूद नहीं है। इस प्रकार, ईमानदारी और नैतिक निर्णय-क्षमता केंद्रीय भूमिका निभाती है।
  • सुनवाई करने का कर्तव्य बनाम विलोपन  का दायित्व: न्यायालयों ने इस बात पर जोर दिया है कि न्यायाधीशों को पक्षपात से बचने और बिना वैध कारणों के मामलों से बचने के अपने दायित्व के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए, जिससे न्यायालयों द्वारा बार-बार अपना पक्ष बदलने या न्यायाधीशों की नियुक्ति में बदलाव करने से बचा जा सके।

विलोपन नियमों के संहिताकरण की आवश्यकता

संहिताकरण के पक्ष में तर्क संहिताकरण के विरोध में तर्क
पारदर्शिता और सुसंगतता सुनिश्चित करता है: स्पष्ट नियम अस्पष्टता को कम करते हैं और विलोपन के निर्णयों में पूर्वानुमेयता को बढ़ाते हैं। न्यायिक विवेक को सीमित करता है: कठोर नियम जटिल मामलों में आवश्यक संदर्भ-आधारित नैतिक निर्णय को बाधित कर सकते हैं।
पक्षपात की धारणा का समाधान: मानकीकृत मानदंड संबंधों, पूर्व टिप्पणियों या संबद्धताओं से उत्पन्न पक्षपात की आशंकाओं से प्रभावी ढंग से निपटने में सहायक होते हैं। तकनीकी अनुपालन को बढ़ावा देता है: विलोपन एक वास्तविक नैतिक आत्ममंथन के बजाय केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकता बन सकता है।
विलोपन याचिकाओं के दुरुपयोग को रोकता है: निर्धारित मानक न्यायाधीशों की नियुक्ति में बदलाव और रणनीतिक मुकदमेबाजी जैसी प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर सकते हैं। न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रभाव: विलोपन का बाहरी विनियमन न्यायिक कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।

निष्कर्ष

न्यायिक विलोपन न्यायपालिका में निष्पक्षता और जन-विश्वास बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। यद्यपि स्पष्ट नियम पारदर्शिता को बढ़ा सकते हैं, अत्यधिक कठोरता न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, नैतिक विवेक और व्यापक दिशा-निर्देशों के संतुलित संयोजन वाला दृष्टिकोण आगे का सबसे उपयुक्त मार्ग है।

The law on judicial recusal in India is more an ethical issue than a technical one. In light of recent events, discuss the principles governing judicial recusal in India. Do you think there is a need to codify these rules? in hindi

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